सरकारी अव्यवस्थाओं से आहत किसान

सरकारी अव्यवस्थाओं से आहत किसान

एक तरफ किसान संगठनों का गांव बंद आन्दोलन तो दूसरी तरफ समर्थन मूल्य पर फसल की तुलाई न हो पाने से परेशान किसान। राज्य में मानसून की हलचल भी प्रारंभ हो चुकी है। लेकिन आगामी फसल के लिये न तो किसान तैयार हो पाया है और न ही शासकीय अमला मानसून की अनुकूलता के बाद भी बीज सहित अन्य संसाधन जुटाने की कार्यवाही नहीं कर सका है। बीज वितरण का दायित्व निभाने वाली सहकारी समितियां समर्थन मूल्य की तुलाई में लगी हुई हैं। इसलिये खरीफ फसल के लिये इन एजेन्सियों से तैयारी की अपेक्षा करना बेमानी ही है। समर्थन मूल्य पर अंतिम दौर में जा पहुंची खरीद के बाद भी अभी बड़ी तदाद में किसानों की तुलाई नहीं हो सकी है। अब मात्र कुछ दिन ही शेष बचे है। लेकिन अभी भी राज्य का 25 फीसदी किसान बिकवाली का इंतजार कर रहा है।

खरीदी केन्द्रों पर मूलभूत सुविधाएं नदारद
डेढ़ माह के लम्बे समय के बाद भी स्थानीय प्रशासन खरीदी केन्द्रों पर पेयजल एवं छांव जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करा सका है। जबकि ग्राहक को आवश्यक मूलभूत सुविधाएं न दे पाना उपभोक्ता कानून का उल्घंन के साथ मानवाधिकार का हनन भी है। लेकिन व्यवस्था में सुधार की कोई कोशिश होती नहीं दिखाई दी है। तुलाई केन्द्रों पर से किसान को नियत तुलाई दिनांक की सूचना प्राप्त न होना, तुलाई कांटों में गड़बडिय़ों सहित सर्वेयरों द्वारा की जा रही अवैध वसूली के संगीन आरोपों पर प्रभारी अधिकारी सहित जिले के कलेक्टर तक गंभीरता नहीं दिखा सके है। इन्ही अव्यवस्था से परेशान राज्य का किसान इन किसान संगठनों के आन्दोलन को सर्मथन दे रहा है। यह मासूम किसान न तो आन्दोलन की भूमिका से वाकिफ है और न ही उनका आन्दोलनकारियों से नजदीक का रिश्ता है। लेकिन राज्य की अफसरशाही की अनसुनी एवं असहयोग के कारण किसान एक ऐसे आन्दोलन को सहयोग कर अपनी भड़ास निकालने की कोशिश कर रहा है जिसमें उस स्वयं की अजीविका दाव पर लगी है।
टालमटोल से नुकसान

राज्य सरकार आन्दोलन के हानि-लाभ के पहलू को लेकर अब जितनी सक्रियता दिखा रही है, काश! यही कोशिश किसानों को समर्थन मूल्य की तुलाई, सूखा राहत वितरण की व्यवस्था में की होती तो शायद राज्य में आन्दोलन की सक्रियता भी नहीं दिखाई देती। राज्य में गत खरीफ के दौरान नष्ट हुई सोयाबीन एवं उड़द की फसल को राज्य सरकार ने जहां सूखा राहत राशि देने की घोषणा की थी, लेकिन बाद में इसे आरबीसी 6-4 के प्रावधानों से जोड़कर उन किसानों को राहत राशि का वितरण किया जिनकी फसल 50 फीसदी या इससे अधिक क्षति श्रेणी में थी। भावान्तर में तय मात्रा का पूर्ण विक्रय करने वाले कास्तकारों को सूखा राहत से वंचित किया गया है। सम्पूर्ण हल्का में सूखा के हालात एक जैसे थे। लेकिन सूखा राहत में आरबीसी के नियम से किसान का एक तबका इस राहत राशि से वंचित रह गया है। आन्दोलनकारी संगठन प्रदेश में किसान के इन आक्रोश के कारणों को भुनाने में जुटे है। जबकि आन्दोलन को रोकने में जुटी सरकार पीडि़त किसानों के मरहम के सटीक उपायों को खोज नहीं पा रही है। गत वर्ष 06 जून 2017 को मंदसौर हिंसा एंव छ: किसानों की मौत पर सरकार स्पष्ट पारदर्शी नीति के बजाय टालमटोल में लगी रही है।
अराजकता क्यों हुई?
राज्य सरकार घटना के एक साल बाद भी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि अराजकता फैलाने वाली परिस्थियां कौन सी थीं, एवं गोली किसके आदेश पर चलायी गई थी। घटना की जांच के लिये गठित जस्टिस जैन आयोग का कार्यकाल तीन माह नियत था। लेकिन इसे प्रत्येक समाप्ति पर तीन माह का विस्तार देकर जांच को विलम्बित किया गया है। मृतकों के परिजन को घोषित राज्य शासन की क्षतिपूर्ति घोषणा पर उच्च न्ययालय के संज्ञान के बाद राज्य सरकार ने पूरा मामला ही ठन्डे बस्ते में डाल दिया है।
राज्य सरकार अभी तक निश्चिंत इसलिये थी कि वह मान रही थी कि राज्य के भोले-भाले किसानों को वह भावान्तर, फसल प्रोत्साहन राशि एवं सूखा राहत देकर अपने पक्ष में लाने में सफल रही है। लेकिन राज्य की अव्यवस्थाओं से आहत किसान को इन योजना का लाभ लेने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा है। राज्य की नौकरशाही व्यवस्था उसे बेबस बनाये हुये है। यही कारण है कि राज्य का भोला किसान सरकार के प्रति अपने आक्रोश व्यक्त करने आन्दोलनकारियों के हाथों में खेल रहा है। उसे इस बात की समझ नहीं है कि वह सड़कों पर दूध एवं सब्जियां फंेककर कौनसी मानसिकता का परिचय दे रहा है। अपनी बात को सरकार एवं देश की आवाम तक पहुंचाने अनेकों शांतिपूर्ण तरीके हो सकते थे। धरतीपुत्र अन्नदाता युगों-युगों से एक निर्माता के रुप में स्थापित रहा है, लेकिन उसका अपने ही उत्पादों के लिये विध्वंसक हो जाना अन्नदाता की मर्यादा एवं प्रतिष्ठा को धूमिल करने का कृत्य है। वक्त है किसान एवं सरकार मर्यादित आचरण में राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर सड़कों पर अशोभनीय शक्ति प्रदर्शन के बजाय समास्या समाधान के खुले संवाद रुख को अख्तयार करे।

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