खरपतवारनाशक के प्रति किसानों की बदलती सोच

इंदौर। जिस तरह समय के साथ खेती के तरीकों में बदलाव हुआ है, वैसे ही किसानों की सोच में भी परिवर्तन दिखाई देने लगा है। समय की बचत के लिए अब अधिकांश किसान ट्रैक्टर से खरपतवार का खात्मा करने लगे है। हालांकि कई किसान अब भी समय मिलने पर पारम्परिक तरीकों डोरे/कुल्पे से ही नींदानाशक के पक्ष में दिखे।

खरपतवार को लेकर कृषक जगत के इंदौर कार्यालय ने इंदौर -उज्जैन संभाग के किसानों से चर्चा की। किसानों ने समयाभाव, बारिश और मजदूरों के संकट को देखते हुए रसायनिक खरपतवारनाशकों के इस्तेमाल को जरुरी बताया, अन्यथा फसलोत्पादन पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

इस बारे में सुखलिया (क्षिप्रा ) जिला देवास के उन्नत किसान त्रिलोक हजारीलाल पटेल ने 15 दिन पहले ही सोयाबीन और मक्का लगाई हैं। उनका कहना है कि बाजार में खरपतवारनाशक और अन्य उत्पादों की भरमार होने से किसान भ्रमित हो जाता है कि कौन सा उत्पाद खरीदें। लेकिन समय मिलने पर डोरा चलाने को प्राथमिकता देना चाहते हैं,क्योंकि इससे खेत की नमी संरक्षित रहती है। खरपतवारनाशक परस्यूट इस्तेमाल करते हैं जिसका दुकानदार से पक्का बिल लेना नहीं भूलते। खेती का मार्गदर्शन ब्लॉक के कृषि अधिकारियों से लेते रहते हैं।

वहीं रोजड़ी जिला इंदौर के किसान रतन सिंह केशर सिंह सिसोदिया ने बताया कि खरपतवार को खत्म करने के लिए प्राय: डोरा/कुल्पा ही चलाते है। लेकिन बारिश होने पर यदि खरपतवारनाशक का उपयोग नहीं किया जाए तो फसल को 20 – 25 प्रतिशत तक का नुकसान होता है। दवाइयों का उपयोग उत्पाद पर लिखे निर्देश अनुसार करते हैं। धार जिले के निम्बोल के कृषक रितेश धनराज पाटीदार का मत भी पारम्परिक कुल्पा/डोरा तरीकों से करने के पक्ष में दिखा। रितेश ने तर्क दिया कि पुराने तरीके का उपयोग करने से मजदूरी कम लगने के साथ जमीन पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। रासायनिक दवाओं से जमीन की उर्वराशक्ति कम हो जाती है। इसी कारण नई -नई बीमारियां भी बढ़ गई है। ज्यादा जरूरत पडऩे पर ही खरपतवारनाशक का उपयोग करते हैं।

जबकि भोमवाड़ा जिला खरगोन के किसान महेश नारायण यादव ने इस साल सोयाबीन और कपास लगाया है। बारिश नहीं होने पर खरपतवार के लिए कुल्पा चलाएंगे। लेकिन खरपतवारनाशक का छिड़काव करने की भी बात कही। नहीं तो इसका असर फसल के उत्पादन पर पड़ेगा। उधर, रणायरा जिला रतलाम के शम्भुलाल कालूराम पाटीदार ने इस साल भी 22 बीघा जमीन में सोयाबीन लगाई है। गत वर्ष खरपतवार को नष्ट करने के लिए परस्यूट का उपयोग किया था। कीटनाशकों का छिड़काव ट्रैक्टर से करते हैं। कृषि मार्ग दर्शन दुकानदारों से लेते है। रूपनगर जिला रतलाम के किसान देवीलाल रामचंद्र राठौड़ अपने खेत में सोयाबीन की बुवाई कर चुके है। उन्होंने भी खरपतवारनाशक को जरुरी बताया। यदि इसका इस्तेमाल नहीं किया जाए तो फसल उत्पादन 15-20 प्रतिशत कम हो जाता है। जबकि साटकूट जिला खरगोन के किसान सुधाकर प्रभाकर डोंगरे अपनी 11 एकड़ जमीन में खरपतवार को मिटाने के लिए कुल्पे ही चलाते हैं,क्योंकि इससे जमीन की उर्वराशक्ति कम नहीं होती। मजदूरों के समय पर नहीं मिलने या बारिश होने पर रसायनिक दवाइयों का इस्तेमाल करते हैं। इस साल कपास और मक्का लगाया है। जरूरत पडऩे पर कपास और मक्का में क्रमश: ग्रामोक्जोन और एट्राजिन का छिड़काव फ्लैट नोजल से करते है। कृषि संबंधी सलाह विभागीय अधिकारी और दुकानदार से मिलती है।

