अदरक उत्पादन तकनीक

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जलवायु: अदरक गर्म एवं नम जलवायु में अच्छी तरह उगाया जाता है। इसकी खेती समुद्र तट से 1500 मीटर तक की ऊंचाई पर भी की जा सकती है। अदरक की खेती वर्षा आधारित एवं सिंचित अवस्था में की जा सकती है। इसकी खेती के लिए बुवाई के समय मध्यम वर्षा, वृद्धि तक अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है। कटाई एवं एक महीना पहले शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है।
भूमि: अदरक विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है। लेकिन इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली जीवांश युक्त दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है।
उन्नत किस्में: सुप्रभा,  सुरूचि,  सुरभि :
अन्य किस्मों में वर्दा, हिमगिरी, महिमा, रेजाता आदि है।
भूमि की तैयारी : अदरक की अच्छी खेती के लिए भूमि को गर्मी के शुरू में अच्छी गहरी जुताई करके मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है।
बीज दर: अदरक का बीज प्रकंद होता है। बुवाई के लिए 2.5-5.0 सेमी लम्बे, 20-25 ग्राम वजन के जिनमें कम से कम 2-3 अंकुरित आंखें हो बोने के लिए उपयुक्त होते हैं। एक हैक्टेयर में बुवाई हेतु 15-20 क्विंटल प्रकंदों की आवश्यकता होती है।
बीजोपचार: अदरक के बीज प्रकंद को 30 मिनट तक मेंकोजेब 3 ग्राम/ लीटर पानी के साथ उपचारित करके, 3-4 घंटे छायादार जगह पर सुखाते हैं।
बुवाई की विधि:  वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए प्रकंदों की बुवाई के लिए 4 सेमी ऊंची, 1 मीटर चौड़ी तथा आवश्यकतानुसार लम्बी क्यारियों को तैयार कर बुवाई करते हंै। प्रकंदों को 15-20 सेमी की दूरी पर 3-4 सेमी की गहराई पर बो देते हैं। सिंचित क्षेत्रों में क्यारियों बनाकर उनमें 40 सेमी की दूरी पर मेड़ बना ली जाती है तथा 20-25 सेमी की दूरी पर 3-4 सेमी गहराई पर प्रकंदों की बुवाई कर देते हैं।
सिंचाई
बुवाई के समय पर्याप्त नमी रहे। अंकुरण के बाद शीघ्र सिंचाई कर दें। इसके बाद वर्षा होने तक नमी बनाये रखने के लिए 10-10 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहें।
पलवार
बुवाई के तुरंत बाद घास फूस पत्तों की पलवार बिछाना लाभप्रद रहता है। पलवार से मिट्टी का कटाव कम होता है। तथा भूमि में जीवांश पदार्थ की वृद्धि होती है तथा भूमि में नमी भी संरक्षित रहती है। पलवार से खरपतवार भी कम उगते हंै। पहली पलवार बुवाई के समय तथा दूसरी व तीसरी पलवार 40 एवं 90 दिन बाद बिछायें। प्रथम पलवार के लिए 5-7 टन/ हैक्टेयर हरे पत्तों की आवश्यकता रहती है।
निराई-गुड़ाई एवं मिट्टी चढ़ाना: अदरक की फसल में आवश्यकतानुसार 2-3 बार खरपतवार निकाल दें।
प्रकंदों की खुदाई
हरी अदरक के लिए इसकी खुदाई बुवाई के 180 दिन बाद करें तथा सूखी अदरक के लिए इसकी बुवाई के 240- 260 दिन बाद तब पत्तियां पीली पड़ जाये तथा धीरे-धीरे सूखने लगे तब की जाये। खुदाई करते समय ध्यान रखें कि प्रकंद फटने न पाये। पौधों को सावधानी पूर्वक फावड़े या कुदाली की सहायता से उखाड़ कर प्रकंद को जड़ और मिट्टी से अलग कर लेेते हंै। खुदाई के बाद प्रकंद को अच्छी तरह पानी से धोकर एक दिन के लिए धूप में सुखा लें।
उपज: ताजा अदरक की उपज लगभग 15-25 टन/ हेक्टेयर प्राप्त होती है, जो सूखाने के बाद 20-25 प्रतिशत तक प्राप्त होती है।
भण्डारण: बीज संग्रहण के लिए अदरक को पेड़ के नीचे छाया में गड्ढा खोदकर कंदों को इस प्रकार रखा जाता है कि इसमें हवा के लिए काफी जगह बनी रहे। बीज प्रकंदों को 0.3 प्रतिशत मेंकोजेब या रीडोमिल के घोल में 30 मिनट तक उपचारित करके छायादार जगह पर सुखा लेते हैं। गड्ढों को गोबर से लेप देते हैं। फिर एक परत प्रकंद फिर 2 सेमी रेत/ बुरादा की परत में रखते हैं। इस तरह भरने के बाद ऊपर से गड्ढों को लकड़ी के तखते से ढक देते हैं। इन तख्तों को हवादार बनाने के लिए एक या दो छेद करते हैं।

खाद एवं उर्वरक
खाद एवं उर्वरकों की मात्रा/ हैक्टेयर
उर्वरक      बोने का समय   बुवाई के 40दिन बाद बुवाई के 90 दिन बाद
यूरिया  80 किग्रा 80 किग्रा
सिंगल सुपर फास्फेट 250 किग्रा
पोटाश   40 किग्रा  25 किग्रा
कम्पोस्ट/ गोबर खाद  25-30 टन/ हे.
नीम खली 2 टन/ हैक्टेयर
बुवाई के समय पकी हुई गोबर की खाद तथा नीम की खली को भूमि में मिलायें। नीम केक से राइजोम रॉट एवं सूत्रकृमि का प्रकोप कम होता है।

 

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