गौरक्षा का स्वाँग

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गौपालन, गौरक्षण, गौ संवर्धन हमारे देश की सनातन परम्परा है, कृषि अर्थव्यवस्था का आधार है। भारत के संविधान के नीति निदेशक सिद्धांत में भी इसका उल्लेख है लेकिन यह दुर्भाग्य है कि राजनीतिज्ञों और धर्माचार्यों ने इसे धर्म के दायरे में बांट दिया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने उद्बोधन में आचार्य विनोबा भावे का गौरक्षा के संदर्भ में उल्लेख किया, स्व. इंदिरा गांधी पूर्व प्रधानमंत्री के समय विनोबाजी ने देवनार कत्लखाना (मुंबई) बंद करने के लिये लंबा उपवास किया लेकिन खेद का विषय है कि देवनार कत्लखाना आज भी चल रहा है। केंद्र सरकार के नियोजनकारों की पहल पर मांस व चमड़ा उत्पादन तथा निर्यात के लिये आज भी प्रोत्साहन, संवर्धन योजनायें चल रही हैं व मांस निर्यात में भारत विश्व में पहले स्थान पर है। प्रधानमंत्री का गौरक्षकों को गुंडा कहना स्तब्ध कर देने वाला वक्तव्य है। जब कानून व्यवस्था का नियमन करने वाला प्रशासन ही अनदेखी, बेईमानी, भ्रष्टाचार कर अपने उत्तरदायित्व की पूर्ति नहीं करता तब अतिरेकवश, मानवीय संवेदनाओं के वशीभूत होकर गौरक्षकों में उबाल आ जाना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। गौरक्षा के नाम पर सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले, कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले लोगों का पक्ष समर्थन नहीं कर रहा है, इस आलेख के माध्यम से तथाकथित गौरक्षकों के समक्ष विचारार्थ कुछ सामयिक प्रश्न प्रस्तुत करते हुए शासन द्वारा देश भर में गौवंशीय पशुवध पाबंदी के विषय में दोगली नीति पर भी प्रश्न खड़े कर रहा हूं।

गौवंशीय पशुओं के संकरीकरण की नीति
देश में दुग्धोत्पादन बढ़ाने व नस्ल सुधार के नाम पर विदेशी नस्लों, जर्सी, होल्सटिन फ्रीजियन आदि से स्थानीय गौवंशीय पशुओं का संकरीकरण आजादी के बाद से विगत सत्तर वर्षों से निरंतरता से किया जा रहा है। इस हेतु योजनाबद्ध तरीके से विश्व बैंक की सहायता से देश व राज्यों के पशुपालन विभाग सक्रिय हैं। संकरित पशु केवल पहली पीढ़ी में तो बढ़ा हुआ दुग्धोत्पादन करते हैं, लेकिन दूसरी पीढ़ी में जाते ही ढेरों बीमारियों से ग्रसित होने के कारण आर्थिक रूप से अनुत्पादक बन जाते हैं, इनके बछड़े देश के गर्म मौसम में खेत में ठीक ढंग से काम नहीं करते व सरकार की इस नीति के कारण देशी गौवंशीय पशुओं की संख्या में कमी हो रही है व संकरित गौवंश बूचडख़ाने के लिये मुनाफे का धंधा बन रहा है। संपूर्ण गौवध प्रतिबंध की स्थिति में भविष्य में संकरित गाय-बैल अनुत्पादक होने पर किसानों की फसल उजाडऩे के कारण भारी सिरदर्द साबित होने वाले हैं। इन आवारा पशुओं के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है। अपने लाभ के लिये देशी गौवंश को संकरित कराना व अनुत्पादक होने पर छोड़ देना गौरक्षा के नाम पर ढोंग नहीं तो और क्या है?
