कीटों में बढ़ता कीटनाशक प्रतिरोध एक गंभीर समस्या एवं निदान

वर्तमान समय में बाजार में नये -नये कीटनाशक प्रतिवर्ष आ रहे हंै। साथ ही देखने में यह भी आ रहा है कि नये आने वाले कीटनाशक जल्द ही निष्प्रभावी हो जाते हैं और फिर से नये कीटनाशक की तलाश शुरू हो जाती है। यह गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि यदि इसी क्रम में कीटनाशकों के विरूद्ध कीट प्रतिरोधिकता बढ़ती रही तो वह दिन दूर नहीं जब फसलों में कीट प्रबंधन असंभव हो जाएगा। अत: समय रहते विशेष रूप से किसानों वैज्ञानिकों एवं सरकार को सचेत होने की जरूरत है। ए.पी. आर.डी (आर्थोपोड पेस्टीसाइड रेसिस्टेंन्स डाटाबेस) की सन् 2014 की प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबीक निम्नलिखित कीट अनेक कीटनाशकों के विरूद्ध प्रतिरोधी हो चुके हैं-

कीटनाशक प्रतिरोधिकता क्या है
कीटों में कीटनाशक प्रतिरोधिकता एक जैविक प्रक्रिया है जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी अनुवांशिक परीवर्तन के कारण होती है। कीट में मौजूद जीन कीटनाशक की विषाक्तता के विरूद्ध स्वयं को परिवर्तित कर लेते है। इस कारण कीटनाशक प्रभावहीन हो जाते हैं।
कीटनाशक प्रतिरोधिकता बढऩे के कारण
अनुवांशिक परिवर्तन:- किसी भी कीट के विरूद्ध एक कीटनाशक के या उस समूह के अन्य कीटनाशकों के प्रयोग से कीट उस जहर के विरूद्ध अपने अन्दर अनुवांशिक परिवर्तन कर लेते है। जिसके कारण पीढ़ी दर पीढ़ी कीटों के मरने का प्रतिशत कम हो जाता है। प्राकृतिक रूप से एक पीढ़ी के कीटों की संख्या का कुछ प्रतिशत कीटनाशकों के प्रति ग्रहणशील कुछ सहनशील तथा कुछ प्रतिरोधी होता है। ग्रहणशील संख्या मर जाती है, सहनशील संख्या जहर को हजम कर जाती है तथा प्रतिरोधी संख्या पर कोई असर नहीं पड़ता है। अगली पीढ़ी में प्रतिरोधी तथा शहनशील कीटों की संख्या बढ़ जाती है। इसी क्रम में कीट की अगली पीढ़ी में कीटनाशक बेअसर हो जाते है।
उच्च प्रजनन क्षमता:- आमतौर पर कोई भी कीट कम से कम 50 (थ्रिप्स), 250-300 (जेसिड -हरा मच्छर एवं सफेद मक्खी) एवं 300 -500 (अन्य कीट) अण्डे देता है। कीटनाशक की ज्यादा मारक क्षमता होने पर यदि प्रतिरोधी एवं सहनशीलता कीट संख्या का प्रतिशत कम भी हुआ (सामान्यत: 10 प्रतिशत ) तो भी अगली पीढ़ी में न मरने वाले कीटों की संख्या बहुत हो जाती है।
पोषक पौधों का विस्तार:- सामान्यत: कीट कई पोषक पौधों पर अपना जीवनयापन करते है। उदाहरण स्वरूप चने की इल्ली, टमाटर, कपास, गुलाब, अफीम एवं अन्य पोषक पौधों पर नुकसान करती है। सफेद मक्खी कपास एवं लगभग सभी सब्जियों पर प्रकोप करती है। इसी प्रकार अन्य रस चूसने वाले तथा पत्तियों एवं फलियों को खाने वाले कीट कई पोषक पौधों पर अपना जीवन व्यतीत करते है। किसी कीटनाशक द्वारा यदि एक फसल पर इन कीटों को नष्ट किया गया तो अन्य फसल पर उपस्थित इनकी संख्या बहुगुणित होकर पुन: फैल जाती है। और कीट प्रकोप बरकरार रहता है।
