खत्म होगी, जीरो हंगर की चुनौती

हालांकि विश्व का खाद्यान्न उत्पादन दुनिया की संपूर्ण आबादी के भोजन के लिए पर्याप्त है, फिर भी लगभग दुनिया के 815 मिलियन लोग (1 मिलियन = 10 लाख) सतत कुपोषण से ग्रस्त हैं। भारत अपने नागरिकों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न पैदा करता है, लेकिन ग्लोबल हंगर इंडेक्स रैंकिंग में 119 देशों में 100वें स्थान पर है। भारत की आर्थिक वृद्धि दर और बदलते जन सांख्यिकीय पैटर्न के कारण खाद्यान्न की मांग में भी रूपांतरण हो रहा है। देश के बदलते स्वाद, आहार और भोजन आदतों का मुकाबला करने के लिए खाद्य उत्पादन, प्रोसेसिंग, संरक्षण के प्रभावी एकीकृत सिस्टम के विकास और डिजाईन की आवश्यकता अनिवार्य हो गई है।

मजबूत भण्डारण की जरूरत

अपर्याप्त भंडारण व्यवस्था और कोल्ड स्टोरेज के कारण भारत के सालाना खाद्यान्न उत्पादन का 7 प्रतिशत और फल सब्जी का 30 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो जाता है। अन्य देशों में भी लगभग यही स्थिति है। एक अनुमान के मुताबिक अफ्रीका में बर्बाद हुए भोजन से चार करोड़ लोगों को खाना खिलाया जा सकता है। हंगर या भूख मूलरूप से प्रोसेसिंग, वेअरहाउस, सप्लाय चेन और लॉजिस्टिक्स के कारण चुनौती है।

कोल्ड चेन का विकास जरूरी

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रेफ्रिजरेशन के मुताबिक, यदि विकासशील देशों के पास विकसित देशों के समान प्रशीतन सुविधाएं हों तो वे 20 करोड़ टन भोजन या उनकी रसद का 14 प्रतिशत हिस्सा नष्ट होने से बचा सकते हैं। भारत में शीत श्रृंखला विकास के लिए नेशनल सेंटर फॉर कोल्ड-चेन डेवलपमेंट के अनुमान के अनुसार देश की जरूरत की केवल 15 प्रतिशत ही तापमान नियंत्रित परिवहन सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा प्री-कंडीशंड कृषि उत्पादन के परिवहन के लिए डेडीकेटेड वेअरहाउस (समर्पित गोदाम) सुविधा 1 प्रतिशत से भी कम है। इन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में देश का केवल 4 प्रतिशत खाद्यान्न ही कोल्ड चेन के जरिए परिवहन किया जाता है। इन कोल्ड चेन के माध्यम से फलों, सब्जियों की कटाई पश्चात हानि को कम किया जा सकता है, साथ ही किसानों की उपज को अच्छे दाम मिलने वाली मंडियों में भेजा जा सकता है, इस शीत श्रंृखला के जरिए किसान की उपज की गुणवत्ता भी बनी रहती है। इसके अतिरिक्त जलवायु विविधता और उसकी चरमता की स्थिति में लचीली परिवहन सुविधाओं के जरिए खाद्यान्न को सरप्लस क्षेत्रों से अभाव वाले इलाकों में पहुंचाया जा सकता है। इस प्रकार शून्य भूख या जीरो हंगर के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

छोटी जोतें – समस्या

भारत की अत्यधिक छोटी और बंटी हुई जोतों के कारण समस्या और जटिल हुई हैं। उदाहरणत: विश्व में सबसे अधिक केला उत्पादन के बावजूद वैश्विक व्यापार में हमारी हिस्सेदारी 0.3 प्रतिशत है। यह मुख्य रूप से बड़े व्यावसायिक खेतों की कमी और छोटे किसानों के मध्य इंटीग्रेशन या एकीकरण के अभाव के कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधोसंरचना विकास एवं पर्याप्त सुविधाएं, कटाई बाद कार्र्याें के लिए किसानों का प्रशिक्षण जिससे नुकसान कम हो, लघु उद्यमियों को वैल्यू-चेन में एकीकरण, छोटे किसानों को फॉर्मर प्रोड्यूसर संगठनों में लाना, अनुकूलित वित्तीय सेवाएं, कृषि शोध में निवेश एवं अंतिम लक्ष्य (लास्ट माईल) तक मार्केटिंग चैनल का विकास जीरो हंगर या शून्य भूख पर विजय पाने के लिए जरूरी है। इन महत्वपूर्ण कारकों के साथ ही सामाजिक समरसता का प्रसार होगा, लिंग समावेशी प्रक्रिया जारी रहेगी एवं कृषि में कार्बन फुट प्रिंट भी कम होंगे।

‘जब खेतों में जुताई शुरु होती है, दूसरे काम भी उसके साथ शुरू हो जाते हैं’। इसलिए किसान भाई मानव सभ्यता के संस्थापक हैं। देश के तेजी से बदलते आर्थिक परिदृश्य में कृषि क्षेत्र की रफ्तार धीमी है। अर्थव्यवस्था के सबसे पहले भागीदार याने किसान को सहयोग, समर्थन एवं संरक्षण प्रदान करना होगा ताकि अधिक उत्पादन एवं उत्पादकता अर्जित की जा सके। और उसको (वैल्यू चेन) मूल्य श्रृंखला में लाभ का एक बड़ा हिस्सा मिले। वर्तमान में कच्चा माल और तैयार उत्पाद की व्यवस्था एकल मार्गीय (वन वे) है। इस मार्ग को, किसानों और उपभोक्ताओं के मध्य व्यापार और स्वस्थ, पौष्टिक भोजन के आदान-प्रदान के रूप में दोतरफा स्थापित करना होगा ताकि जीरो हंगर चैलेंज और गरीबी से मुकाबला किया जा सके।

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