सोयाबीन के हानिकारक कीट

नीला भृंग (ब्लू बीटल)
यह कीट गहरे चमकीले नीले रंग (लगभग काला) का होता है। जिसका सिर नारंगी रंग का होता है। हल्के से स्पर्श मात्र से ही यह भूमि पर गिर जाता हे एवं मृतप्राय सा पड़ा रहता है। यह कीट पहले अंकुरित सोयाबीन के दलपत्रों को खाता है, तत्पश्चात पौधे के वृद्धि वाले भाग को खाकर नष्ट कर देता है जिससे पौधे की वृद्धि रूक जाती है। अधिक आक्रमण होने पर खेत में पौधों की संख्या घट जाती है। इस कीट का आक्रमण प्राय: 20-25 दिन तक रहता है। यह पाया गया है कि बोवाई के बाद जब लगातार वर्षा के कारण भूमि में अधिक नमी बनी रहती है, तब इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। इसके प्रबंधन के लिए क्विनालफॉस 25 ई.सी. 1.5 लीटर/हेक्टे. की दर से अंकुरण के 7-10 दिन में प्रकोप होने पर उपयोग करना चाहिए।
तना मक्खी (स्टेम फ्लाय)
यह कीट सोयाबीन उत्पादन करने वाले प्राय: सभी क्षेत्रों में फसल को ग्रसित करता है। वयस्क मक्खी साधारण घरेलू मक्खी के समान किन्तु आकार में लगभग 2 मि.मी. एवं चमकीले काले रंग की होती है। यह वयस्क मक्खी दलपत्रों या पत्तियों के अंदर अण्डे देती है। अण्डे में से निकलने वाली छोटी-सी इल्ली ही इस कीट की नुकसान करने वाली अवस्था है। पूर्ण विकसित इल्ली हल्के पील रंगे की एवं लगभग 3-4 मि.मी. लम्बी होती है। पत्तियों की शिराओं के माध्यम से यह इल्ली तने में पहुंच कर टेढ़ी-मेढ़ी सुरंग बनाकर खाती है। इस प्रकार के प्रकोप से सबसे अधिक हानि अंकुरण के 7-10 दिनों में होती है, जबकि ग्रसित पौधे पूर्णत: सूज जाते हैं। कुछ दिन बाद शंखी में से वयस्क मक्खी बनकर निकास छिद्र द्वारा बाहर आकर पुन: अपना जीवन चक्र प्रारंभ कर देती है। ऐसा पाया गया है कि सोयाबीन की संवदेनशील प्रजातियों में यह मक्खी 80-90 प्रतिशत पौधों को ग्रसित करती है। सफ़ेद मक्खी के प्रकोप को रोकने के लिए बीज को थायमिथोक्सम 30 एफ. एस.10 ग्राम /कि.ग्रा. बीज अथवा इमिडाक्लोप्रिड 48 एफ. एस. 1.25 मि.ली./ किलो बीज की दर से उपचारित करें।

मध्यप्रदेश में सोयाबीन का क्षेत्र एवं उत्पादन देश में सबसे अधिक है। इसी कारण इसको सोयाबीन प्रदेश के रूप में जाना जाता है, परन्तु सोयाबीन की उत्पादकता काफी लम्बे समय से 10.0 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास स्थिर है। जबकि किसानों के खेतों पर कई वर्षों तक किये गये प्रदर्शनों में औसतन 18 से 20 क्विंटल/हेक्टेयर एवं अधिकतम 35 क्विंटल/हेक्टेयर तक की उत्पादकता प्राप्त हुई जो यह दर्शाता है कि अभी सोयाबीन की उत्पादकता में वृद्धि की असीम संभावनाएं हैं। भारतवर्ष में लगभग 15-20 प्रकार के कीट ही सोयाबीन को नुकसान पहुंचाते है, जो कि फसल की विभिन्न अवस्थाओं को ग्रसित करते पाए गए हंै। पौधे के विभिन्न भागों को नुकसान करने की प्रकृति के अनुसार प्रमुख कीटों की पहचान एवं संक्षिप्त जीवन चक्र तथा प्रबंधन दिया जा रहा है।

