बागवानी फसलों से ही आय होगी दोगुनी

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वर्ष 2022 तक किसान आय दोगुना करना मुश्किल जरूर है असंभव नहीं है। यदि किसान बागवानी फसलों के साथ-साथ औषधीय महत्व की मसाला फसलों का उत्पादन करें तो दोगुना ही नहीं, दस गुना आय प्राप्त कर सकता है। आय बढ़ोत्तरी के लिये किसानों को ना केवल वैज्ञानिक उन्नत शस्य क्रिया अपनानी होगी। बल्कि, नई किस्म का उपयोग और प्रसंस्करण की ओर भी जाना होगा, बागवानी फसल को प्रदेश में बढ़ावा देकर किसानों के स्वास्थ्य, समृद्धि और सामान्य जीवन में खुशहाली लायी जा सकती है। बागवानी और मसाला फसलों को लेकर कृषक जगत की एन.एच.आर.डी. एफ. के डॉ. एच. एम. सिंह से हुई वार्ता के मुख्यांश…

कृ.ज. : एन.एच.आर.डी.एफ. के बारे में बतायें?
डॉ. सिंह : राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (एन.एच.आर.डी. एफ.) की स्थापना राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (नेफेड) एवं प्याज निर्यातकों द्वारा 3 नवम्बर 1977 को नई दिल्ली में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य प्याज तथा अन्य ऐसी ही निर्यात योग्य बागवानी फसलों की पैदावार तथा गुणवत्ता बढ़ाना है। अनुसंधान और विकास की सुदृढ़ता के साथ इसमें लहसुन, भिंडी, मिर्च, फ्रांसीसी बीन को भी शामिल किया गया है। वर्तमान में केन्द्र के 5 क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, आधुनिक प्रयोगशाला और 18 तकनीकी विस्तार केन्द्र देश भर में कार्य कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में इंदौर में स्थापना की गई है। प्रतिष्ठान के बीज प्रसंस्करण संयंत्र लासलगांव (महाराष्ट्र), राजकोट (गुजरात), इंदौर (मध्यप्रदेश), करनाल (हरियाणा), कुरनूल (आंध्र प्रदेश) और देवरिया (उत्तरप्रदेश) में स्थापित है।
कृ.ज. : फाउण्डेशन से किसान कैसे लाभान्वित हो सकता है?
डॉ. सिंह : प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश के किसानों को प्याज-लहसुन की नई किस्मों का बीज उपलब्ध करवा रहा है। साथ ही, उत्पादकता और गुणवत्ता सुधार के लिये किसानों को फसल प्रदर्शन वितरित कर रही है। इंदौर, देवास, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, नीमच, धार, खरगोन, बड़वानी और आगर जिले के प्याज और लहसुन उत्पादक किसानों को संस्था के वैज्ञानिक तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान कर रहे है। साथ ही, फसल उत्पादन की नई तकनीक किसानों को हस्तांतरित कर रहे हैं।
कृ.ज. : किसान अपनी आय कैसे बढ़ा सकता है?
डॉ. सिंह : कृषि में बागवानी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें किसान अपनी भूमि से अधिक से अधिक आय प्राप्त कर सकता है। प्रति व्यक्ति फल और फसलों की उपलब्धता को बढ़ाने के लिये क्षेत्रफल को बढ़ाना अत्यंत मुश्किल कार्य है। लेकिन हम उत्पादन को कुछ विशेष प्रबंधन अपना कर आसानी से बढ़ा सकते हैं। इसके लिये अधिक उपज देने वाली किस्मों का चयन, सही समय पर कटाई-छंटाई, वृद्धि नियामकों का प्रयोग, रोग-कीट प्रबंधन और सघन खेती को अपनाना प्रमुख है।

डॉ. एच.एम. सिंह वर्तमान में राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के प्रादेशिक केन्द्र, इंदौर (म.प्र.) में वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी (उद्यान) के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट सतना से पी.एच.डी. (उद्यान विज्ञान) की उपाधि ली है। वर्ष 2006 में एन.एच.आर. डी.एफ. से अपने कैरियर की शुरूआत की, इन्होंने लहसुन-प्याज के ऊपर लगभग 40 से अधिक राष्ट्रीय, राज्यस्तरीय व जिलास्तरीय संगोष्ठियां आयोजित की हैं।

कृ.ज. : लहसुन में पीलेपन की समस्या को कैसे दूर किया जा सकता है?
डॉ. सिंह : लहसुन की फसल में पीलेपन की समस्या उर्वरक के असंतुलित उपयोग के कारण होती है। फसल को पीलेपन से बचाने के लिए किसान भाई जिंक सल्फेट का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं। इसके बाद भी अगर जरूरत लगती है तो फेरस सल्फेट के घोल का छिड़काव इसी मात्रा में किया जा सकता है। खड़ी फसल में डीएपी का अनावश्यक उपयोग नहीं किया जाए। इससे मिट्टी में पोषक सूक्ष्म तत्वों की कमी आती है और फसल रोगग्रस्त हो जाती है। किसानों को इससे बचना चाहिए।
कृ.ज. : खरीफ प्याज में प्रस्फुटन की समस्या को कैसे रोका जाये?
डॉ. सिंह : यह एक विकृति है जिसमें प्याज के कन्दों से दुबारा पत्तियां निकलने लगती है इसके कारण कन्दों के वजन में तीव्र गिरावट होती है और कन्द पीले होने लगते हैं। खाने योग्य भाग के पत्तियां बनने में प्रयोग होने से यह खाने योग्य नहीं रह जाते हैं। प्रस्फुटन मुख्यतया किस्मों के आनुंशिक गुण से निर्धारित होता है। अधिक नमीयुक्त वातावरण और कम तापमान से यह समस्या बढ़ती है। इसके नियंत्रण के लिये किसान प्याज की खुदाई करने के 3-4 सप्ताह पहले मैलिक हाईड्राजाईड (2500 पीपीएम) का छिड़काव करें। कन्द सूखने के बाद गामा विकिरण से उपचारित करने से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

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