शाकीय फसलों में प्रमुख प्राकृतिक शत्रुओं को पहचानें

कोक्सीनैलीडस : शाकीय फसल के खेतों में सोनपंखी भृंग प्रचलित रूप से पाये जाते हैं। सोनपंखी भृंग चेपों, सफेद मक्खी, स्केल कीटों, बॉल वर्म, अन्य कीटों और कुटकियों के परभक्षी होते हैं। वे अण्डों, निम्फों और वयस्कों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं विशेष रूप से ये बड़ी मात्रा में चेंपा से भोजन प्राप्त करते हैं। लार्वा, वयस्कों की अपेक्षा अधिक दक्ष परभक्षी होते हैं विशेष रूप से चौथा इनस्टार लार्वा अन्य इनस्टारों की अपेक्षा अधिक खाऊ भक्षक होते हैं। वे दिखने में बहुत उग्र होते हैं जिससे अक्सर लोगों को यह भ्रम होता है कि वे बहुत नुकसान पहुँचा सकते हैं जो कि सत्य नहीं है। सोनपंखी भृंग में नर भक्षण भी पाया जाता है। सी. सैप्टमपंकटाटा: वयस्क आधे मटर के आकार का होता है। पीले से लाल भूरा होता है और इसके इलाइट्रा पर सात काले धब्बे होते हैं। सिर और अधर सिरा दोनों काले रंग के होते हैं। प्यूपा हल्के भूरे रंग का होता है जिस पर काले बिन्दु लगे होते हैं। और ये पिछले सिरे की पत्तियों पर लगे हुए होते हैं। अण्डा 1-2 मि.मी. लम्बा और पीले रंग का होता है। मीनोकाईलिस सेक्समाकुलेट्स: काले धब्बों वाला सोनमुखी भृंग है। अवतानित आधार पर लम्बा और संकरा काला बैण्ड छोटे और संकरे अनुदैध्र्य संकीर्णन या लाइन द्वारा अनुप्रस्थ अण्डाकार काले विम्बीय स्थल से जुड़ा होता है।
ग्रीन लेस विंग्स: क्राइसोपा चेंपा, कुटकी, फुदका, सफेद मक्खी, थ्रिप्स, बॉलवर्म और अन्य अनेक छोटे कीटों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। वयस्क मध्यम आकार के, 1-2 से.मी. लंबे, हरे, पीले हरे या कभी-कभी भूरे होते हैं। इनकी सुनहरी आंखें होती हैं और नाजुक नेटदार पंख होते हैं। लार्वा, जो कि बहुत अधिक सक्रिय होते हैं, धूसर या भूरे रंग के होते हैं तथा ऐलीगेटर प्रकार के होते हैं। इनकी पूरी तरह विकसित टांगें होती हैं और लंबी चिमटियां होती हैं और वे 1 मि.मी. से 6-8 मि.मी. तक बढ़ते हैं। जो कि कुछ ही दिनों में धूसर रंग के हो जाते हैं। युवा लार्वे निर्जलीकरण के संवेदनशील होते हैं। उन्हें नमी के स्रोत की आवश्यकता होती है।

मकड़ी: मकडिय़ां व्यापक रूप से होती हैं और वे अनेक कीटों से अपना भोजन प्राप्त करते हुए उत्कृष्ट परभक्षी होती हैं। मकड़ी की कुछ प्रजातियां अपने शिकार को पकडऩे के लिए जालों का प्रयोग करती हैं जबकि अन्य प्रजातियां अपना शिकार लुक-छिपकर करती हैं। कुछ मकडिय़ां चींटियों को भी खाती हैं। वृत्ताकार जालों को बुनने वाली ये मकडिय़ां अपने शिकार को पकडऩे के लिए अपने जालों का जल्दी-जल्दी फिर से निर्माण करती हैं, उनका पुन: चक्रण करते हुए अर्थात् इस प्रक्रिया में पुराने जाल को खाते हुए।
सिरफिड मक्खी: सिरफिड मक्खी की अनेक प्रजातियां चेपा और साथ ही मिली बग, सफेद मक्खियों, लैपिडॉप्टेरीन लार्वा और लाभप्रद कीटों के परभक्षी होती हैं। वयस्क सामान्यतया चमकदार रंग के, मधुमक्खियों और बर्रों से मिलते-जुलते होते हैं। सिरफिड लार्वा दिखने में और आदतों में भिन्न-भिन्न होते हैं। वे या तो अविकल्पी या विकल्पी परभक्षी होते हैं। लार्वे कुछ-कुछ लोष्ट प्रकार के होते हैं और सिर की तरफ से शुंडाकार होते हैं। प्यूपों की आकृति विशेष प्रकार से रेजिन बिन्दु प्रकार की होती हैं।

