धान में पोषक तत्वों का महत्व

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धान में पोषक तत्वों का महत्व – धान की अधिक पैदावार के लिये एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन एक महत्वपूर्ण उपाय हैं, जिसमें रसायनिक उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व, जैविक उर्वरक, हरी-नीली शैवाल, गोबर की खाद एवं हरी खाद आदि का समुचित उपयोग किया जाता हैं। धान के उत्पादन में मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन (नत्र), फास्फोरस (स्फुर), पोटाश, जिंक (जस्ता) आदि महत्वपूर्ण हैं जिनकी भरपाई किसानों द्वारा रसायनिक उर्वरकों की मदद से की जाती हैं, किंतु एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन सभी प्रकार के आदानों को आवश्यकतानुसार उपयोग करके को बढ़ावा देता हैं। मृदा के स्वास्थ्य को बनाये रखने, मृदा की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने एवं लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाने के लिये एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हैं।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन का सबसे पहला सिद्धांत यह है, फसल लेने के पूर्व मृदा प्रयोगशाला में मृदा की जांच कराई जाये ताकि जांच की रिपोर्ट के आधार पर मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों की जानकारी प्राप्त हो सके, जिसके आधार पर पोषक तत्वों की सही मात्रा खेत में डाली जा सके। अपितु सामान्य तौर पर किसान भाई अपनी मृदा की जाँच नहीं कराते हैं, अत: धान की फसल के लिये 80-100 किलो/हैक्टेयर नाइट्रोजन, 50-60 किलो/हैक्टेयर फास्फोरस एवं 30-50 किलो/हैक्टेयर पोटाश की मात्रा की सिफारिश की जाती है। खेत तैयार करते समय खेत में सड़ी हुई गोबर खाद अथवा कम्पोस्ट खाद का 10-12 टन का प्रयोग किया जाये तो इससे नाइट्रोजन का अधिक उपयोग हो पाता हैं एवं पोषक तत्व प्राप्त होने के साथ-साथ मृदा का भौतिक स्तर में भी सुधार होता हैं।

नाइट्रोजन
यूरिया, नाइट्रोजन का सर्वाधिक उपयोग होने वाला स्तोत्र है, यूरिया से प्राप्त होने वाली नाइट्रोजन की बर्बादी कम करने के लिये यूरिया की संपूर्ण मात्रा को धान की फसल में 3 बार में उपयोग करना चाहिए। यूरिया की पहला मात्रा मतलब एक तिहाई भाग प्रारंभिक डोज के रूप में रोपाई करने के पूर्व दिया जाना चाहिए, जिससे मृदा को नाइट्रोजन प्राप्त हो सके। इसके उपरांत दूसरी मात्रा कल्ले फूटने की पहली स्टेज में टॉप ड्रेसिंग के रूप में दी जाती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि, टॉप डे्रसिंग के समय खेत से पानी की निकाशी कर देना चाहिए, आवश्यकता पडऩे पर 24 घंटे के उपरांत ही खेत में पानी भरना चाहिए। टॉप ड्रेसिंग से उपज में वृद्धि होती है। यूरिया की तीसरी मात्रा अर्थात् शेष एक तिहाई भाग पुष्प आने के एक सप्ताह पूर्व में डालनी चाहिए। इससे धान की बलियों की संख्या और मोटाई दोनों बढ़ जाती हैं। दाना बनने के पश्चात उर्वरक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

फास्फोरस
धान की अच्छी उपज लेने के लिए फास्फोरस का उपयोग उपयुक्त मात्रा में होना आवश्यक हैं। सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग सभी प्रकार की मृदाओं में उपयोगी माना गया हैं। फास्फोरस, धीरे-धीरे पौधे की जड़ों द्वारा खींचा जाता है, जो जड़ों की वृद्धि के लिए बहुत उपयोगी है।

