मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का सोयाबीन पर प्रभाव एवं बचाव

मिट्टी की दशा
सोयाबीन की खेती अति अम्लीय, क्षारीय व रेतीली मिट्टी को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। किसान भाईयों खेती वाली मृदा में अच्छा जल निकास होना चाहिए तथा जैविक कार्बन की मात्रा भी अच्छी होनी चाहिए। मृदा जैसे दोमट, मटियार व काली मिट्टी में सोयाबीन का उत्पादन सफलता पूर्वक किया जा सकता हैं। किसान भाई भूमि को कटाव से बचाने के लिए मिट्टी, पत्थर, गेबियन संरचना से मेड़ बनाएं व जल निकास की व्यवस्था करें एवं खेत के आस पास मेड़ के स्थान पर नालिया बनाएं। ये नालियां भूमि में संवर्धन के साथ ही खेत से बहकर जाने वाली मिट्टी को इक्कठा करने में सहायक होती है। सोयाबीन के लिए चिकनी भारी उपजाऊ, अच्छे जल निकास वाली तथा ऊसर रहित मिट्टी उपयुक्त रहती है। फसल की अच्छी वृद्धि के लिए खेत को भली-भांति तैयार करना चाहिए। गरमी के मौसम में एक गहरी जुताई करनी चाहिए। जिससे भूमि में उपस्थित कीड़े, रोग एवं खरपतवार के बीजों की संख्या में कमी आ जाये तथा जल धारण की क्षमता में वृद्धि हो। खेत से पूर्व बोई गई फसल के अवशेष व जड़ें निकाल देनी चाहिए एवं गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट मिला दें. उसके बाद दो बार कल्टीवेटर से जुताई कर भूमि को भुरभुरी कर खेत को समतल कर ले.खेत की अच्छी तैयारी अधिक अंकुरण के लिए आवश्यक है ।
नमी
किसान भाइयो सोयाबीन की बुवाई मानसून आने के साथ ही करनी चाहिए और ये ध्यान रखना चाहिए की बुवाई के समय भूमि के अन्दर कम से कम 10 सेमी. तक पर्याप्त नमी हो। साधारणतया सोयाबीन की बोवनी का उचित समय जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह का होता है। बोवनी सीड ड्रिल या हल के साथ नायला बांधकर पंक्तियों में 30 से 45 सेमी. की दूरी पर करें तथा पौधों की संख्या 4.50 लाख प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए। अच्छे अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी का होना भी अत्यंत ही आवश्यक है। सोयाबीन फसल की अवधि लगभग 100 से 120 दिनों की होती हें।

किसान भाईयों जैसा की आप जानते हैं कि सोयाबीन की फसल साधारणतया शीत से लेकर साधारण उष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है। और इसकी बोवनी मानसून आने के साथ ही जबकि खेत में पर्याप्त नमी हो, करनी होती है । जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम पहले से ज्यादा विपरीत रहने लगा है और मानसूनी फसल होने के नाते मौसम की इन विपरीत परिस्थितियों का सोयाबीन की बोवनी एवं इसकी वृद्धि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत: मौसम की इन प्रतिकूल परिस्थितियों में सोयाबीन की अच्छी फसल लेने के लिए हमें न केवल बोवनी के समय अपितु इसकी वृद्धि एवं फलियों के भराव के समय भी अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। विशेष तौर पर बोवनी के समय तापमान,वर्षा की अधिकता से नमी की अधिकता एवं नमी की कमी, मिट्टी की दशा इत्यादि का विशेष ध्यान रखना होता है।

सोयाबीन में पौधों के अच्छे अंकुरण के लिए अधिक नमी तथा लगातार कम नमी दोनों ही दशाएँ हानिकारक हैं। अंकुरण के पशचात कुछ समय तक अधिक या कम नमी का पौधों पर कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता हैं अच्छी फसल के लिए कम से कम 60-75 से. मी. वर्षा की आवश्यकता होती हैं। यदि पुष्पीय कलियां विकसित होने से 2 से 4 सप्ताह पूर्व पानी की कमी हो जाये तो इसमे पौधों की वानस्पतिक वृद्धि घट जाती हे। परिणामस्वरूप बहुत अधिक संख्या में फूल तथा फलियां गिर जाती है। फलियों के पकते समय वर्षा होने पर फलियों पर अनेक बीमारियाँ लग जाती हैं जिससे वे सड़ जाती है तथा बीज की उत्पादकता भी घट जाती हैं। अत: फलियों के पकने के समय वर्षा का होना सोयाबीन के लिए हानिकारक होता है।
तापमान
सोयाबीन के बीज 20-30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर केवल 3-4 दिन में ही अंकुरित हो जाते हैं। जबकि 16 डिग्री सेल्सियस पर अच्छा अंकुरित होने में 7-10 दिन लगते हैं और 10 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पौधे की वृद्धि बहुत ही कम होती है। सोयाबीन के फूल आने के समय तापमान का विशेष प्रभाव पड़ता हें 24से 25 डिग्री सेल्सियस तक प्रति 10 डिग्री की वृद्धि होने पर फूल आने का समय 2-3 दिन बढ़ जाता है। बहुत अधिक तापमान 38-40 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर भी सोयाबीन की वृद्धि विकास एवं बीजं के गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। तापमान कम होने पर तेल की मात्रा घट जाती है।
प्रकाश अवधि
सोयाबीन की अधिकांश किस्मों में दिन छोटे व रातें लम्बी होने पर ही फूल आता हैं। फूल आने के समय फलियाँ लगने की अवधि, पकने की अवधि, गांठों की संख्या तथा पौधों की ऊंचाई पर दिन की लम्बाई का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। दिन बड़े होने पर उपरोक्त सभी अवस्थाओं की अवधि में वृद्धि हो जाती है। सोयाबीन में फूल तभी आता है। जबकि दिन की लम्बाई एक क्रांतिक अवधि से कम हो इसलिए इसको अल्प प्रकाश पक्षी पौधा भी कहते हैं।
अत: किसान भाईयों सोयाबीन की अच्छी फसल लेने के लिए हमें बदलते मौसम का भी विशेष ध्यान रखना होगा और समय रहते इससे बचाव भी करना होगा तभी हम प्रतिकूल परिस्थितियों में अच्छी फसल ले सकते हैं|

  • महाराज सिंह
  • शिवानी नागर
    भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इंदौर
    email : ms_drmr@rediffmail.com

www.krishakjagat.org

One thought on “मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का सोयाबीन पर प्रभाव एवं बचाव

  • June 18, 2018 at 6:01 PM
    Permalink

    Aadarniya sir’,
    jalwaayu parivartan se soyabeen phasal me anukoolan kaise
    Kare taaki soyabeen fasal fayede ka souda ban pae. kripya is baare me jaroor se jaroor batae.

Comments are closed.

Share