छोटा जीवन चक्र:- कीटों का एक जीवन चक्र कम से कम 10 दिन से लेकर 40-50 दिन का होता है। बहुत कम कीट हैं जिनका एक जीवन चक्र वर्ष भर (टिड्डा) का होता है। ऐसी स्थिति में कीटनाशकों के प्रयोग के बाद बची हुई कम संख्या में वंश वृद्धि के द्वारा अपनी संख्या का स्तर बरकरार रखती है।
स्थान परिवर्तन:- कीट पोषक पौधों के अभाव में किसी न किसी माध्यम से स्थान परिवर्तन कर लेते है एवं वहां पहले से उपस्थित अपने ही प्रजाति के साथ प्रजनन करके कीटनाशक प्रतिरोधी कीट संख्या को बढ़ा देते हैं।
गलत कीटनाशकों का प्रयोग:- हमारे देश में ऐसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है कि किसान प्रमाणित रूप से जानकार व्यक्तियों अथवा कीट वैज्ञानिकों द्वारा सिफारिश किए गए कीटनाशकों का ही प्रयोग करें। ऐसी स्थिति में किसान अपनी मर्जी से अथवा गैर जानकार व्यक्ति की सिफारिश पर गलत कीटनाशक का प्रयोग करते है। जिससे वांछित कीट नियंत्रित तो नहीं हो पाता लेकिन कीट प्रतिरोधिता बढ़ती जाती है।
एक कीटनाशक का बार-बार प्रयोग:- किसानों से जानकारी प्राप्त करने पर अक्सर ये पाया गया है कि आमतौर पर किसान एक ही असरदार कीटनाशक को ज्यादा मात्रा मे खरीद लाते हैं, और आवश्यकता पडऩे पर उसी कीटनाशक का बार-बार छिड़काव करते हैं, जिससे कीट प्रतिरोधिकता बढऩा स्वाभाविक है। और बाद में वह असरदार कीटनाशक बेअसर हो जाता है, और फिर नये कीटनाशक की तलाश शुरू हो जाती है। यह बताना आवश्यक लगता है कि हर कीटनाशक की निश्चित समय तक असर करने की अवधि होती है। लेकिन किसान असर कम दिखने पर समय से पहले ही दुबारा छिड़काव करते है।
कीटनाशक का ज्यादा मात्रा में प्रयोग:- अध्ययन में यह पाया गया है कि अधिकतर किसान सिफारिश से ज्यादा मात्रा में और कभी -कभी तो दुगनी से भी ज्यादा मात्रा में प्रयोग करते है जिससे एक तरफ कीट प्रतिरोधिकता बढऩे के कारण वह कीटनाशक बेअसर हो जाता है, तो दूसरी तरफ किसान द्वारा ज्यादा कीटनाशक की कीमत चुकाने के कारण आर्थिक नुकसान होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा उपभोग उपरांत स्वस्थ पर विपरीत प्रभाव पडता है।

कीट/पीड़क प्रजाति  सामान्य नाम  अप्रभावी कीटनाशकों की संख्या  
Tetranychus urticae दो धब्बेवाली मकड़ी 93
Plutella xylostella डायमंड बैक मॉथ 91
Myzus persicae हरा माहू 75
Musca domestica घरेलू मक्खी 58
Bemisia tabaci सफेद मक्खी 54
Aphis gossypi कपास का माहू 48
Helicoverpa armigera कपास का फलछेदक 47
Spodoptera litura तंम्बाकू की इल्ली 38
कीट प्रतिरोधिकता प्रबंधन
कीट प्रतिरोधिकता प्रबंधन के लिये निम्न तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।
