भूमि में जीवांश की मात्रा बढ़ाये हरी खाद

मिट्टी की उर्वराशक्ति, जीवाणुओं की मात्रा एव क्रियाशीलता पर निर्भर रहता है क्योंकि बहुत सी रसायनिक क्रियाओं के लिए सूक्ष्मजीवों की आवश्यकता रहती है जीवित व सक्रिय मृदा वही कहलाती है जिसमे अधिक से अधिक जीवांश हो जीवाणुओ का भोजन प्राय: कार्बनिक पदार्थ ही होते है इनकी अधिकता से मृदा की उर्वराशक्ति पर प्रभाव पड़ता है केवल कार्बनिक खादों जैसे गोबर खाद, हरी खाद जीवाणु खाद द्वारा ही स्थायी रूप से मृदा की क्रियाओं को बढ़ाया जा सकता है जिसमें हरी खाद प्रमुख है। इस क्रिया में अधिकांशत: हरे दलहन पौधों का वानस्पतिक सामग्री को उसी खेत में उगाकर मिटटी में मिला देते है।

कृषि में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यत: भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदाथों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। प्राय: इस तरह की फसल को इसके हरी स्थिति में ही हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और भूमि की रक्षा होती है। मृदा के लगातार दोहन से उसमें उपस्थित पौधे की बढ़वार के लिये आवश्यक तत्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु व मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिये हरी खाद एक उत्तम विकल्प है। बिना गले-सड़े हरे पौधे (दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं। हरी खाद के उपयोग से न सिर्फ नत्रजन भूमि में उपलब्ध होता है बल्कि मृदा की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक दशा में भी सुधार होता है। वातावरण तथा भूमि प्रदूषण की समस्या को समाप्त किया जा सकता है लागत घटने से किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, भूमि में सूक्ष्म तत्वों की आपूर्ति होती है साथ ही मृदा की उर्वराशक्ति भी बेहतर हो जाती है।
 हरी खाद के लिए उपयुक्त फसलें एवं उपलब्ध जीवांश की मात्रा 
फसल बुआई समय बीज दर (कि.ग्रा./हे.) हरे पदार्थ की मात्रा (टन/हे.) प्राप्त नत्रजन (कि.ग्रा./हे.)
खरीफ फसलों के लिए
सनई अप्रैल-जुलाई 80-100 18-28 60-100
ढेंचा अप्रैल-जुलाई 80-100 20-25 84-105
लोबिया अप्रैल-जुलाई 45-55 15-18 74-88
उड़द जून-जुलाई 20-22 10-Dec 40-49
मूंग जून-जुलाई 20-22 08-Oct 38-48
ज्वार अप्रैल-जुलाई 30-40 20-25 68-85
रबी फसलों के लिए
सैंजी अक्टूबर-दिसम्बर 25-30 26-29 120-135
बरसीम अक्टूबर-दिसम्बर 20-30 16 60
मटर अक्टूबर-दिसम्बर 80-100 21 67

हरी खाद के गुण

  • उगाने में न्यूनतम खर्च
  • न्यूनतम सिंचाई, कम से कम पादप संरक्षण,
  • खरपतवारों को दबाते हुए जल्दी बढ़त प्राप्त करें तथा विपरीत परिस्थितियों में उगने की क्षमता हो।
  • फसलों की वानस्पतिक भाग मुलायम और बिना रेशेवाली हो ताकि जल्दी से मिट्टी मे सड़ कर मिल जाये।
  • फसलों की जड़ें गहरी हों ताकि नीचे की मिट्टी को भुरभुरी बना सके और नीचे की मिट्टी के पोषक तत्व ऊपरी सतह पर संचित कर सकें।
  • फसलों की जड़ों मे अधिक ग्रंथियां हो ताकि वायु को नाइट्रोजन को राईजोबियम द्वारा अधिक मात्रा मे स्थिरीकरण कर सकें।
  • फसल में पत्तियों व शाखाओं की संख्या अधिक हो, जिससे प्रति हेक्टर अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थ मिलाया जा सके।
  • हरी खाद की फसल ऐसी होनी चाहिए जो कम उपजाऊं भूमि में भी, अच्छी तरह उगाई जा सकें।