अलसी की इल्ली (लिनसिड कैटरपिलर)
इस कीट का प्रकोप फसल की प्रथम फसल त्रिपत्री अवस्था में होता है। फसल की प्रारंभिक अवस्था में कम वर्षा या देरी से बोवनी होने पर इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। इसकी इल्लियों के रंग में विविधता पाई जाती है। यह हरे, भूरे या कत्थई रंग की होती है। शरीर के दोनों ओर हल्के पीले या हरे रंग की धारी होती है एवं पृष्ठ भाग पर गहरे भूरे रंग की एक मोटी धारी होती है। नवजात इल्लियां प्रथम त्रिपत्र को जाल से चिपका कर, उसके हर भाग को खुरच कर खाती है, जिससे पूरी पत्तियां सफेद दिखने लगती है। क्लोरएन्ट्रानिलीप्रोल 18.5 एस.सी. का 100 मि.ली. प्रति हेक्टे. फसल में फूल आने से 4-5 दिन पहले उपयोग करने पर इल्लियों का प्रकोप नहीं होता है।

चक्र भृंग (गर्डल बीटल)
सोयाबीन उत्पादक प्रमुख राज्यों – म.प्र., महाराष्ट्र एवं राजस्थान में यह सोयाबीन फसल का प्रमुख हानिकारक कीट है। वयस्क कीट नारंगी रंग का होता है, जिसके पंखों का निचला भाग काला होता है। इसकी श्रंृगिकाएं शरीर की लम्बाई के बराबर एवं पीछे की ओर मुड़ी हुई होती है। इसकी इल्ली पैर विहीन, पीले रंग की एवं शरीर पर उभार लिए होती है। पूर्ण विकसित इल्ली लगभग 2 से.मी. लम्बी होती है। इस कीट का जीवन चक्र अत्यंत रोचक किन्तु जटिल होता है। सर्वप्रथम मादा पौधे के तने, शाखा अथवा पर्णवृत पर (फसल की बढ़वार के अनुसार) दो चक्र बनाती है। निचले चक्र के समीप एक छिद्र बनाकर पौधे के अंदर एक हल्के पीले रंग का अण्डा देती है। प्रकोप होने पर इसके नियंत्रण के लिए ट्रायजोफॉस 40 ई.सी. ञ्च 0.8 ली./हेक्टे. या थाईक्लोप्रिड 21.7 एस.एल. ञ्च 0.650 ली./हेक्टे. या पूर्व मिश्रित कीटनाशक बीटासायफ्लुथ्रिन 8.49 प्रतिशत थायक्लोप्रिड 19.81प्रतिशत का 350 मिली लीटर प्रति हेक्टे. की दर से छिड़काव करें।
अर्धकुण्डलक इल्ली (सेमीलूपर)
अर्धकुण्डलक इल्लियां, सोयाबीन की पत्ती जाने वाली इल्लियों में प्रमुख है। ये सभी इल्लियां प्रारंभ में पत्तियों पर छोटे-छोटे छेद बनाकर खाती हैं। बड़ी होने पर ये पत्तियों पर बड़े-बड़े अनियमित छेद कर देती है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों पर शिराएं मात्र ही शेष रह जाती है जिसके पश्चात् इसका आक्रमण कलिकाओं, फूलों एवं नवविकसित फलियों पर प्रारंभ हो जाता है। क्रायसोडेक्सिस एक्यूटा जाति की इल्ली हरे रंग की होती है। जिसके पृष्ठ भाग पर एक लम्बवत् पीली धारी एवं शरीर के दोनों ओर एक-एक सफेद धारी होती है। शरीर का पिछला भाग, अगले भाग से अधिक मोटा होता है। वयस्क पतंगों के ऊपरी पंखों पर दो धब्बे होते हैं। गेसोनिया गेम्मा जाति की इल्ली उपर बताई गई इल्लियों से छोटी होती है एवं शरीर की मोटाई एक जैसी होती है। हरे रंग की इस इल्ली को थोड़ा भी स्पर्श करने पर तेजी से तड़पते हुए छिटक कर नीचे गिर जाती है। इसके वयस्क मध्यम आकार के भूरे रंग के होते हैं जिनके ऊपरी पंखों पर एक सफेद धब्बा दिखलाई पड़ता है। मोसिस अनडाटा जाति की भूरे रंग की इल्ली लगभग 4-5 से.