जैविक नियंत्रण को बढ़ावा देना: – बहुत सारे लाभदायक कीट हैं जो नुकसानदायक कीटों को खाते है, अत: उनका सरक्षण एवं बहुगुणन आवश्यक है। उदाहरण -काक्सीनेलिड बीटल, क्राइसोपर्ला, मेनोचिलस इत्यादि।
पौधों को लगाने एवं कटाई करने के समय में सुधार:- फसलों पर कीटों का प्रकोप अजैविक कारकों के अनुकूल होने तथा पोषक पौधों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। साथ ही अलग-अलग कीट फसल की विभिन्न अवस्थाओं में नुकसान पहुंचाते है। पौधों को लगाने के समय में बदलाव करके उस नुकसान से बचा जा सकता है।
कीट प्रतिरोधी प्रजातियां:- हमेशा कीट प्रतिरोधी प्रजातियों का उपयोग करें, जिससे की कम से कम कीटनाशक का उपयोग करना पड़े एवं कीटनाशक कीट प्रतिरोधिकता से बचा जा सके ।
रिफ्युजिया का संरक्षण:- इसका उपयोग विशेष रूप से बी.टी. कपास में किया जाता है। रिफ्युजिया वह कपास के पौधे है जो गैर प्रतिरोधी कीटों को अपनी और आकर्षित करते हैं, जिसके कारण प्रतिरोधी कीट कम विकसित होते है।
अस्थाई प्रभावशील कीटनाशक:- ऐसे कीटनाशकों का छिड़काव के लिए चयन किया जाए जिनके अवशेष फसल पर ज्यादा लम्बे समय तक ना रहे। इससे कीट में कीटनाशक के प्रति सहनशीलता और प्रतिरोधक क्षमता कम विकसित होगी। अब जो नये कीटनाशक बाजार में आ रहे हंै वो अधिकतर इसी प्रकार के हैं।
कीटनाशकों का बदलकर प्रयोग करना:- एक ही कीटनाशक का लगातार प्रयोग करने से कीट प्रतिरोधिकता बढ़ती है। अत: एक छिड़काव के बाद दूसरा छिड़काव अन्य समूह के कीटनाशक से किया जाना चाहिए। अगला छिड़काव पहले समूह के अन्य कीटनाशक से करना चाहिए। ऐसा करने से कीट प्रतिरोधिकता विकसित नहीं हो पाती है।
बाजार में उपलब्ध मिश्रित कीटनाशक का उपयोग:- बाजार में उपलब्ध दो अलग-अलग समूह के कीटनाशकों के मिश्रण का प्रयोग कीट प्रतिरोधिकता रोकने के लिए ज्यादा प्रभावी है। स्वयं दो प्रकार के कीटनाशकों को आपस मे मिलाकर छिड़काव करना विषाक्तता तथा प्रदूषण की दृष्टि से बहुत खतरनाक हो सकता है।
कीटों के जीवन चक्र का ज्ञान:- कीटों के जीवन चक्र का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे कि कीटनाशकों का प्रयोग कीट की अति संवेदनशील अवस्था में किया जा सके, और अधिकतम कीट नष्ट किए जा सकें।
लेबल की सिफारिश:- कीटनाशकों की पैकिंग के ऊपर कीट के अनुसार कीटनाशक की मात्रा प्रयोग करने की सिफारिश की जाती है। अत: पूरी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
सही छिड़काव:- प्रति इकाई क्षेत्र में सिफारिश की गई मात्रा का छिड़काव होना चाहिए, तथा उचित तरीके से पौधों के वांछित हिस्से पर कीटनाशक का घोल पहुंचना चाहिए, जिससे अधिकतम कीट नियंत्रित हो सके तथा कीट प्रतिरोधिकता कम से कम विकसित हो।
  • डॉ. एस.बी. सिंह
  • डॉ. जी.एस. चुण्डावत
    email: sbsmds@rediffmail.com

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