चरागाहों के संरक्षण और सुधार की नीति को तिलांजली
चरोखर भूमियों में से अधिकांश मानवीय स्वार्थ, वोट बैंक साधने की नीति व सरकारी कुप्रबंधन की शिकार हो गई हैं। सिकुड़ते चरागाह पशुओं के बढ़ते दबाव के कारण बंजर में बदल रहे हैं। मध्यप्रदेश में इनके सुधार की योजना केवल कागजों तक सीमित है। फसल चक्र में विविध चारा फसलों के समावेशन की तरफ शासकीय प्रयास नगण्य हैं। शासकीय चरागाहों व भूमि, खुली भूमि, निस्तार भूमि पर अतिक्रमण हटाने गांवों में गोठान न होने के कारण पशुओं के चरने की जगह ही नहीं बच पा रही है इस कारण भी किसान गौपालन से उदासीन हो रहा है। कोई राजनैतिक अथवा प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में पशुधन के संरक्षण-संवर्धन की परिकल्पना केवल ढोंग है।
शहरों में पशुधन की बर्बादी
अच्छे दुधारू पशु शहरों में उचित परिवेश, चरागाह, अच्छे सांडों के अभाव में शीघ्रता से अनुत्पादक बन जाते हैं। पशुपालकों के अधिक दूध उत्पादन के लालच में हार्मोन इंजेक्शन लगाये जाने के कारण गर्मी पर भी नहीं आते व आवारा घूम कर नगरीय प्रशासन के लिये भी सिरदर्द साबित हो रहे हैं। सड़कों पर पड़ी गंदगी, प्लास्टिक आदि खाकर बीमार हो रहे हैं। गौरक्षक क्या इस सच्चाई से अनभिज्ञ हैं अथवा यह दूध पाने के लालच में उनका स्वार्थी और दिखावटी गौपालन गौसेवा का स्वाँग है।
पशु आहार में गुणवत्ता का अभाव
शासन की अबाध खाद्य तेल आयात की नीति के चलते तेल उद्योग कारखाने चौपट हो गये हैं। कपास्या खली मिलावटी मिल रही है वहीं सोयाबीन की खली गायों में दूध उत्पादन की बजाय मांस बढ़ाती है। इसका अथिक मात्रा में व निरंतरता में गायों के लिये खाद्य के रूप में प्रयोग हानिकारक है। पशुवैज्ञानिक अपने अनुसंधान से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सोयाबीन की खली के पशु खाद्य के रूप में उपयोग से खूनी दस्त, बांझपन की बीमारी को बढ़ावा मिलता है।
म.प्र. में नवीन गौशाला निर्माण में अड़ंगा
मध्यप्रदेश में गौशाला निर्माण के लिये शासकीय अनुदान प्रोत्साहन की योजना है। इस अनुदान को हड़पने के लिये गौसेवकों ने फर्जी गौशालायें स्थापित कर ली थीं जिनमें आधी सी गौशालायें सिर्फ कागजों पर चल रही थीं व बिना गौवंशीय पशुओं को रखे भ्रष्टाचार के दम पर पशुपालन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से गायों के नाम पर मिलने वाले शासकीय अनुदान को इसके प्रबंधक हड़प रहे थे।
मध्यप्रदेश में पशुसंवर्धन बोर्ड के पास 1200 से भी अधिक गौशालायें पंजीकृत थीं जो जांच के उपरांत छह सौ से भी कम रह गई हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने गौशालाओं के पंजीयन की नई नीति घोषित की है इसके अनुसार नवीन गौशाला के पंजीयन के लिए गौशाला संचालकों के पास कम से कम 1 एकड़ पंजीकृत भूमि और 100 गौवंशीय पशु होना आवश्यक है, इस नीति के क्रियान्वयन से तो एक भी नई गौशाला खुलने से रही। इसके पूर्व तक शासन बिना गौवंश के अस्थाई पंजीकरण करती थी व गौशाला के नाम पर जमीन खरीदने के लिये पंजीकरण शुल्क में भी छूट देती थी। सामाजिक सहयोग सहमति के आधार पर 20-25 पशुओं से भी गौशाला की स्थापना हो जाती थी परंतु नीतिगत परिवर्तन से बड़ी संख्या में गौपशु रखकर जमीन खरीद कर फिर पंजीयन कराना गौ सेवियों के लिये मुश्किल हो गया है। शासकीय अनुदान प्राप्त गौशाला में पर्याप्त साधन सुविधा के अभाव में भी कलेक्टरों की मनमानी के चलते पशु तस्करों से पकड़े पशुओं को जबरिया गौशाला में रखना भी पड़ता है व पशु तस्करों की गुंडागर्दी, धमकी दबाव के साथ ही न्यायालीन प्रक्रिया का भी सामना करने को विवश होना पड़ता है।
मांस निर्यातक कौन?
