बीज के लिए जागरुक हों किसान भाई

आज भी देश में 70 प्रतिशत से अधिक किसान स्वयं का या दूसरे किसानों द्वारा उत्पादित फसलों को ही बीज के रूप में प्रयोग करते हैं। अब बीजों के महत्च को समझते हुये सरकार के वृहद बीज उत्पादक तंत्र स्थापित कर रखे हैं एवं अनेक गैर सरकारी समितियां एवं कंपनियां बीज उत्पादन के कार्य में संलग्न है। इसके बावजूद हमारे बीज की जरूरत पूरी नहीं हो पाती। हमारे प्रदेश की बीज प्रतिस्थापन दर बढ़ाकर भी हम फसलों की उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं। बीज प्रतिस्थापन दर कम रहने के प्रमुख कारण हैं:
सरकारी तंत्र द्वारा अपर्याप्त मात्रा में बीज उत्पादन

  • प्रमाणित बीजों का उत्पादन उतनी मात्रा में नहीं हो पाता जितनी हमारी जरूरत है।
  • प्रायवेट कंपनियों का ध्येय मुनाफा कमाना
  • बीज उत्पादन में संलग्न प्रायवेट कंपनियां लाभ अर्जन के उद्देश्य से उतना ही बीज तैयार करती हैं जितने का विपणन कर सकें।

विपणन व्यवस्था में खामियां
अक्सर देखा जाता हैं कि बीज आपूर्ति की व्यवस्था तो की जाती है, लेकिन विलंब से। लक्ष्य तक बीज पहुंचते-पहुंचते इतनी देरी हो जाती है कि तब तक कृषक के पास जैसा भी बीज उपलब्ध हो पाता है, उसी को खेत में बो देता है।
उच्च बाजार भाव
बीजों की कीमतें सामान्य से लगभग दोगने से ज्यादा ही होती है। प्रायवेट कंपनियों के बीज की कीमतें इतनी अधिक होती हैं कि केवल बड़े व रिस्क (जोखिम) उठाने वाले कृषक ही खरीद पाते हैं। आम किसान इनके बारे में सोचता ही नहीं। वैसे कीमतें कम रहने पर भी बहुधा किसान बीज खरीदना नहीं चाहता या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि गरीब किसान के पास पैसे नहीं होते।
कृषकों में बीज के प्रति जागरूकता का अभाव
ज्यादातर कृषक बीज की गुणवता के प्रति जागरूक नहीं हैं अथवा इसके महत्व को नहीं समझते हैं। उनके पास घर में जो दाना उपलब्ध है, उसी को वे खेत में बो देते हैं और इससे होने वाले नुकसान से अनजान रहते हैं।
विषय विशेषज्ञों/वैज्ञानिकों की कमी
किसानों की सीमित की सोच, निर्धनता, संसाधनों की कमी, पूंजी कमी इत्यादि है, जो प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से प्रतिस्थापन दर की कम रहने के कारण हैं।
बीज के स्वरूप को जानना जरूरी
किसान भाईयों को यह जानना जरूरी है कि जो अनाज खाने के काम आता है, उसमें दानों को आनुवांशिक शुद्धता की ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती और न ही यह देखना जरूरी होता है कि दाना कितना कीटग्रस्त है और न यह ध्यान दिया जाता है कि दाने की अंकुरण क्षमता कितनी है, लेकिन बीज में इन सब बातों पर विशेष ध्यान देना होता है। उस बीज को उत्तम कोटि का माना जाता है, जिसमें आनुवंशिक शुद्धता शत-प्रतिशत हो। खरपतवारों के बीज न मिले हों, जो रोगों और कीटों के आक्रमण से मुक्त हो, जिनकी अंकुरण क्षमता ऊंची हो और जिसमें जीवन शक्ति और ओज भरपूर हो।
किसानों को उच्च कोटि के आनुवंशिक रूप से विशुद्ध अधिक अंकुरण क्षमता वाला पुष्ट एवं स्वस्थ बीज बहुत मुश्किल से मिलता है जो कि विपुल उत्पादन का महत्वपूर्ण घटक है। उच्च गुणवत्ता वाले बीज के उपयोग से उर्वरक एवं अन्य आदानों का फल ठीक से प्राप्त कर सकते हैं। अत: बीज उत्पादन कि प्रक्रिया में बीज की आनुवंशिक शुद्धता एवं अन्य गुणों का विशेष ध्यान रखना चाहिये।

