आधुनिक कृषि में फर्टीगेशन का महत्व

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उर्वरक वितरण तथा फर्टीगेशन:- उर्वरक वितरण द्वारा पौधों में अधिक मात्रा मे उर्वरक का वितरण किया जाता है, जिससे उर्वरक का अधिक नुकसान हो जाता है जबकि फर्टीगेशन मे फसल के पोषक तत्वों की ग्रहण दर के अनुसार सिंचाई जल के साथ फसल की आवश्यकता अनुसार उर्वरक का वितरण किया जाता है। इससे उर्वरक खपत दक्षता बढ़ती है तथा उर्वरक की हानि न्यूनतम स्तर पर होती है।
फर्टीगेशन की आवश्यकता:- सतही सिंचाई प्रणालियों में बारम्बार सतह का गीला तथा सूखा होने के कारण पोषक तत्वों की खपत दक्षता कम हो जाती है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली में जल को फसल की जड़ों के आस-पास ही सीमित रखा जाता है, जिससे जलवायु को उचित अनुपात मे स्थिर रखा जाता है एवं पोषक तत्वों की न्यूनतम हानि होगी तथा उच्च उर्वरक खपत दक्षता दर प्राप्त की जा सकती है।
फर्टीगेशन के लाभ:-

  •     पोषक तत्वों की खपत दक्षता में सुधार।
  •     उच्च फसल उत्पादन।
  •     उर्वरक की खपत दर में कमी की सम्भावना।
  •     उर्वरक किसी भी समय प्रदान किये जा सकते हैं।
  •     पोषक तत्वों को फसल की मांग के अनुसार तय किया जा सकता है।
  •     लीचिंग द्वारा पोषक तत्वों की हानि में कमी।
  •     भू-जल प्रदूषण में कमी।
  फर्टीगेशन सिंचाई जल के साथ उर्वरक पोषक तत्वों को पौधों को प्रदान करने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सिंचाई जल और पोषक तत्वों को एक साथ फसल की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया को सतही सिंचाई प्रणालियों में भी अपनाया जा सकता है, किन्तु इसमें पोषक तत्वों की लीचिंग द्वारा हानि होने की संभावना बनी रहती है।

फर्टीगेशन की हानि:-

  •     यदि सिंचाई प्रणाली में खराबी हो तो पोषक तत्वों का असंतुलित वितरण होता है।
  •     अधिक सिंचाई जल के साथ उर्वरक फसल में उर्वरक की जरुरत से ज्यादा मात्रा में प्राप्त हो जाता है।
  •     असंतुलित नाईट्रोजन की मात्रा के कारण पौधों की अधिक बढ़वार तथा कम उत्पादन की सम्भावना।
  •     ड्रिपरों तथा लेटरल लाईनों के अवरूद्ध होने की संभावना।
  •     अधिकतर उर्वरकों का आयात किया जाता है जिसके कारण उत्पादन लागत अधिक होती है।
  •     जल घुलनशील उर्वरकों पर सब्सिडी उप्लब्ध ना होने के कारण वे काफी महंगे है।

फर्टीगेशन के सिद्धांत-

  •     उर्वरक का पूर्णत: घुलनशील होना आवश्यक है।
  •     उर्वरक को सिंचाई जल में घोलने से पहले सिंचाई प्रणाली में उच्च दबाव होना आवश्यक है।
  •     सिंचाई प्रणाली को बंद करने से पहले 10 से 15 मिनट साफ पानी सिंचाई प्रणाली में प्रवाहित करें ताकि बचा हुआ उर्वरक घुल जाए ताकि एमीटर में पानी अवरुद्ध ना हो।
  •     सिंचाई प्रणाली की अधिकतम अभिकल्पना इस प्रकार हो ताकि सिंचाई जल बेक फ्लो के कारण जल स्त्रोत में ना जाए।