मी. लम्बी होती है। जिसके शरीर पर भूरी, पीली या नारंगी लंबवत धारियां होती है। वयस्क पतंगा 3-4 से.मी. बड़ा एवं भूरे रंग का होता है। नियंत्रण के लिए क्लोरएन्ट्रानिलीप्रोल 18.5 एस.सी. ञ्च 100 मि.ली./हेक्टे. का छिड़काव फसल में फूल आने से 4-5 दिन पहले करें. फसल में 3-4 इल्लियाँ प्रति मीटर दिखलाई देने पर क्विनालफॉस 25 ई.सी. ञ्च 1.5 ली./हेक्टे. या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. ञ्च 1.25 ली./हेक्टे. या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस.सी. ञ्च 500 मि.ली./हेक्टे. या पूर्व मिश्रित कीटनाशक बीटासायफ्लुथ्रिन 8.49 प्रतिशत थायक्लोप्रिड 19.81प्रतिशत का 350 मिली लीटर प्रति हेक्टे. की दर से छिड़काव करें।
तंबाकू की इल्ली (टोबैको कैटरपिलर)
यह कीट मूलरूप से तम्बाकू की फसल का प्रमुख कीट हुआ करता था किन्तु अब यह सोयाबीन सहित कई फसलों को नुकसान करता पाया गया है। वृद्धि की दूसरी अवस्था के बाद इसकी इल्लियों में कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधकता भी उत्पन्न हो जाती है। वयस्क पतंगा 2-3 से.मी. एवं मटमैले भूरे रंग का होता है जिसके ऊपरी पंखों पर सफेद रंग की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं होती है। निचले पंख सफेद होते है। एक वयस्क मादा अपने जीवनकाल में 1200 से 2000 अंडे देती है। अण्डे 200-250 के समूहों में पत्ती की निचली सतह पर दिये जाते हैं। प्रत्येक समूह को मादा पतंगा अपने शरीर से निकले रूओं से ढांक देती है। समूह में से निकली छोटी इल्लियां मटमैले हर रंग की होती है एवं होती है एवं 4-5 दिन तक एक ही पत्ती पर रहते हुए हरे भाग को खुरच-खुरच कर खाती है। रसायनिक नियंत्रण हेतु फूल आने से कुछ समय पूर्व क्लोरएन्ट्रानिलीप्रोल 18.5 एस.सी. का 100 मि.ली. 1 हेक्टे. की दर से छिड़काव करें। बाद में इल्लियों का प्रकोप होने पर निम्न कीटनाशकों में से किसी एक का छिड़काव करें। क्विनालफॉस 25 ई.सी. (1.5 लीटर/हेक्टे.) या ट्रायजोफॉस 40 ई.सी. (800 मि.ली./ हेक्टे) या इंडोक्साकार्ब 14.5 एस.सी. (500 मि.ली./हेक्टे.) या स्पिनेटोरम 11.7 एस.सी का 450 मिली लीटर प्रति हेक्टे. की दर से छिड़काव करें।
चने की फली की छेदक इल्ली (ग्राम पॉड बोरर)
बहुफसल भक्षी एवं कीटनाशक प्रतिरोधी यह कीट आज एक वैश्विक समस्या बन गया है। भारतवर्ष में यह चना, कपास, अरहर, टमाटर, भिण्डी, गोभी, तम्बाकू, मंूगफली, मूंग, उड़द आदि फसलों को नुकसान करता पाया गया है। विगत कुछ वर्षों से म.प्र. के कुछ भागों में यह सोयाबीन का भी प्रमुख कीट हो गया है। वयस्क पतंगा मटमैले भूरे या हल्के कत्थई रंग का होता है। उपरी पंखों पर बादामी रंग की आड़ी-तिरछी रेखाएं होती है। सफेद रंग के निचले पंखों की बाहरी किनारों पर एक चौड़ा काला भाग होता है। इल्लियों के रूप में काफी विविधता पाई जाती है। ये 2-4 से.मी. लम्बी विभिन्न रंगों की लम्बवत रेखाएं लिए हुए, हरे, भूरे, कत्थई, नारंगी पीले आदि रंग की हो सकती है। मूलत: इल्लियां फलियों को खाती है। प्रारंभिक अवस्था में आक्रमण होने पर ये पत्तियों को भी खाती है। फूल आने पर फूलों एवं बाद में नन्ही फलियों को पूर्ण रूप से नष्ट कर देती है। इसके नियंत्रण के लिए प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. ञ्च1.25 ली./हेक्टे. या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस.सी. ञ्च 0.30 ली./हेक्टे. इल्ली की पहली या दूसरी अवस्था तक छिड़काव प्रभावकारी होता है।
