पोटेशियम का फसलों में महत्व

जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है वैसे-वैसे खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य बढ़ रहा है, संतुलित खादों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है,संतुलित खाद का मतलब है नाइट्रोजन, फ़ास्फऱोस तथा पोटेशियम को एक आदर्श अनुपात में तथा मिट्टी जांच के आधार पर डालना । सघन कृषि के कारण मृदा में सभी पोषक तत्वों की कमी आई है परंतु किसान नाइट्रोजन और फ़ास्फोरस को ही ज्यादा महत्व दे रहे हंै। पोटेशियम तीसरा आवश्यक तत्व है परन्तु किसान सोचते हैं कि यह भूमि में प्रचुर मात्रा में है परन्तु सघन खेती और संकर किस्मों के प्रयोग के कारण इस तत्व की मात्रा भूमि में बहुत तेजी से घटती जा रही है ।

      फसलों में पोटाश के कार्य

  • यह जड़ों की वृद्धि के लिए बहुत आवश्यक है ।
  • यह अन्य उर्वरकों से प्राप्त तत्वों के संग्रहण को बढ़ावा देकर भोजन बनाने में मदद करता है।
  • एन्जयेमों को क्रियान्वित करने में भी इसका बहुत योगदान है ।
  • यह दानों की चमक तथा प्रोटीन व स्टार्च की मात्रा को बढ़ाता है ।
  • यह पौधों की रोगरोधी तथा कीटरोधी क्षमता को बढ़ाता है।
  • यह फलों व कंदों के आकार को बढ़ाता है तथा तने को कठोरता प्रदान करता है ।
    पौधों में पोटाश की कमी के लक्षण
    सबसे पहले पुरानी पत्तियाँ प्रभावित होती हैं, जिन पर पीले व संतरी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं । इन धब्बों की शरुआत पत्ती की नोक तथा बाहरी ओर से होती है। पत्तियों का रंग हरे से भूरा तथा सिकुड़ जाती हैं । इसके बाद कमी के लक्षण नये पत्तों पर दिखाई देते है जो छोटे व हरे नीले हो जाते हैं। पौधों की जड़ों का कम विकास होता है। इसकी अधिक कमी के कारण पौधे झुलस जाते हैं। पौधों की रोगरोधी क्षमता घट जाती है व दानों का आकार सिकुड़ जाता है।
    पोटाश देने वाले उर्वरक
    मिट्टी की जांच से मिट्टी में पोटाश की मात्रा का पता लगाया जा सकता है। इसकी सहायता से यह पता लगाया जा सकता है कि पोटाश की कितनी मात्रा पौधे को मिट्टी से प्राप्त हो सकती है।
    बाकी पोटाश फसल की मांग के अनुसार रसायनिक खादों के द्वारा दी जा सकती है । भूमि में पोटाश की मात्रा 125 कि.ग्रा./ हेक्टेयर कम, 125 -250 मध्यम तथा 250 से अधिक को अधिक कहा जाता है। कम तथा मध्यम स्तर वाली मृदा में पोटाश खाद का प्रयोग करना अति आवश्यक है ।
    इन सबमें एमओपी पोटेशियम का सबसे उत्तम स्त्रोत माना गया है । इसलिए यह सबसे अधिक प्रयोग होता है। इसको 8-10 से. मी. की गहराई में खेत की तयारी करते समय ही दबा देना चाहिए क्योंकि यह उर्वरक भूमि में चलायमान नहीं है । कई बार कमी होते हुए भी इस तत्व के लक्षण दिखाई नहीं देते ऐसी स्थिति को छिपी हुई भूख कहते है। अत: इसका प्रयोग मिट्टी जाँच के आधार पर करना चाहिए ।
    उपज पर प्रभाव
  • गेहूँ में 12 कि.ग्रा.पोटाश (20 कि.ग्रा. एम ओ पी) प्रति एकड़ से 9 -10त्न उपज बढ़़ती है ।
  • ग्वार में 8 कि.ग्रा.पोटाश डालने से 8 -12त्न तक उपज बढ़ती है ।
  • बाजरा में पोटाश डालने से 10त्न तक उपज बढ़ाई जा सकती है ।
  • बाजरा-सरसों फसल-चक्र में बाजरा में 16 कि.ग्रा. पोटाश (27 कि.ग्रा. एम ओ पी) से बाजरा की उपज 10 -11त्न व सरसों की उपज 6-7 त्न तक बढ़ती है ।
  पोटाश देने वाले उर्वरक :
उर्वरक                      पोटेशियम की मात्रा (%)
म्यूरेट ऑफ पोटाश 60
सल्फ़ेट ऑफ पोटाश 50
नाइट्रेट ऑफ पोटाश 46

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