भावान्तर बनेगी गेमचेन्जर योजना

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(मनोज श्रीवास्तव)
भावान्तर योजना को झाबुआ और अलीराजपुर में देखा। करीब 460 किमी चली गाड़ी। जिलों में भीतर -भीतर घुसके देखा। मेरा पुराना जिला अब दो जिलों में बंट गया है। 20 साल पहले मैं यहां कलेक्टर था। सो अब भी लोगों में वही प्रेम देखा। मैंने कहा भी कि वो फिल्म बीस साल बाद अब फिर रिलीज हुई है।
भावान्तर योजना की जो विशेष बात मुझे लगी कि इसने किसान के अकेलेपन को खत्म किया है। पहले किसान को लगता था कि इतने बड़े संसार में वह अपनी फसल के साथ अकेला छूट गया है। वह जा तो रहा है मंडी लेकिन वहां उसे कारोबारियों के बीच अकेला होना भुगतना है। किसान को यह loneliness काफी डिप्रेसिंग लगती रही और उस मनोवैज्ञानिक अवसाद को कई बार विश्लेषकों ने किसान आत्महत्या का एक बड़ा कारण बताया था। भावान्तर इस किसान के लिए एक बड़ी मानसिक संपुष्टि है जब वह देखता है कि उसकी ओर से प्रशासन/ राज्य भी अपने अधिकारियों के जरिए बोल रहा है। उसकी फसल को ज्यादा भाव दिलाने के लिए व्यवस्था बेहतर ज्ञानाधारों के साथ उसकी तरफ खड़ी है। यह आश्वस्ति उसे हो रही है।
दूसरे, मंडी का एक डिफाइनिंग डिफरेंस के साथ पुनराविष्कार सा हुआ है। एक संस्था के रूप में उसकी वापसी हुई है। कभी बोनस के दिनों में जो रेलमपेल यहां रहा करती थी, अब वो रौनक लौट रही है। कलेक्टरों ने निष्क्रिय पड़ी मंडियों में जैसे जान सी डाल दी है। कई उपमंडियां जिनकी अधिसूचना दशकों पहले प्रकाशित हुई थी, अब जाकर एक्टिवेट हुई हैं। उनकी प्रासंगिकता की पुनस्र्थापना के मायने झाबुआ जैसे जिलों में मनीलेंडर के स्ट्रांगहोल्ड का कम होना है। इन उपमंडियों और extended mandi की सक्रियता पुरानी मंडी में हुए aggregation को भी निराकृत करती है। इसके पहले कब विभिन्न राज्यों के price differentials को इस तरह अपनी जद में लिया गया था? मान के चलिए मेरी बात। भावान्तर गेमचेंजर होने जा रही है।

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