फसल अवशेष के प्रभाव एवं प्रबंधन

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मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव -फसल अवशेषों को जलाने के कारण मृदा ताप में वृद्धि होती है। जिसके फसलस्वरूप मृदा सतह सख्त हो जाती है एवं मृदा की सघनता में वृद्धि होती है साथ ही मृदा जलधारण क्षमता में कमी आती है तथा मृदा में वायु-संचरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
मृृदा पर्यावरण पर प्रभाव – फसल अवशेषों को जलाने से मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों की संख्या पर बुरा प्रभाव पड़ता है और इसके कारण लाभदायक कीटों की संख्या में कमी आती है।
मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों की कमी – फसल अवशेषों को जलाने के कारण मृदा में उपस्थित मुख्य पोषक तत्थ्व नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की उपलब्धता में कमी आती है।
मृदा में उपलब्ध कार्बनिक पदार्थ में कमी – फसल अवशेष जलाने से मृदा में उपस्थित मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की उपलब्धता में कमी आती है।
वायु प्रदूषण – खेतों में फसल अवशेषों को जलाने के कारण अत्यधिक मात्रा में वायु प्रदूषण होता है। साथ ही ग्रीन हाउस गैसें जैसे- कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस आक्साइड आदि का उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी उत्तरदायी      होता है।
जानवरों के लिए चारे की कमी – फसल अवशेषों को पशुओं के लिए सूखे चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है अत: फसल अवशेषों को जलाने से पशुओं को चारे की कमी का सामना करना पड़ता है।
फसल अवशेष प्रबंधन – फसल परिस्थितिकी में पोषक तत्थों का पुन: चक्र एक आवश्यक घटक है। यदि किसान उपलब्ध फसल अवशेषों को जलाने की बजाए उनको वापस भूमि में मिला देते हैं तो निम्न लाभ प्राप्त होते है।
कार्बनिक पदार्थ की उपलब्धता में वृद्धि – कार्बनिक पदार्थ ही एकमात्र ऐसा स्रोत है जिसके द्वारा मृदा में उपस्थित विभिन्न पोषक तत्व फसलों को उपलब्ध हो पाते हैं तथा कम्बाइन द्वारा कटाई किए गए प्रक्षेत्र उत्पादित अनाज की तुलना में लगभग 1.29 गुना अन्य फसल अवशेष होते हैं। ये खेत में सड़कर मृदा कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करते हैं।
पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि – फसल अवशेषों में लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्वों के साथ 0.45 प्रतिशत नाइट्रोजन की मात्रा पाई जाती है, जो कि एक प्रमुख पोषक तत्व है।
मृदा के भौतिक गुणों में सुधार– मृदा में फसल अवशेषों को मिलाने से मृदा की परत में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढऩे से मृदा सतह की कठोरता कम होती है तथा जलधारण क्षमता एवं मृदा में वायु-संचरण में वृद्धि होती है।
मृदा की उर्वराशक्ति में सुधार – फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने से मृदा के रसायनिक गुण जैसे उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा, मृदा की विद्युत चालकता एवं मृदा पीएच में सुधार होता है।
फसल उत्पादकता में वृद्धि– फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने पर आने वाली फसलों की उत्पादकता में भी काफी मात्रा में वृद्धि होती है। अत: मृदा स्वास्थ्य पर्यावरण एवं फसल उत्पादकता को देखते हुए फसल अवशेषों को जलाने की बजाए भूमि में मिला देने से काफी लाभ होता है।

भारत में अधिकांश किसान भाई एक फसल के बाद दूसरी फसल की जल्दी बुवाई करने के लिए पहली फसल के अवशेषों को खेत में जला देते हैं। फसल अवशेषों को जलाए जाने से न केवल मृदा की उर्वराशक्ति में कमी आती है बल्कि अवशेषों से निकलने वाले धुएं से पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। यदि फसल अवशेषों का उचित प्रबंध कर उसे खाद के रूप में परिवर्तन कर दिया जाए तो जहाँ एक ओर इससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा वहीं दूसरी ओर महंगे रसायनिक उर्वरकों के खर्च में भी कटौती होगी। साथ ही अवशेष के बाद के रूप में प्रयोग से पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। फसल अवशेषों को जलाने से निम्न दुष्प्रभाव होते हैं।

फसल अवशेषों से प्राप्त कार्बनिक पदार्थ भूमि में जाकर मृदा पर्यावरण में सुधार कर सूक्ष्मजीवी अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। जिससे कृषि टिकाऊ रहने के साथ-साथ उत्पादन में वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।
फसल अवशेष के प्रभाव एवं प्रबंधन
मृदा को स्वस्थ रखने के लिए फसल अवशेषों का पुन: चक्रण, भूमि में सीधा मिलाकर सड़ा-गला देने से पोषक तत्वों की उपलब्धता तो बढ़ती ही है साथ ही इसका मिट्टी के गुणों पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

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