भ्रम में फंसा किसान

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(विशेष प्रतिनिधि)
भोपाल। इस वर्ष खरीफ में यूरिया की आसान उपलब्धता के बावजूद उर्वरक व्यवस्था में लगे आला अधिकारी हैरान परेशान हैं। उनकी परेशानी का कारण किसानों की पतले दाने के यूरिया की मांग है। किसानों के मध्य यह भ्रांति फैल गई है कि पतले दाने वाला यूरिया अधिक अच्छा होता है। जिसके कारण पतले दाने के यूरिया की मांग अचानक बढ़ गई है। वर्तमान में प्रदेश में मोटे व पतले दोनों तरह के दाने वाला यूरिया प्रदाय हो रहा है।
मध्यप्रदेश में खरीफ सीजन में लगभग  9 लाख मी. टन यूरिया की मांग होती है। जिसकी पूर्ति लगभग 15 कम्पनियां सहकारी समितियों एवं निजी विक्रेताओं के माध्यम से करती हैं। ये कम्पनियां भारतीय एवं आयातित दोनों तरह के यूरिया प्रदाय करती हैं। सूत्र बताते  हैं कि मोटे दाने का यूरिया मुख्यत: आयातित यूरिया में आ रहा है। यहाँ उल्लेखनीय होगा कि यूरिया का आयात भारत सरकार के निरीक्षण एवं निर्देशन में सरकार के द्वारा निर्धारित एजेन्सियों द्वारा किया जाता है। मोटे व पतले दाने की भ्रांति का असर मुख्य रूप से सहकारी समितियों के उर्वरक विक्रय पर दिख रहा है। उनके पास दोनों तरह का यूरिया होने के कारण मोटे दाने के यूरिया का स्टॉक डम्प होता जा रहा है। समितियों की उर्वरक प्रदायक संस्था मार्कफेड सप्लायरों को केवल पतले दाने का यूरिया प्रदाय करने के लिये बाध्य नहीं कर सकती। यदि ऐसा किया जाता है तो प्रदेश में यूरिया उपलब्धता का संकट हो सकता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि फर्टिलाइजर कंट्रोल आर्डर (एफसीओ) में भी यूरिया के दाने के आकार के संबंध में कोई निर्देश नहीं है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश में उर्वरक वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संस्था मार्कफेड अब तक 1.55 लाख टन यूरिया प्रदाय के आदेश विभिन्न कम्पनियों को दे चुकी है तथा उसके लगभग 200 भंडारण केन्द्रों पर 70,000 मी. टन यूरिया का स्टाक    उपलब्ध है।

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