बिहार की रोएंदार इल्ली (बिहार हेयरी कैटरपिलर)
यह कीट महाराष्ट्र, उत्तर पर्वतीय तराई के क्षेत्रों एवं म.प्र. के झाबुआ जिले में सोयाबीन का प्रमुख कीट है वयस्क पतंगे के पंखें हल्के पीले एवं उदर गुलाबी होता है। जिन पर छोटे-छोटे काले धब्बे होते है। छोटी इल्लियों मटमैले पीले रंग की होती है। जो बड़ी होने पर लाल-भूरे रंग की हो जाती है। इल्लियों के शरीर पर बड़े-बड़े रोम सदृश्य बाल होते है। इस कीट का जीवन चक्र एवं फसल को नुकसान करने का तरीका तम्बाकू की इल्ली जैसा ही होता है। अत: ग्रसित पौधे को पास जाकर देखने से ही कीट की पहचान की सकती है। इसके प्रकोप को रोकने के लिए क्लोरएन्ट्रानिलीप्रोल18.5 एस.सी. ञ्च 100 मि.ली./हेक्टे. का छिड़काव फसल में फूल आने से 4-5 दिन पहले करें. प्रकोप होने पर क्विनालफॉस 25 ई.सी. ञ्च 1.5 ली./हेक्टे. या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. ञ्च1.25 ली./हेक्टे. या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस.सी. ञ्च 500 मि.ली/हेक्टे. का छिड़काव करें।
सफेद मक्खी (व्हाइट फ्लाई)
सफेद मक्खी वायरस (विषाणु) के वाहक का कार्य करते हुए रोग को फसल पर फैलाती है। इसके कारण पत्तियों पर पीले-हरे रंग की पच्चीकारी बनती है। पत्तियों पर पीलापन या तो इधर-उधर छितरा हुआ होता है या पत्तियों की मुख्य शिराओं के साथ-साथ होता है। बाद में पत्तियों के पीले हिस्सों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे हो जाते हैं व धीरे-धीरे पत्तियां झुलसी हुई प्रतीत होती है। सफेद मक्खी पत्तियों से रस चूसने के साथ चिपचिपा पदार्थ ‘हनी ड्यूÓ स्त्रावित करती हैं जो निचली पत्तियों पर जमा हो जाता है। इस चिपचिपे पदार्थ पर काले रंग की फफूंद विकसित हो जाती है जो प्रकाश संश्लेषण के क्रिया को बाधित करती है जिससे उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है। सफेद मक्खी द्वारा रस चूसने एवं पीला मोजाइक रोग के कारण उत्पादन में 5 से 90 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। पीला मोजाइक रोग बीज जनित नहीं है। इस रोग के सुरक्षात्मक उपाय के रूप में सफेद मक्खी के प्रकोप को रोकने के लिए बीज को थायमिथोक्सम 30 एफ. एस (10 ग्राम कि.ग्रा. बीज की दर से ) अथवा इमिडाक्लोप्रिड 48 एफ . एस. (1.25 मि.ली किलो बीज की दर से) उपचारित करें। रोग के लक्षण दिखने पर ग्रसित पौधों को खेत से निकल कर नष्ट कर दें।

  • अफतारिका आजमी
  • डॉ. अमर नाथ शर्मा
    email: amarnathsharma2@gmail.com

www.krishakjagat.org

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