प्रेइंग मेंटिस: प्रेइंग मेंटिस परभक्षी होते हैं और वे जीवित कीटों का शिकार करते हैं। वे अपने शिकार का पास आने के लिए इंतजार करते हैं और फिर तेजी से उनको पकड़ लेते हैं। मेंटिस अपने शिकार पर आक्रमण करने के लिए आगे की दो टांगों का इस्तेमाल करते हैं। वे रात के समय सक्रिय होते हैं। वयस्क प्रेइंग मेंटिस लंबाई में 1 से.मी. से लेकर अनेक इंचों तक अलग-अलग आकार के होते हैं। वे अपने आस-पास के वातावरण में घुल जाते हैं और उनकी नजर बहुत तेज होती है। इनमें प्राय: लैंगिक नर भक्षण भी देखा गया है।

ड्रेगन फलाई: वे परभक्षी के रूप में काम करते हैं क्योंकि वे मच्छरों और अन्य नुकसानदायक छोटे कीटों जैसे मधुमक्खियों, तितलियों और मक्खियों को खाते हैं। उनके लार्वा जलचर होते हैं। वे अपने शिकार को स्पाइकों से भरी हुई टांगों से कसकर पकड़े रखती हैं। वे अपने शिकार को अपने फैलाये जा सकने वाले जबड़ों का प्रयोग करते हुए पकड़ती हैं। वयस्क ड्रेगन फ्लाई की जीवन अवधि केवल कुछ ही महीने है। इसका अधिकांश जीवन जल सतह के नीचे लार्वा की स्थिति में ही बीत जाता है। मादा ड्रेगन फलाई प्राय: पानी में तैरने वाले या जलमग्न पौधों पर या उसके आस-पास अंडे देती हैं। बड़ी ड्रेगन फ्लाई की लार्वा स्थिति पांच वर्षों तक चल सकती है।
डैमसल फ्लाई: वे जलीय वनस्पति और नहरों और तालाबों के नीचे पैदा होती हैं। वे जलीय कीटों और अन्य संधिपादों को खाती हैं। डैमसल फ्लाई वयस्क अपना शिकार पकडऩे के लिए अपनी टांगों को इस्तेमाल करती हैं जो कि बालों से ढकी होती हैं। वे अपने शिकार को अपनी टांगों में पकड़ लेता है और उसे चबाते हुए खा जाता है। वयस्क सामान्यतया पानी के नजदीक पाए जाते हैं। डैमसल फ्लाई के लंबे पतले शरीर होते हैं और वे प्राय: हरे, नीले, लाल, पीले, काले या भूरे चमकदार रंगों के होते हैं।
ट्राइकोग्रामा प्रजाति: ट्राइकोग्रामा बहुत ही छोटे बर्र होते हैं। वे बेधकों के परजीवी होते हैं। परजीवी अण्ड कार्डों को पौधे की पत्तियों के निचले किनारे की तरफ स्टैपल किया जा सकता है जिससे कि परजीवी उभर सकें और परपोशी अण्डों पर आक्रमण कर सकें। प्रत्येक मादा लगभग 100 अण्डों का परजीवन करती है। छोटा जीवन चक्र होने के कारण बर्रों की जनसंख्या तेजी से बढ़ती है ट्राइकोग्रामा 75 प्रतिशत आद्र्रता के साथ 23-25 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर सक्रिय होता है। प्राकृतिक शत्रुओं की रक्षा करने वाली और उन्हें प्रोत्साहित करने वाली तथा नाशीजीवों पर उनके प्रभाव को बढ़ाने वाली फसल पद्धतियों का प्रयोग करते हुए परजीवियों का संरक्षण महत्वपूर्ण है। ट्राइकोग्रामा वाणिज्यिक सप्लायरों के पास आसानी से उपलब्ध है।

