रिज-फरो पद्धति का महत्व

चौड़ी क्यारी व नाली पद्धति
फसल बुवाई की यह यथास्थिति नमी संरक्षण के लिये अपनाई जाती है इसमें बुवाई संरचना, फरो इरीगेटेड रिज्ड बेड प्लान्टर से बनाई जाती है जिसमें सामान्यत: प्रत्येक दो कतारों के बाद लगभग 25 से 30 से.मी. चौड़ी व 15 से 20 से.मी. गहरी नाली या कुड़ बनते हैं। जिससे फसल की कतारें रेज्डबेड पर आ जाती है। इन खाली कूड़ों का उपयोग वर्षा ऋतु में कम वर्षा की स्थिति में कूड का अंतिम छोर बंद करने पानी रोकने में हो सकता है। जिससे फसल में अधिक समय तक नमी बनी रहती है। वहीं अत्याधिक वर्षा की स्थिति में कूड़ के अंतिम छोर खोल देने पर आवश्यकता से अधिक पानी खेत से बाहर चला जाता है। ऐसी स्थिति में खेत में जल भराव की स्थिति पैदा नहीं हो पाती है। जिससे फसल की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन व नाइट्रोजन उपलब्ध होती रहती है।
रबी के मौसम में यही कूड़ सिंचाई के काम में लिए जा सकते हैं। चूंकि इस मौसम में अधिक नमी संरक्षण की आवश्यकता होती है। इसलिए कूड से सिंचाई करने पर रेज बेड में डायरेक्ट केपिलाइरस नहीं बनती है। जिससे बेड में अधिक समय तक नमी बनी रहती है। साथ ही मेढ़ से मेढ़ की दूरी पर्याप्त होने से पौधों की केनोपी को सूर्य की किरणें अधिक से अधिक मिलती हंै।
इस विधि से बुवाई करते समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से.मी. रहती है। फसल की दो कतारों के बीच कूड़ बनने पर कतार से कतार की दूरी 45 से.मी. हो जाती है।
इस विधि में सोयाबीन, मूंगफली, मक्का, चना प्याज, लहसुन (बेड बनाकर हाथ द्वारा व सीधे सीड ड्रिल से) आदि फसलें आसानी से बोई जा सकती है।
इस विधि में रबी सीजन में 2-3 कतारें एक बेड पर तथा खरीफ में 2-6 कतार (आवश्यकतानुसार) प्रति बेड बोई जा सकती है, क्योंकि रबी मौसम में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है जो कि प्रत्येक तीन कतार के बाद बनी कूड से सिंचाई करने पर नमी प्रत्येक कतार की जड़ तक पहुंच सके। खरीफ मौसम में सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है। इस मौसम में ज्यादातर अत्याधिक वर्षा जल को बाहर निकालने के लिये ही कूड़ों का उपयोग किया जाता है। इसलिये कूड से कूड की दूरी अधिक होने पर कोई समस्या नहीं रहती है।
कूड़ एवं नाली पद्धति
फसल बुवाई की यह विधि यथा स्थिति नमी संरक्षण के लिए अपनाई जाती है जिसमें फसल की बुवाई मेढ़ पर की जाती है तथा प्रत्येक दो कतारों के बीच में नाली बनती है। जिससे फसल की कतारें मेढ़ पर आ जाती है। इस विधि से बुवाई करने पर फसल की प्रत्येक कतार दूसरी कतार से 30 से.मी. दूर रहती है। इस विधि से बुवाई करने पर वर्षा ऋतु में अत्यधिक वर्षा की स्थिति में जल भराव की स्थिति उत्पन्न नहीं होती है। बुवाई के तुरंत बाद तेज बारिश हो जाने पर अंकुरण प्रभावित नहीं होता है तथा किसान दोबारा बुवाई की मार से बच जाता है। मेढ़ की उठी हुई मिट्टी में जड़ों का फैलाव अच्छा होने से फसल गिरने की संभावना कम हो जाती है। खरपतवारों का जमाव कम होता है। अत: कर्षण क्रियाएं करने के दौरान फसल को नुकसान कम से कम होता है, क्योंकि कतारों के बीच में पर्याप्त जगह बनी रहती है। रबी मौसम में कूड़ों से सिंचाई करने में सुविधा रहती है।

  • जगदीश पाटीदार
  • डॉ. बरखा शर्मा
  • एस.बी. शर्मा,
    email : kvkratlam@gmail.com

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