सार्ड मंथन कृषि की प्राण वायु जैविक खेती

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हरित क्रांति में सघन रसायनिक उर्वरकों के उपयोग से कृषि सहयोगी कीटाणु के नष्ट होने से भूमि की उर्वराशक्ति में कमी आई है वहीं उसका भुरभुरापन समाप्त हो गया है। फलस्वरूप, कृषि उत्पादन ‘ला ऑफ डिमशिंग रिटर्नÓ याने रसायनिक उर्वरकों की उत्तरोत्तर वृद्धि से कृषि उत्पादन आय में निरंतर गिरावट आ रही है। स्टेन फोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन में जैविक उत्पादों में 30 प्रतिशत रसायन अंश (पेस्टोसाइड) कम था। अश्वमेघ इंजीनियर्स की प्रयोगशाला द्वारा जैविक उत्पाद लौकी में 31 प्रतिशत केल्शियम, 44 प्रतिशत अधिक प्रोटीन एवं बी-12 विटामिन उच्च स्तर पर पाया गया। ठीक विपरीत रसायनिक उर्वरक जल स्तोत्रों को जहरीला बना रहे हैं तथा भोज्य पदार्थों में पोषक तत्वों की कमी के कारण मानव स्वास्थ्य के लिये त्रासदी बनते जा रहे हैं।
भारत में जैविक खेती का रकबा आने वाले वर्षों तक 25 लाख हेक्टेयर हो जावेगा परंतु विश्व क 340 लाख हेक्टेयर जैविक खेती भूमि की तुलना में भारत में जनसंख्या का दबाव एवं उनकी आय स्तर देखते हुए जैविक भूमि का रकबा अत्यंत न्यून है। यदि जैविक खेती वैज्ञानिक प्रबंधन से की जावे तो केवल मध्यप्रदेश में 23000 करोड़ रु. का लाभ, 60 लाख लोगों को रोजगार एवं 600 करोड़ रु. के निर्यात की संभावनायें हैं।
जैविक खेती ऋषि परंपरानुसार पूर्णतया प्राकृतिक है, मानव समाज के उत्थान एवं उसकी निरंतरता हेतु कृषि की सस्टेनेबिलटी हेतु जैविक खेती प्राणवायु है। इन पशु मानव के आपसी संबंधों को तालिका -1 में दर्शाया है।
मनुष्य + पशु
1. प्रतिस्पर्धा: भूमि, भोजन, आवास, पर्यावरण में, वन क्षेत्र एवं वन पशु (पालित+ वनपशु-मनुष्य)
2. सामाजिक, आर्थिक (श्रम+उत्पादन), धार्मिक आवश्यकताएं एवं मान्यतायें
3. पशु वध, शिकार, क्रूरता, संघर्ष, प्रयोगात्मक पशु
4. संबंध निरंतर परिवर्तनशील, सहयोगी, सहचारी भी, प्रतिस्पर्धात्मक भी
5. फल प्राप्ति, ऋषि परम्परा, वैज्ञानिक शोध, जीनोम परिवर्तन, भावनात्मक संबंध, आर्थिक संतुलन
जैविक खेती
आर्गेनिक फार्मिंग और उससे प्राप्त होने वाला आर्गेनिक फूड जिसकी मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। जैविक खाद के स्त्रोत गोबर, खेती के सह उत्पाद, हरी, खाद (काई), कम्पोस्ट, गौमूत्र तथा पशु शाला के अपशिष्ट एवं वर्मी खाद हैं। रसायनिक खाद के उपयोग से हो रहे नुकसान इस प्रकार हैं।
रसायनिक खाद उपयोग से हानि
1. भूमि संरक्षण- उर्वरता एवं उत्पादक क्षमता का हृास, भूमि की अम्लता में वृद्धि, मिट्टी का क्षरण, पोषक तत्वों का पानी में बह जाना तथा भूमि की जीवप्रणाली का नाश, भूमि की मुरमता समाप्त होकर कड़ा हो जाना।
2. पौध विविधता समाप्त होना
3. पशु प्रजनन, उत्पादन: विपरीत प्रभाव
4. मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव
5. पर्यावरण संतुलन का बिगडऩा
6. संसाधन संरक्षण एवं जलस्त्रोत दूषित होना
7. कृषि में सस्टेनेबिलेटी का हृास

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