चितावद जिला खरगोन के श्री मनोज चौधरी अपनी दस एकड़ जमीन में खरीफ में कपास और मिर्च की फसल लेते हैं। पिछले साल मध्यम बारिश होने से खरपतवार के लिए कुल्पे चल गए थे। उन्होंने भी खरपतवार को खत्म करने के लिए रसायनिक दवाइयों का उपयोग करने की बात कही, अन्यथा फसल उत्पादन में 30 -40 प्रतिशत का फर्क पड़ जाता है। खेती संबंधी सलाह दुकानदार और उत्पाद कम्पनी वाले देते हैं। बड़वानी जिले के मोहीपुरा के किसान श्री राजेंद्र सिंह लक्ष्मण सिंह मंडलोई ने अपनी 25 एकड़ जमीन में पिछले साल मक्का लगाईं थी। खरपतवार मिटाने के लिए टेंजर/अल्ट्राजिन पाउडर यूरिया के साथ बुवाई करने से पहले डाला था। छिड़काव के लिए सिंगल पॉइंट पॉवर नोजल इस्तेमाल करते हैं। मजदूरों का संकट होने के कारण रसायनिक चीजों का इस्तेमाल करना ही पड़ता है, नहीं तो फसल उत्पादन पर असर पड़ता है।

तलवडिय़ा जिला खंडवा के उन्नत किसान श्री कृष्ण पन्नालाल पटेल ने अपनी 20 हेक्टर जमीन पर अभी सोयाबीन, कपास, मिर्च के अलावा मूंगफली और मक्का भी लगाई है। मौसम साफ रहने पर डोरे और कुल्पे ट्रैक्टर से चलाते हैं। अनुभवी कृषक होने पर भी कृषि मार्गदर्शन कम्पनी उत्पाद के प्रदर्शनों से भी लेते हैं। कपास के लिए ग्लाइकोसॉल्ट और मिर्च के लिए ग्रामोक्जोन का इस्तेमाल करते हैं। दुकानदार से खरीदी का बिल जरूर लेते हैं, ताकि जरूरत पडऩे पर दावा किया जा सके। उधर,सुवास जिला उज्जैन के मुकेश मुरलीदास बैरागी की 15 बीघा जमीन में सोयाबीन लगाई है। खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए ट्रैक्टर का छिड़काव करते हैं। कृषि सलाह ग्राकृविअ के अलावा दुकानदार और कम्पनी वालों से मिलती रहती है। कीटों के लिए क्राइजोफॉस का उपयोग करते हैं। जबकि इसी जिले के बेड़ावन के धुलजी रामसुख चौधरी ने अपनी 20 बीघा जमीन में इस खरीफ में प्याज, सोयाबीन, मूंगफली और मक्का लगाई है। खरपतवार नाशक का छिड़काव ट्रैक्टर से करते हैं। किसानी सलाह ग्राकृविअ से मिलती है।

हनुमंतिया जिला नीमच के श्री दिलीप रामनारायण ओरा के पास 80 बीघा जमीन है जिसमें अधिकांशत: सोयाबीन लगाई है। कुछ मक्का भी लगाई है। बारिश ज्यादा होने से खरपतवार को नष्ट करने के लिए ट्रैक्टर नहीं चल पाया तो परम्परागत तरीके से दवाई का छिड़काव किया।

कृषि मार्गदर्शन कम्पनी उत्पाद वालों से मिलता है। लेकिन दुकानदार से पक्का बिल नहीं मिलता है। वहीं दंतोडिय़ा जिला रतलाम के श्री दिनेश लक्ष्मीनारायण पाटीदार ने बताया कि 15 बीघा खेती की देखभाल बेटे करते हैं। अपने विवेक से खेती करते हैं। बारिश ज्यादा होने से कुल्पे नहीं चल पाए। सोयाबीन के खरपतवार के नाश के लिए ट्रैक्टर से छिड़काव किया। दुकानदार से पक्के बिल की जानकारी बच्चों को होने की बात कही। जबकि रेवड़ा जिला मंदसौर के श्री राधेश्याम गौरीशंकर परमार ने खरीफ में सोयाबीन, प्याज, मूंगफली आदि लगाई है। खरपतवारनाशक का छिड़काव ट्रैक्टर से छिड़काव किया। बारिश अच्छी हुई है। कृषि मार्गदर्शन ग्राकृविअ और कम्पनी वाले भी देते हैं। कृषि आदान खरीदी का बिल दुकानदार से जरूर लेते हैं।

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