जापानी बटेर से अच्छी आमदनी

जापानी बटेर, बटेर कुल का एक पक्षी है। यह पूर्वी एशिया में प्रजनन करता हैं जिसमें उत्तरी मंगोलिया, रूस के साखलिन बायकाल और वितिम इलाके, पूर्वोतर चीन, जापान उत्तरी कोरिया तथा दक्षिणी कोरिया शामिल हैं। कुछ प्रजाति जापान से प्रवास नहीं करती है। लेकिन अधिकतर पक्षी सर्दियों में दक्षिणी चीन, लाओस, वियतनाम कंबोडिया, म्यानमार, भूटान और पूर्वोतर भारत की ओर प्रवास कर जाते हैं। जिन जगहों पर इस पक्षी का मूल निवास है या प्रचलित किया गया है अथवा यदा-कदा मिलता है वह इस प्रकार है –
मूल निवास – भूटान, चीन, भारत, जापान, कोरिया, (उत्तरी तथा दक्षिणी), लाओस, मंगोलिया, म्यानमार, रूस, थाईलैंड तथा वियतनाम।
प्रचलित किया गया – इटली, रियूनियम, द्वीप समूह तथा हवाई द्वीप (यू.एस.ए)
यदा कदा मिलना – कंबोडिया तथा फिलीपीन्स
मणिपुरी बटेर भारत में पाई जाने वाली बटेर पक्षी की एक किस्म है, जो कि पश्चिम बंगाल, असम, नागालैण्ड मणिपुर और मेघालय के दलदली इलाकों में, जहां ऊँची घास होती है, पाया जाता है। इसके आवास क्षेत्रों के संकुचित होने से या खण्डित होने से इसकी आबादी निरंतर कम होती जा रही है और इसी कारण से इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने असुरक्षित श्रेणी में रखा है। बटेर पक्षी को ही मांस खाने वालों की पसंद माना गया हैं। मांस व अंडा उत्पादन के क्षेत्र में भी बटेर पालन कर बहुत लाभ कमाया जा सकता है। जापानी नस्लों के विकास के साथ ही बटेर पालन अब व्यवसाय के रूप में देश के कई हिस्सों में तेजी से फैल रहा है। अपार संभावनाओं से भरे पूर्वांचल में व्यवसाय के रूप में इसका विकास होना अभी बाकी है। स्वादिष्ट मांस के रूप में बटेर को बड़े ही चाव से पंसद किया जाता है। इस दिशा में ढाई दशक के लंबे प्रयास के बाद बटेर के इस पालतू प्रजाति का विकास मांस व अंडा उत्पादन के लिए किया गया है। बटेर पालन के लिए मुख्य रूप से फराओं, इंग्लिश सफेद, कैरी उत्तम, कैरी उज्जवल, कैरी श्वेत, कैरी पर्ल व कैरी ब्राउन की जापानी नस्ले हैं। शीघ्र बढ़वार, अधिक अंडे उत्पादन, प्रस्फुटन में कम दिन सहित तत्कालिक वृद्धि के कारण इस व्यवसाय का रूप तेजी पकड़ता जा रहा है। वर्ष भर के अंतराल मेंं ही मांस के लिए बटेर के 8-10 उत्पादन ले सकते हैं। चूजे 6 से 10 सप्ताह में ही अंडे देने लगते हैं। मादा प्रतिवर्ष 250 से 300 अण्डे देती हैं, 80 प्रतिशत से अधिक अंडा उत्पादन 9-10 सप्ताह में ही शुरू हो जाता है। इसके चूजे बाजार में बेचने के लिए चार से पांच सप्ताह में ही तैयार हो जाते हैं। एक मुर्गी रखने के स्थान में 10 बटेर के बच्चे रखे जा सकते हैं। इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक होने के चलते इनकी मृत्यु भी कम होती है। इन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बटेर को किसी भी प्रकार के रोग निरोधक टीका लगाने की जरूरत नहीं होती है। एक किलोग्राम बटेर का मांस उत्पादन करने के लिए दो से ढाई किलोग्राम राशन की आवश्यकता होती है। बटेर के अंडे का भार उसके शरीर का ठीक आठ प्रतिशत होता हैं जबकि मुर्गी व टर्की मे 1-3 प्रतिशत होती हैं। बटेर उत्पादन एक विकसित व्यवसाय का रूप ले चुका है। भारत में इसका विकास धीरे-धीरे हो रहा है। तापमान और वातावरण के हिसाब से पूर्वांचल में इसकी अपार संभावना है। इसको व्यवसायिक रूप देकर बटेर उत्पादन कर इस दिशा में अच्छी आय कमा सकते है। जापानी बटेर को आमतौर पर बटेर कहा जाता है। पंख के आधार पर इसे विभिन्न किस्मों में बांटा जा सकता है। जैसे फराओं, इंग्लिश सफेद, टिक्सडो, ब्रिटिश रेज और माचुरियन गोल्डन। जापानी बटेर का हमारे देश में लाया जाना किसानों के लिए मुर्गीपालन के क्षेत्र में एक नया विकल्प के साथ साथ उपभोक्ताओं को स्वादिष्ट और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने में काफी महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ हैं। यह सर्वप्रथम केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली में लाया गया था। यहां इस पर काफी शोध कार्य किए जा रहे हैं। आहार के रूप में प्रयोग किए जाने वाले अतिरिक्त बटेर में अन्य विशेष गुण भी है, जो इसे व्यवसायिक तौर पर लाभदायक अण्डे तथा मांस के उत्पादन में सहयाक बनाते है। यह गुण इस प्रकार है-

  • बटेर प्रतिवर्ष तीन से चार पीढिय़ों को जन्म दे देने की क्षमता रखता हैं।
  • मादा बटेर 45 दिन की आयु से ही अण्डे देना आरम्भ कर देती है और साठवें दिन तक पूर्ण उत्पादन की स्थिति में आ जाती है।
  • अनुकूल वातावरण मिलने पर बटेर लम्बी अवधि तक अण्डे देते रहते है और मादा बटेर वर्ष में औसतन 280 अण्डे तक दे सकती है।
  • एक मुर्गी के लिए निर्धारित स्थान में 8 से 0 बटेर रखे जा सकते हैं। छोटे आकार के होने के कारण इनका संचालन आसानी से किया जा सकता है। साथ ही बटेर पालन में दाने की खपत भी कम होती है।
  • शारीरिक वजन की तेजी से बढ़ोतरी के कारण पांच सप्ताह में ही खाने योग्य हो जाते हैं
  • बटेर के अण्डे और मांस में उचित मात्रा में अमीनों एसिड, विटामिन, वसा और धातु आदि पदार्थ उपलब्ध रहते हैं।
  • मुर्गियों की अपेक्षा बटेरों में संक्रमण रोग कम होते हैं। रोगों की रोकथाम के लिए मुर्गी पालन की तरह इनमें किसी प्रकार का टीका लगाने की आवश्यकता नहीं हैं।

 

  • डॉॅ. रूपेश जैन
  • डॉॅ पी. पी. सिंह
    email : rupesh_vet@rediffmail.com

www.krishakjagat.org

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