मोटे अनाज में महत्वपूर्ण कोदो – कुटकी

कोदो की प्रजातियां
जे.के. 6, जेके-62, जे.के. 2, एपीके 1, जीपीवीके.3 (वम्बन 1)। इसके अतिरिक्त जवाहर कोदो-48, जवाहर कोदो-439, जवाहर कोदो-41, जवाहर कोदो-62, जवाहर कोदो-76, डिंडोरी 73, पाली कोयम्बटूर 2 तथा निवास-1 अन्य उन्नत किस्में हैं।
कुटकी– जवाहर कुटकी-1, जवाहर कुटकी-2, जवाहर कुटकी-8, सी.ओ. 2, पीआरसी 3

असिंचित क्षेत्रों में बोये जाने वाली मोटे अनाजों में कोदो का महत्वपूर्ण स्थान है। कोदो का पौधा सहिष्णु और सूखा सहने वाला होता है। उन भागों में भी जहां पर खरीफ के मौसम में वर्षा नियमित रूप से नहीं होती, यह फसल आसानी से उगाई जा सकती है। इस फसल के लिए 40-50 से.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त पाये गए हैं। इसके दाने कठोर बीज आवरण से ढके रहते हैं। इसको पकने के लिए इस कठोर बीज आवरण को हटाना आवश्यक है। इसका अधपका व मोल्टेड अनाज जहरीला होता है। कोदो फसल आसानी से संरक्षित होती है और यह अकाल की स्थिति में भी पैदावार देने में सक्षम है। मधुमेह रोग में पीडि़त रोगियों के लिए कोदो चावल के विकल्प के रूप में सिफारिश किया जाता है। इसके भूसे की गुणवत्ता निम्न स्तर की होती है और यह गोड़े के लिए हानिकारक होता है।

मध्य प्रदेश में लगभग सभी प्रकार के लघु धान्य फसलें उगाई जाती हैं जिसमें जबलपुर संभाग अग्रणी है। लघु धान्य फसलों की खेती खरीफ मौसम में की जाती है, ये फसलें गरीब एवं आदिवासी क्षेत्रों में उस समय लगायी जाने वाली खाद्यान्न फसलें है जिस समय पर उनके पास किसी प्रकार का अनाज खाने को उपलब्ध नहीं हो पाता है। ये फसलें जून के प्रथम सप्ताह में बो देते हैं जिससे यह अगस्त के अंतिम सप्ताह या सितम्बर के प्रथम सप्ताह तक पक जाती हैं, जबकि अन्य फसलें इस समय तक नहीं पक पाती हैं। अत: उस समय 60-80 दिनों में पकने वाली कोदो, कुटकी, सावां एवं रागी जैसी फसलें महत्वपूर्ण खाद्यान्नों के रूप में प्राप्त होती है। मध्य प्रदेश में ये फसलें मंडला, अनूपपुर, शहडोल, उमरिया, सीधी, सिंगरौली, रीवा, सतना, कटनी, डिंडोरी, सिवनी एवं जबलपुर, कटनी आदि में बहुतायत से उगाई जाती हैं।

मिट्टी
कोदो प्राय: सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जाती है। बजरीयुक्त पथरीली भूमि में भी प्रतिकूल परिस्थिति एवं खराब एवं अच्छी दोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। पानी निकास अच्छा होना चाहिए।
खेत की तैयारी
मानसून के प्रारंभ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। मानसून के प्रारंभ होने के साथ ही मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा दो-तीन जुताईयां हल से करके खेत को भली-भांति तैयार कर लेना चाहिए।

  चावल की तुलना में कोदो में पाये जाने वाले पौष्टिक तत्वों का संयोजन निम्नानुसार है।
फसल प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा कूड लौह कैल्शियम फास्फोरस
(ग्राम) (ग्राम) (ग्राम) फाइवर तत्व (मि.ग्रा.) (मि.ग्रा.)
चावल 6.8 78.2 0.5 0.2 0.6 10 160
कोदो 8.3 65.9 1.4 9 2.6 27 188

बुवाई समय
कोदो की बुवाई का उत्तम समय 15 जून से 15 जुलाई तक है। जब भी खेत में पर्याप्त नमी हो बुवाई कर देनी चाहिए। कोदो की बुवाई अधिकतर छिटकवां विधि से की जाती है, परन्तु यह वैज्ञानिक नहीं है क्योंकि इससे हर पौधे के बीच बराबर दूरी नहीं छूटती तथा बीज का अंकुरण भी एक सा नहीं होता। पंक्तियों में की गई बुवाई अधिक लाभकारी होती है। इसमें पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40 से 50 से.मी. एवं पौधे से पौधे की बीच की दूरी 8 से 10 से.मी. होनी चाहिए। बीज बोने की गहराई लगभग 3 से.मी. होना चाहिए।
बीज की दर- 15 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर।
खाद एवं उर्वरक का प्रयोग
जैविक खाद का उपयोग हमेशा लाभकारी होता है क्योंकि यह मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करने के साथ-साथ पानी संरक्षण क्षमता को भी बढ़ाता है। 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मानसून के बाद पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है। 40:20:20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूडों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए। नत्रजन का शेष आधा भाग बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए।
पानी का प्रबंधन
कोदो की खेती प्राय: खरीफ में की जाती है जहां पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर भी यदि पानी की सुविधा उपलब्ध हो तो एक या दो सिंचाई उस समय दी जा सकती है जब वर्षा लम्बे समय तक रुक गई हो। अत्याधिक वर्षा की स्थिति में पानी के निकासी का प्रबंध अतिआवश्यक है।
खरपतवार नियंत्रण
पौध की बढ़वार के शुरुआती स्थिति में खेत खरपतवार रहित होना चाहिए, मुख्यतया बुवाई के 30 से 35 दिवस तक। सामान्यतया दो निराई-गुड़ाई 15-15 दिवस के अन्तराल पर पर्याप्त है। पंक्तियों में बोये गये पौधों की निराई-गुड़ाई हैंड-हो अथवा व्हील हो से किया जा सकता है।

मुख्य बिन्दु

  • गर्मी की जुताई अवश्य करें।
  • उपचार किए हुए बीज का प्रयोग करें।
  • जैविक खाद एवं उर्वरक का प्रयोग संस्तुति के अनुसार करें।
  • पानी के निकासी की व्यवस्था करें।
  • खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान दें।
  • फसल सुरक्षा पर विशेष ध्यान दें।

कटाई व मढ़ाई
फसल कटाई के लिए माह सितम्बर व अक्टूबर में पक कर तैयार हो जाता है। फसल की कटाई जमीन से सटाकर करते हुए, बण्डल बनाकर एक सप्ताह सूखने के लिए छोड़ देते हैं फिर थ्रेसिंग कर अनाज अलग कर लेते हैं।
उत्पादन
औसत उत्पादकता – 15-18 क्ंिवं. प्रति हेक्टेयर
चारा- 30-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
भण्डारण
कटाई तथा मड़ाई के बाद बीज को धूप में भली-भांति सुखा लेना चाहिए। बीज में भण्डारण के समय नमी की मात्रा 10-12 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। बीज को थैली में भरकर ऐसी जगह रखना चाहिए जहां नमी न हो।

  • अजय कुमार द्विवेदी
    email : ajayniws@gmail.com

www.krishakjagat.org

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