बीज खेती में पहला आदान है। फसल का भविष्य काफी हद तक बीज पर निर्भर करता है कि उच्च क्वालिटी बीजों के उपयोग से फसल उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है।
बीज की सफाई, छंटाई
ऐसा बीज कटाई से प्राप्त उपज से सीधे प्राप्त नहीं हो पाता है। जिस समय फसल की कटाई से बीज प्राप्त होता है, उस समय उसमें अनेक प्रकार की वस्तुएं मिली होती हैं। इनमें अक्रिय पदार्थ, साधारण खरपतवारों व हानिकारक खरपतवारों के बीज, अन्य किस्मों तथा अन्य फसलों के बीज प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उसमें कीटों, रोगों तथा सूक्ष्म जीवों से क्षतिग्रस्त दाने और सिकुड़े बदरंग और साधारण आकार के दाने भी मिले होते हैं। ऐसे दानों को बीज के रूप में बोने से अंकुरण का प्रतिशत घट जाता है। खड़ी फसल पर रोगों तथा सूक्ष्म जीवों का आक्रमण हो सकता है, जिसका हानिकारक प्रभाव उपज पर पड़ता है। इसलिये किसान को शुद्ध बीज प्राप्त करने की आवश्यकता अनुभव हुई जिससे बीज संसाधन की संकल्पना प्रकाश में आई। बीज संसाधन का सीधा अर्थ फसल की कटाई से प्राप्त उपज की सफाई, छंटाई आदि करके शुद्ध बीज तैयार करना है। आनुवंशिकी तथा पादप प्रजनन की वैज्ञानिक विधियों की खोज होने से पौधों के वरण, संकरण तथा बहुगुणन क्षेत्र में विकास हुआ वैज्ञानिकों द्वारा और अधिक उन्नत किस्में विकसित की गई। आनुवंशिक रूप से शुद्ध होने के अतिरिक्त बीजों में अन्य वांछित गुण जैसे ओज, अंकुरण क्षमता आदि विकसित करने की दिशा में अनुसंधान किये गये जिसके परिणाम स्वरूप मूल संकल्पना विकसित की गई है। इस प्रकार बीज संसाधन की सीमाओं का विस्तार हो गया है और इस कार्य में कई अन्य ऐसी प्रक्रियाएं शामिल हो गई हैं जिनका उद्देश्य बीज की आनुवंशिक शुद्धता बनाये रखने के साथ-साथ बीज को कीटों और रोगों के प्रभाव से मुक्त रखना भी है और उसकी अंकुरण क्षमता को ऊंचा रखना है।
यांत्रिक मिश्रण या संदूषण
किस्मों की शुद्धता के ह्रास में यांत्रिक संदूषण एक प्रमुख कारक है। कृषि क्रियाओं के दौरान कई तरह से यांत्रिक मिश्रण हो जाता है जैसे खेत में या खेत के बाहर अवांछनीय पौधों के बीज से मिश्रण हो जाता है। आस-पास के खेतों में भिन्न किस्मों की फसल होने से बीज का मिश्रण हो जाता है। इसके अलावा कंबाइन और गहाई यंत्रों को कई किस्मों के लिये प्रयुक्त करने पर भी मिश्रण हो सकता है। इस प्रकार के मिश्रण को रोकने के लिये अवांछनीय पौधों को बीज खेत से निकालते रहना चाहिये तथा कृषि क्रियाओं में प्रयुक्त होने वाले कंबाइन, गहाई यंत्रों को एक किस्म के बाद दूसरी किस्म में प्रयोग करने के पूर्व अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिये।
गुणवत्तायुक्त बीज के लक्षण
गुणवत्तायुक्त बीज आनुवंशिक रूप से शुद्ध होते हैं तथा इनकी आनुवंशिक शुद्धता का स्तर 99.5 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिये। हस्त नंपुसीकरण तथा परागण द्वारा उत्पादित आनुवंशिक शुद्धता 90 प्रतिशत होना आवश्यक है। गुणवत्तापूर्ण बीज भौतिक रूप से बीज मानकों के अनुरूप शुद्ध होते हैं तथा अधिकांश बीजों में भौतिक शुद्धता का स्तर 98 प्रतिशत होता है। बीज जमाव बीज मानक के न्यूनतम स्तर के बराबर या अधिक होता है। बीज जातीय लक्षणों के अनुरूप होते हैं, जिसके कारण अधिक उपज एवं गुणवत्ता युक्त रहते हैं। गुणवत्तायुक्त बीज जलवायु की भिन्नता के कारण कम से कम प्रभावित होते हैं तथा इनमें बीमारियों के प्रकोप को कम करने या बचने की प्रवृति होती है। उन्नत बीजों में निराई-गुडाई, सिंचाई एवं उर्वरक आदि के अधिक से अधिक उपयोग करने की क्षमता होती है। गुणवत्तायुक्त बीज अन्य फसलों तथा प्रजातियों के बीजों की मिलावट से मुक्त होते हैं। गुणवत्तायुक्त बीजों में एकरूपता होती है तथा कीट बीमारियों से मुक्त होते है, जिससे उत्पादकता अधिक होती है। अत: यह कहा जा सकता है कि उन्नत बीज उत्पादन उच्च गुणवत्ता वाले बीजों को सुलभ कराने की ऐसी विधि है, जिसमें उत्पादन, संसाधन, भंडारण, वितरण आदि के दौरान बीज गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले सभी कारकों पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण रखा जाता है, इसमें बीज प्रमाणीकरण संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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