घुलनशील उर्वरकों के स्त्रोत –
नाईट्रोजन उर्वरक:- फर्टीगेशन के लिये विभिन्न उपलब्ध नाईट्रोजन उर्वरकों की अपेक्षा यूरिया ही एकमात्र उर्वरक है जिसे बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है इसके पश्चात अमोनियम सल्फेट का प्रयोग किया जाता है।
फास्फोरिक उर्वरक:- सभी फस्फोरिक उर्वरक फर्टिगेशन के लिये घुलनशील उर्वरक स्त्रोत के लिए उपयुक्त नहीं है। किसान अधिकतर डाई अमोनियम फास्फेट का उपयोग घुलनशील उर्वरक के रूप में कर रहे है, किंतु इसे संतुलित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इससे सिंचाई प्रणाली के अवरुद्ध होने की सम्भावना बनी रहती है, आर्थोफास्फोरिक एसिड को फास्फेट स्त्रोत के लिए प्रयोग किया जाता है।
पोटेशियम उर्वरक:- पोटेशियम सल्फेट को पानी में घोलकर उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है. इस घोल को रातभर रखने के पश्चात अगले दिन उर्वरक के रुप मे प्रयोग किया जा सकता है।
फर्टीगेशन के लिए उपयुक्त उर्वरक:- ड्रिप सिंचाई प्रणाली मे प्रयोग किये जाने वाले उर्वरक जो की फर्टीगेशन के लिये उपयुक्त है उन्हें आयात किया जाता है एवं इस कारण से उर्वरकों की लागत में वृद्धि हो जाती है। कुछ उर्वरकों के ग्रेड निम्न प्रकार से है :-
फर्टीगेशन में उर्वरक प्रदान करने की दर:- सतही सिंचाई प्रणालियो में उर्वरक को 2-3 बार दिया जाता है परंतु ड्रिप फर्टीगेशन में उर्वरक को ज्यादा से ज्यादा बार फसल की आवश्यकता अनुसार प्रदान किया जाता है। प्रत्येक उर्वरक की मात्रा फसल तथा उसके फसल-चक्र के समय पर निर्भर करती है। कम समय की फसलों में 10-15 दिन के अंतराल में उर्वरक प्रदान कर सकते हैं एवं वार्षिक या अधिक समय की फसलों में लगभग 30 दिन का अंतराल उपर्युक्त रहता है।
फर्टीगेशन उपकरण:- जल में घुलनशील उर्वरको को सिंचाई प्रणाली में इजैक्ट करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को उर्वरक टैंक, वैचुरी अथवा उर्वरक पम्प की सहयता से पूरा किया जा सकता है।

पोषक तत्व उर्वरक खपत दक्षता दर
 छिड़काव     विधि        ड्रिप   विधि ड्रिप + फर्टीगेशन
नाईट्रोजन 40 65 85
फास्फोरस 20 30 45
पोटेशियम 50 60 50

 

         उर्वरक को जल धारा में प्रवेश करवाने की विधियां

 उर्वरक अथवा रसायनों को सूक्ष्म सिंचाई पद्धति के भीतर दो प्रकार से प्रवेश करवाया जा सकता है:
वैचुरी प्रणाली:– दबाव में भिन्नता की तकनीक प्रणाली के दबाव ऊंचाई के भेद पर निर्भर करती है। दबाव में भिन्नता वाल्व, वैचुरी, एल्बो अथवा पाईप मे घर्षण द्वारा पैदा किया जा सकता है. उर्वरक टैक को प्राय: भिन्न दबाव की तकनीक में प्रयोग किया जाता है। उर्वरक टैंक को सिंचाई प्रणाली के दबाव को झेलने की क्षमता होनी चाहिए। भिन्न दबाव पर आधारित उपकरणों का मुख्य लाभ प्रणाली में चलने वाले कलपुर्जो का मौजूद न होना है। वह चलने में आसान होते हैं तथा उनको चलाने के लिए किसी भी प्रकार की बिजली, पैट्रोल, डीजल तथा पानी से चलने वाले पम्प की आवश्यकता नहीं होती है। भिन्न दबाव की मुख्य हानि उर्वरक प्रदान करने की गति सामान्य नहीं रहती है तथा यह समय के साथ बदलती रहती है, इसलिए पोषक तत्वों की समानता एवं एकरूपता बनाए रखना सम्भव नहीं है।
पम्प द्वारा उर्वरक का सिंचाई जल धारा में प्रवेश:- उर्वरक एवं रसायन को पम्प की सहायता से सिंचाई जल धारा में धकेलना उनकी पूर्व निर्धारित मात्रा में प्रदान करने की उपर्युक्त विधि है। उर्वरक को तरल अवस्था में एक दबाव रहित टैंक से उठाया जाता है। पम्प के द्वारा उर्वरक को सिंचाई जल तक लगभग समानता से एवं एकरुपता में पहुंचाया जा सकता है। पम्पिंग दर अथवा  मूल रसायनिक द्रव्य की दर को संतुलित कर वांछित मात्रा में सिंचाई जल धारा तक पहुंचाया जा सकता है। सिंचाई जल धारा का बहाव एवं उर्वरक बहाव को अलग-अलग नियंत्रित किया जा सकता है। जल बहाव दर में बदलाव, शक्ति संचार में बाधा

और यांत्रिक असफलता द्वारा उर्वरक की पूर्व निर्धरित मात्रा का उपयोग असम्भव हो जाता है। इस पद्धति की दूसरी होनी इसमें अतिरिक्त शक्ति स्त्रोत की आवश्यकता होती है और इसकी लागत अधिक होती है। हाइड्रोलिक मोटर जिसे पाईप लाईन के दबाव से संचालित लिया जा सके, इस समस्या से निजात दिला सकती है।
उर्वरक वितरण प्रणालियों में वेंचुरी प्रणाली की लागत लगभग 1250/- प्रति इकाई होती है, जो अन्य प्रणालियों की अपेक्षा न्यूनतम है। उर्वरक की वितरण टैंक की लागत लगभग 3500/-प्रति इकाई होती है। उर्वरक पम्प की लागत लगभग 12000/-प्रति इकाई है तथा यह सभी अन्य प्रणालियों की अपेक्षा उच्चतम है।

 

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