मध्यप्रदेश में – रोज नए ख्वाबों की बात करते हैं

देश के अधिसंख्य किसान संगठनों ने पिछली 2 मई को चंडीगढ़ में इकट्ठा होकर तय किया कि आगामी 1 जून से 10 जून तक गांव बंद रखे जाएंगे। पूर्ण कर्ज मुक्ति, किसानों की सुनिश्चित आय, स्वामीनाथन आयोग (C2+50%) की सिफारिशें लागू करने की मांग आगे बढ़ाई है। सरकार सोचे क्या करना है। आग लगने पर कुआं खोदने वाली सरकार इस शनै:-शनै: बढ़ते किसान आंदोलन के धधकते ज्वालामुखी को बातचीत की शीतलता से शांत कर सकती है। पर बात करें कौन? किसी कवि ने अच्छी बात कही है कि
किसानों से अब कहां वो मुलाकात करते हैं
बस रोज नये ख्वाबों की बात करते हैं।
प्रेक्षको का मानना है कि भावान्तर योजना किसानों के लिए नहीं, अपितु व्यापारियों के फायदे के लिए हैं लेकिन आत्ममुग्ध शिवराज सरकार मानने को तैयार नहीं है। अब लहसुन के बाद प्याज के इस योजना में शामिल होते ही प्याज के भाव गिर गए। किसान नुकसान में रहा, व्यापारी फायदे में मौज कर रहा है। आठनेर के प्रगतिशील किसान श्री हनुवंत कनाठे इसकी पुष्टि करते हुए बताते हैं कि बैतूल मंडी में चने की खरीदी में यहीं हो रहा है। किसान मंडी में 4-4 दिन परेशान है।
किसानों की जमीन की नपती नहीं हो पा रही है, तहसील से खसरे की नकल नहीं मिल पा रही है, भावांतर का भुगतान नहीं हो पा रहा है, किसान के बैंक खाते में फसल बीमा की एन्ट्री नहीं हो रही है, फसल के सही दाम नहीं मिल रहे हैं। तो अच्छे दिन कहां से आएंगे? यहां तो किसान के रातों की नींद भी गायब हो गई है। पर आश्चर्य नहीं है कि चुनाव की घडिय़ां नजदीक आते-आते दीन-हीन-मलीन किसान, दलित-पीडि़त-शोषित कृषक, अन्नदाता के रूप में सरकार को दिखाई देने लगता है। बैचेन मुख्यमंत्री अपने मंत्री साथियों को काबीना में सलाह देते हैं, कि हर हाल में किसानों की नाराजगी दूर करें, उनको समझाएं कि सरकार उनकी बेहतरी के लिए जुटी हुई है, कमर भी कस ली है, आसमां से तारे भी चुन कर ले आएंगे। बस, अगले चुनाव में आप हमें ही चुनना। अधिकारियों की कार्यशैली और मुख मुद्रा कुछ और ही बयां करती है। सरकार की नीतियों को जमीन पर उतारने के लिये जिम्मेदार अफसरों को भी महसूस होने लगा है कि सुनहरे सपने दिखाने वाले जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल की एक्सपायरी डेट करीब है और वांछित परिणाम न दे पाने के कारण अगले चुनाव में ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। इसलिए वे भी निश्चिंत हैं।

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