घाटे में खेती कर रहे हैं किसान

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बजट सत्र के दौरान लोकसभा में घोषणा की थी कि किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिया जायेगा। वित्त मंत्री श्री जेटली ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि किसानों को लागत में सभी खर्चे, स्वयं का श्रम, सिकमी की राशि, ऋण पर ब्याज आदि जोड़ा जाएगा व लागत का डेढ़ गुना किसानों की फसलों का समर्थन मूल्य तय होगा। परंतु विडम्बना है कि फसलों का लागत मूल्य क्या होगा? कौन तय करेगा, कैसे तय होगा? कब तक तय होगा?
म.प्र. सरकार ने इस बार किसानों की फसलों का लागत मूल्य निर्धारण हेतु एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया व उसे दायित्व सौंपा गया है कि वह किसानों से सलाह मशविरा करके लागत मूल्य की गणना कर शासन को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे। अब देखना होगा कि समिति क्या सुझाव देती व कब तक देती है?
किसानों की सरकार से मांग है कि अब वह बंद कमरों में फसलों का लागत मूल्य तय न करे बल्कि इसे किसानों की वास्तविक लागत के अनुसार उनसे फीडबेक लेकर व सलाह मशविरा करके ही पूर्ण पारदर्शिता के साथ तय कर इनकी घोषणा शीघ्र करें।

जिन्स का नाम औसत/एकड़ लागत रु. में  औसत/ एकड़ उपज क्विं. में औसत/ क्विं. लागत रु. में
गेहूं 38,450 18 2136
धान 49,828 24 2076
चना 35,500 8 4437
उड़द/मूंग 24,875 5 4975

कृषकों के संगठन भारत कृषक समाज कृषि वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों व किसानों से जुड़े किसान संगठनों के प्रमुखों से विचार – विमर्श के बाद किसानों की गेहूं, धान चना, उड़द, मूंग फसलों की प्रति एकड़ व प्रति क्विंटल लागत मूल्य गणना की गई है। गणनानुसार इसके मुताबिक गेहूं के प्रति क्विंटल उत्पादन करने में किसानों को रु. 2136 प्रति क्विंटल का खर्चा आता है, जबकि उसको बोनस मिलाकर समर्थन मूल्य रु. 2000 प्रति क्विंटल मिलता है, यानी रु. 136 क्विंटल का घाटा वर्तमान में उसे होता है। लाभ की बात तो दूर, अभी तो उसकी लागत ही नहीं निकल रही है। इसी प्रकार एक क्विंटल धान पैदा करने में किसान को 2076 रु. का खर्च उठाना पड़ता है। जबकि सरकार उसे समर्थन मूल्य में केवल 1550 रुपये ही देती है यानि घाटा रु. 526 का। अन्य फसलों में भी यही हाल है। किसानों की देश के 132 संगठनों के समूह वाली समिति ने जो हाल ही में आकलन किया है। उसके मुताबिक गेहूं में किसानों को 200 रुपए प्रति क्विंटल का घाटा उठाना पड़ता है। यही वास्तविकता है और किसानों की दुर्दशा का यही एकमात्र बड़ा कारण है। नीति आयोग के हाल ही के आंकड़ों के अनुसार विगत तीन वर्षों में किसानों की आय में सालाना केवल 0.4 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी हुई है, यदि यही हाल रहे तो आगामी पांच वर्षों में किसान की आयु दुगनी करने का सरकार का लक्ष्य एक दिवास्वप्न बनकर रह जायेगा।

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