पोटाश
धान की फसल में 40-50 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर डालने की सिफारिश की जाती हैं। काली एवं भारी मृदा में पोटाश की सारी मात्रा एक साथ बेसल डोज के रूप में डालनी चाहिए, मुख्यत: काली एवं भारी मृदा में पोटाश की मात्रा कम डालनी चाहिए।

जस्ते का महत्व
ऐसा मृदा जिसमें जस्ते की कमी पाई जाती है उनमें जस्ते की कमी के कारण फसल में कल्ले फूटने में कमी, पौधों में असमान वृद्धि, बौने पौधों की पत्तियों में भूरे रंग के धब्बे पडऩा एवं नयी पत्तियों की निचली सतह की मिडरिव में हरिमाहीनता पत्तियों का अपेक्षाकृत सकरा होना, आदि लक्षण दिखाई देते हैं। मृदा में जिंक (जस्ते) की इस कमी को पूरा करने के लिये जिंक सल्फेट की 25 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अंतिम पडलिंग की समाप्ति के समय डालनी चाहिए। जिंक का मृदा में उपयोग खड़ी फसल में पर्णीय छिड़काव करने से कहीं अधिक फायदेमंद होता है। जिंक की कमी से धान की फसल में खैरा रोग होता है, जिसके निदान के लिये 1 किलोग्राम जिंक सल्फेट एवं 5 कि.ग्रा. यूरिया को 200 ली. पानी में घोल कर प्रति एकड़ छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पडऩे पर 7 दिनों के अंतराल में पुन: इसका छिड़काव किया जा सकता हैं।

आयरन (लौह) एवं गंधक की कमी की पूर्ति
लोहे की कमी को क्लोरोसिस के नाम से जाना जाता है। लोहे की कमी को दूर करने के लिये 1 कि.ग्रा. फेरस सल्फेट को 100 ली. पानी में घोल कर सात दिनों में एक बार छिड़काव करना चाहिए। ढैचा की फसल से तैयार की गई हरी खाद का उपयोग भी धान की फसल में लोह तत्व की पूर्ति करता है। 0.2 टन/हैक्टेयर जिप्सम पायरायट देने से लोहे एवं गंधक की आवश्यकता पूरी होती हैं।

जैव उर्वरकों का उपयोग
रसायनिक खादों की बढ़ती कीमतों के कारण जैव उर्वरकों के उपयोग के प्रति किसानों का ध्यान बढ़ा हैं। बीज उपचार के अतिरिक्त जैव उर्वरकों का उपयोग कई प्रकार से किया जा सकता है। एजेक्टोबेक्टर, एजोस्पाइरिलम एवं पी.एस.बी. का उपयोग धान की फसल के लिये उपयोगी है। रोपाई के समय पौधों की जड़ों को जैविक खाद के घोल में 15 मिनट तक डुबोकर रखने के बाद रोपाई की जा सकती है। एजेक्टोबेक्टर के प्रयोग से धान में नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ती है, वहीं पी.एस.बी. का उपयोग फसल में फास्फोरस उपलब्ध कराता हैं।

हरी-नीली शैवाल का उपयोग
हरी-नीली शैवाल एक प्रकार का संश्लेषण जीवाणु हैं। जिसे संश्लेषक नाइट्रोजन फिक्सिंग एजेंट भी कहते हैं। हरी-नीली शैवाल के लिए जलयुक्त धान का खेत (तराई) एक आदर्श पारिस्थितिकी तंत्र है। हरी नीली-शैवाल, खेत में भरे हुए पानी में वृद्धि कर एक चटाई का आकार लेती जाती है एवं नाइट्रोजन के फिक्सिंग का काम करती है।
इस प्रकार केवल रसायनिक अथवा जैविक उर्वरकों का उपयोग करने की अपेक्षा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन का अधिक महत्व है। धान की भरपूर पैदावार लेने के साथ-साथ मृदा की उर्वरता बढ़ाने में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन उपयोगी है जो कम खर्चीली, असरदार एवं टिकाऊ पद्धति है।

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