हरी खाद की फसल से अधिकतम कार्बनिक पदार्थ एवं नत्रजन प्राप्त करने हेतु एक विशेष अवस्था (30-45 दिन की) अवधि में पर ही पलटना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पलटने के समय पौधे नरम हो और फुल आने से पहले ही फसल पलट देनी चाहिए।
हरी खाद बनाने की विधि
खेत में हरी खाद की फसल उगाकर मिट्टी में दबाना:- हरी खाद बनाने के लिए इस विधि में जिस खेत में हरी खाद की फसल उगाते हैं, उसी खेत में पलटकर उसे दबा देते हैं इस विधि कमे हरी खाद के लिए दलहनी एवं बदलहनी फसल की बुवाई की जाती है। फसल उन्ही क्षेत्रों में उगाई जाती है और न ही दबाने पर सड़ पाती है। हरी खाद हेतु जल्दी पकने वाली फसलें जैसे ढेंचा, सनई ज्वार, लोबिया आदि की बुवाई कर फूल आने की अवस्था में खेत मे दबा देते हैं।
हरी खाद की हरी पर्ण विधि:- इस विधि मे पेड़ों व झाडिय़ों की कोमल शाखाएं, टहनियां व कोमल पत्तियों को दूसरे खेत या क्षेत्र से तोड़कर वांछित खेत की मृदा में जुताई कर दबाते है। पौधों के कोमल भागों में थोड़ी नमी होने पर भी वे सड़ पाते हैं इस विधि मे हरी खाद उन क्षेत्रों में बनाते है जहां की वर्षा कम हती है। इस विधि में दूसरे खेत में उगाई गई हरी खाद की फसल को भी काटकर वांछित खेत मे डालकर मृदा में दबा देते हैं।
सिंचित अवस्था में मानसून आने के 15 से 20 दिन पूर्व या असिंचित अवस्था में मानसून आने के तुरंत बाद खेत अच्छी प्रकार से तैयार कर हरी खाद की फसल को बीज बोने चाहिए। हरी खाद बोने के समय 80 कि.ग्रा नत्रजन तथा 40-60 कि.ग्रा. सल्फर देने चाहिए। इसके बाद जब दूसरी फसल लेनी हो उसमें सल्फर की मात्रा देने की आवश्यकता नहीं है तथा नत्रजन म भी 50 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है जब फसल की बढ़वार अच्छी हो गयी है तथा फूल आने के पूर्व इसे हल या डिस्क हैरो द्वारा खेत में पलट कर पाटा चाला देना चाहिए। यदि खेत में 5-6 से.मी. पानी भरा रहता है तो पलटन व मिटटी मे दबाने मे कम मेहनत लगती है जुताई उस दिशा में करना चाहिए जिसमें पौधों का गिराया गया है इसके बाद खेत में 8-10 दिन तक 4-6 सेमी पानी भरा रहना चाहिए जिससे पौधों को अपघटन में सुविधा होती है यािद पौधों को दबाते समय खेत में पानी की कमी हो या देर से जुताई की जाने हो तो पौधों को अपघटन में अधिक समय लगता है साथ ही यह ध्यान देने योग्य बात है कि इसके बाद लगाया जाने वाली फसल में आधा नत्रजन की मात्रा नहीं दी जानी चाहिए। इस विधि को अर्थात् हरी खाद को खेत मेें उगाकर उस खेत में दबाने की प्रक्रिया को हरी खाद की सही विधि को अर्थात हरी खाद को खेत में उगाकर उसी खेत में दबाने की प्रक्रिया को हरी खाद की सही विधि कहते हैं।

हरी खाद प्रयोग के लाभ
मिट्टी में कई पोषक तत्व भी उपलब्ध होते है एक अध्ययन के अनुसार एक टन ढैंचा को शुष्क पदार्थ द्वारा मृदा में जुटाये जाने वाले पोषक तत्व इस प्रकार है।

पोषक तत्व    मात्रा किग्रा/हे. पोषक तत्व मात्रा    किग्रा/हे.
नाइट्रोजन 26.2 मैग्नीशियम 1.6
फॉस्फोरस 7.3 जस्ता 25 पीपीएम
पोटाश 17.8 लोहा 105 पीपीएम
गधंक 1.9  तांबा 7 पीपीएम
कैल्शियम 1.4
  • हरी खाद के प्रयोग से मृदा भुरभुरी वायु संरचना में अच्छी, अम्लीयता/ क्षारीयता में सुधरा एवं मृदा क्षरण भी कम होता है।
  • पौधों के मिटटी में सडऩे गलने से मिट्टी में नमी को जलधारण करने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है हरी खाद के सडऩे गलने से कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है जो कि मिट्टी से आवश्यक तत्व को मुक्त करवा कर मुख्य फसल के पौधों को आसानी से उपलब्ध करवाती है।
  • हरी खाद से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है जिससे मृदा की उर्वराशक्ति एवं उत्पादन क्षमता भी बढती है।
  • यह खरपतवारों की वृद्धि करने मे सहायक है।
  • इसके प्रयोग से रसायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम कर बचत कर सकते है तथा टिकाउ खेती भी कर सकते है।
  • हरी खाद में मृदाजनित रोगों में भी कमी आती है।
  • महाराज सिंह
  • शिवानी नागर
    भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इंदौर
    email : ms_drmr@rediffmail.com

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