न्यूक्लियर पॉलीहिड्रोसिस वायरस: एनपीवी एक विशिष्ट प्रकार का रोग है। पौधों पर शाम के समय किसी भी स्प्रडेर/स्टिकर या डिटर्जेंट पाउडर के 0.5 प्रतिशत और 0.1 प्रतिशत जैगरी घोल जैसे सहौशधों संयोजकों के साथ 250 एल ई/हेक्टर की दर से विषाणु घोल का छिड़काव किया जाता है। यह तम्बाकू की इल्ली अैर सभी शाकीय फसलों पर फल बेधकों के विरूद्ध बहुत अधिक प्रभावकारी है। लार्वा जब एक बार विषाणु संदूषित पत्तियों को खा लेते हैं तो वे एनपीवी से संक्रमित हो जाते हैं। संक्रमित लार्वा आलसी हो जाता है और भोजन करना बंद कर देता है। बाद में संक्रमित लार्वा काला हो जाता है। यह पर्ण समूह पर टंगा हुआ देखा जाता है। न्यूक्लिलयर पॉलीहाइड्रोसिस वायरस में अनेक पॉलीहेड्रिल समावेशी कायाएं होती हैं जिनमें कि छड़ की प्रकार के विषाणु कण होते हैं। यह शहद की मक्खियों, मछली, स्तनधारियों और कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं के लिए सुरक्षित हैं और इन्हें ठण्डे स्थान पर संग्रहित किया जा सकता है।

परभक्षी बर्र: पीले बर्र अनेक कीटों को अपना शिकार बनाते हैं जिन्हें कि नाशीजीव माना जाता है। वे मधुमक्खियों का भी शिकार करते हैं लेकिन मधुमक्खियों से अलग इन बर्रों की कॉलोनियां प्रत्येक सर्दी के मौसम के प्रारम्भ होने पर ही मर जाती हैं। प्रत्येक सामाजिक बर्र कॉलोनी में एक रानी और अनेक मादा कमेरी शामिल होती हैं और अनेक प्रकार की बांझ रानियां भी होती हैं। कॉलोनी का आकार और संरचना भिन्न-भिन्न होती है और यह कुछ दर्जन से लेकर हजारों तक हो सकती है।

मनुष्य को इनके द्वारा काटे जाने का पता उसको होने वाली एलर्जी से चलता है।
कोटेशिया: कोटेशिया इल्लियों जैसे तम्बाकू की इल्ली और चने की इल्ली का परजीवी है। कोटेशिया प्रजाति के वयस्क छोटे, गहरे रंग के बर्र होते हैं और छोटी मक्खियों से मिलते-जुलते होते हैं। उनके दो जोड़ी पंख होते हैं, पिछे के पंख आगे के पंखों से छोटे होते हैं। एन्टीना 1.5 मि.मी. लंबे और ऊपर की तरफ गोलाई लिए हुए होते हैं (मुड़े हुए नहीं होते)। मादा का पेट संकरा होता हुआ बाहर की ओर मुड़ा होता है जिसे कि ऑविपॉजीटर कहते हैं जिसे वह अंडे देती है। प्यूपा परपोषी लार्वा या पौधे की पत्तियों से जुड़े पीले, रेशमी कोकून के अनियमित द्रव्य के रूप में होते हैं।

  • डॉ. राम गोपाल सामोता
  • डॉ. ममता देवी चौधरी
  • डॉ. के. सी. कुमावत
  • डॉ. अख्तर हुसैन

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