देश में मांस निर्यात के लिये आठ पंजीकृत बड़े बूचडख़ानों में से छह बूचडख़ाने हिंदुओं द्वारा संचालित हैं। यह कड़वी सच्चाई है फिर भी इसे हिन्दु मुसलमान का रंग देने में तथाकथित गौरक्षक पीछे नहीं रहते।
अवैध पशु परिवहन में प्रशासनिक मिलीभगत
पशुओं के परिवहन करने वाले वाहनों के लिये अनुज्ञा पत्र, पशु चिकित्सक का प्रमाणपत्र, रुम के अंदर पशुचारे की बिछायत, पशुओं की संख्या का ट्रक के माप के आधार पर निर्धारण ट्रक के बाहर भेजने पाने वाले का नाम आदि का उल्लेख, पशुओं के लिए ट्रक के चारे-पानी, फस्र्टएड उपचार की व्यवस्था, ट्रक के अंदर बाडी से लगे कुशन पेड, हवा के लिए जालीदार ढांचा आदि अनेक प्रावधान हैं परंतु प्रशासन पुलिस शायद ही इस तरफ ध्यान देता हो। केवल धनबल, रिश्वत, राजनैतिक हस्तक्षेप के चलते अपने कर्तव्य पालन से मुंह फेर लेता है। इस अनदेखी के चलते तिरपाल से ढंके एक-एक ट्रक में 10-12 पशुओं के स्थान पर 60-70 तक पशु अवैध रूप से विक्रय हेतु ले जाये जाते हैं। पुलिस की अनदेखी अथवा मिलीभगत के चलते जब गौरक्षक ऐसे ट्रकों को पकड़ते हैं तो उन पर गुंडागर्दी का इल्जाम लगा दिया जाता है। गाय संरक्षण के नाम पर व्यापक स्तर पर अंधेरगर्दी मची हुई है। निरीह गायें बूचडख़ाने जा रही हैं केवल तस्करों से गायें बचाना ही गौरक्षा नहीं है वरन् समग्रता से ऊपर उल्लेखित पहलुओं का समाधान करने से ही गौरक्षा का लक्ष्य पाया जा सकता है, इसके बगैर गाय को जाति विशेष से जोड़कर देखना केवल ढोंग ही है।

                                       म.प्र. में गौ संवर्धन बोर्ड : सफेद हाथी
म.प्र. में सर्वप्रथम गौसेवा आयोग कांग्रेसी शासन में बना था, इसके तत्कालीन अध्यक्ष उम्रदराज होने के बावजूद प्रदेश भर में गौशालाओं का भ्रमण निरीक्षण कर उनके विकास के लिये शासकीय आर्थिक सहायता उपलब्ध कराते थे। कालांतर में भाजपा के शासन काल में इसे भंग कर नये नाम से पशु संवर्धन बोर्ड बनाकर ऐसे नेता को अध्यक्ष बना दिया जो स्वास्थ कारणों से व राजनैतिक सक्रियता के चलते भोपाल में ही समय बिताना चाहते थे। उनके कार्यकाल में गौशालाओं को राज सहायता की कार्यप्रणाली ही बदल गई, नेताजी ने स्वयं गौशालाओं का निरीक्षण करने की बजाय सभा संगोष्ठियों तक स्वयं को सीमित कर लिया तथा गौशालाओं को राज सहायता जिलों में कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित समिति के माध्यम से मिलने लगी। पशुपालन विभाग के जिला अधिकारी इस समिति के सचिव व प्राय: भाजपा से राजनैतिक जुड़ाव रखने वाले गौशाला संचालक इन समितियों के सदस्य बन गये। इसी के साथ ही फर्जी गौशालायें अनुदान सहायता पाने में सफल होती गई व असली गौसेवक जी-हजूरी न करने के कारण अप्रासंगिक होते चले गये। यही रीति-नीति आज भी यथावत चलन में है। म.प्र. गौशाला अधिनियम 1962 के अंतर्गत मध्यप्रदेश स्थित गौशालाओं का एक मान्यता प्राप्त संगठन था व इस संगठन को प्रशासनिक व्यय के रूप में तीन से पांच हजार रु. तक ही शासकीय सहायता दी जाती थी व इस संगठन की अनुशंसा पर ही विभिन्न गौशालाओं को शासकीय अनुदान सहायता मिलती थी। यह संगठन राज्य स्थित गौशालाओं व शासन के मध्य संवाद, सेतु का काम करता था। इस गौशाला एक्ट को समाप्त कर भारी-भरकम खर्चे वाला गौसंवर्धन बोर्ड शासित दल ने अपने नेताओं के राजनैतिक पुनर्वास के लिये गठित कर लिया जो गौशालाओं से प्रत्यक्ष संपर्क न रखने के कारण पशु संरक्षण संवर्धन के क्षेत्र में सफेद हाथी साबित हो रहा है। यही सच्चाई है। जैविक कृषि को बढ़ावा देने का शासकीय आयोजन भी देशी नस्ल की गायों के संरक्षण के अभाव में दूध उत्पादन के लिये विदेशी नस्लों को बढ़ावा देने की योजना भी तो स्वाँग ही है।
  • श्रीकांत काबरा, मो.: 9406523699
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