किसानों की फीकी दीवाली

www.krishakjagat.org
Share

सिंचाई के साधन महंगे
पर ड्राप मोर क्राप का नारा देने वाले प्रधानमंत्री की घोषणा क्रियान्वयन के स्तर पर किसानों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है। सिंचाई के काम आने वाले वाले ड्रिप और स्प्रिंकलर पाईपों पर पूर्व में मात्र 5 प्रतिशत वेट टेक्स लगता था जो वर्तमान में 18 प्रतिशत टेक्स के दायरे में है। सिंचाई के पाईप महंगे हो गये हैं। ऐसे में पर ड्राप मोर क्राप का संकल्प क्या बनावटी नहीं हो गया है?
जिंस बाजार पर व्यापारियों का एकाधिकार
पिछले वर्ष तक बाजार भाव स्थिरीकरण के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि जिंसों की खरीद के लिए नाफेड, हाफेड जैसी शासकीय समर्थन से चल रही संस्थायें सक्रिय थीं। इन संस्थाओं की सक्रिय खरीद के कारण व्यापारियों से व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते बाजार में किसानों को उनकी उपज के अच्छे दाम मिल जाते थे परन्तु अब बाजार हस्तक्षेप योजना ठंडे बस्ते में है। भावांतर योजना के लागू होने के बाद कृषि जिंसों के बाजार पर व्यापारियों का एकाधिकार है। शासकीय खरीद प्रक्रिया स्थगित रहने से व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी नहीं बची और औने-पौने दामों में कृषि उपज खरीदने के लिए व्यापारी स्वतंत्र हैं, उनकी तो पौ बारह है लेकिन किसानों की हालात बिगड़ जाएगी। भावांतर योजना के लागू होने के बाद किसानों के पूरे उत्पादन पर भाव फर्क के अंतर की राशि शासन द्वारा नहीं दी जावेगी केवल प्रदेश के औसत उत्पादन की गणना कर सीमित मात्रा में ही भाव फर्क की राशि उसके खाते में आयेगी, उसकी लगन और परिश्रम से उगाया हुआ बाकी माल औने-पौने दामों में खरीद कर व्यापारियों का हित-लाभ बढ़ जाएगा। अधिशेष उपज का कम दाम मिलने से अंत-पंत किसानों को होने वाले घाटे के कारण निराशा ही हाथ लगेगी।
भावों का गिरना तय
दीपावली जैसा त्याहौर नजदीक होने के बावजूद भावांतर योजना दीवाली के ऐन 3 दिन पहले म.प्र. सरकार द्वारा लागू की गई। उसमें भी त्यौहारों के कारण मंडियों में व्यापार स्थगित रहा और दीपावली बाद जब मंडी में किसान एक साथ बड़ी मात्रा में विक्रय हेतु अपनी उपज लायेंगे तब भावों का गिरना तो तय है। पहले से ही मौसम की परिस्थितियां विपरीत रहने के कारण कृषि उत्पादन में कमी आई है, सितम्बर-अक्टूबर में हुई देरी से वर्षा के कारण पक रही फसलों की गुणवत्ता विपरीत रूप से प्रभावित हुई, वर्षा काल के प्रारंभ में देर से हुई वर्षा के कारण धान रोपाई में देरी और आखिरी दौर में देरी से वर्षा के कारण बढ़ते कीट प्रकोप से धान का उत्पादन भी निश्चित ही कम होगा। इसके बावजूद बढ़ती लागत, घटते उत्पादन और औने-पौने बाजार भाव मिलने से भावांतर योजना का लाभ बहुत सीमित मात्रा में किसान को मिलेगा।
आयात-निर्यात का लचर क्रियान्वयन
मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित बाजार भाव का देश में होने वाले कृषि उत्पादन से कोई संबंध नहीं बचा है। शासन की आयात- निर्यात योजनाओं के लचर क्रियान्वयन और कामोडिटी एक्सचेंज कृषि उपज का भाव निर्धारित करने के नये माध्यम बन गये हैं। आयात निर्यात के क्षेत्र में सक्रिय बड़े व्यवसायी सरकारी नीतियों के फेरबदल में हावी होकर चांदी काट रहे हैं और इस खेल से प्रभावित किसान हैरान-परेशान हैं, गरीब से भी गरीब होता जा रहा है। व्यवसाय की प्रकृति और प्रक्रिया से पूर्णत: अनजान अधिकारीगण नित नई लोक लुभावन योजनायें बनाने में जुटे हैं, राजनेता भी बिना निहितार्थ समझे किसानों को भरमाने के लिए इन्हें लागू करने का ढोल पीट रहे हैं और किसानों का इस फरेब में उलझ कर बंटाढार होता जा रहा है।
इस वर्ष देश में बड़े पैमाने पर मध्यप्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु आदि राज्यों में किसानों में व्याप्त असंतोष के कारण जन आंदोलन हुए हैं यहां तक कि बदन उघाड़े तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली में भी लम्बे समय तक धरना प्रदर्शन किया लेकिन सरकार है कि अच्छे दिन आने की ढपली बजाने के स्वांग में ही जुटी है।
निकट भविष्य में देश व्यापी किसान भाई अब एक नई मुसीबत का सामना करने वाले हैं। पूरी शासकीय मशीनरी नकली दूध व्यवसाय को तो नहीं रोक पाई परन्तु कृषि मंत्रालय ने दूध को आवश्यक वस्तु अधिनियम में लाने का प्रस्ताव भारत शासन के समक्ष प्रस्तुत किया है, इससे किसानों की परेशानियां बढऩा तय है।

इस बार दीपावली के अवसर पर बाजारों में रौनक कम रही, नोटबंदी और जीएसटी की नई व्यवस्था के कारण खरीदी-बिक्री भी पिछले वर्षों की तुलना में कम रही और इसके असर से किसान भाई भी अछूते नहीं रहे। पिछले वर्ष की तुलना में कृषि जिंसों के भावों में बड़ा अंतर है। सभी दलहन और तिलहन के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से बहुत कम हैं। यहां तक कि अरहर, मूंग, उड़द पिछले वर्ष की तुलना में 35 से 40 प्रतिशत कम भावों में बिक रहे हैं। सरसों पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत कम दाम पर बिक रही है। कपास का भाव भी समर्थन मूल्य से कम चल रहा है। सरकार को गिरते भावों को थामने के लिए बाजार में हस्तक्षेप करना चाहिए था परन्तु वह भी लंबे समय तक आंखें बंदकर सोती रही। देश में दलहनों के गिरते भावों के बावजूद दलहनी फसलों का आयात अबाध गति से जारी रहा। बेसन के लिए विदेशी पीली मटर के सस्ते दामों पर आयात जारी रहने से चने के भाव पिछले वर्ष की तुलना में आधे से भी कम होकर पानी-पानी हो गये। पिछले वर्ष दस हजार रु. क्विंटल तक के भाव दिखाने वाला चना पांच हजार से भी कम दामों पर बिक रहा है। सरकार को सिर्फ और सिर्फ शहरी वर्ग की महंगाई थामने के लिए चिंता है परन्तु उसे उत्पादन लागत में वृद्धि के बावजूद किसानों की घटती आय की कोई चिंता नहीं है। ऊँघती हुई सरकार को जब होश आया तब तक काफी देर हो चुकी थी। गिरते भावों को थामने के लिए दलहनों के आयात को बंद करने और इसके निर्यात को खोलने में अपेक्षाकृत बहुत देर लगाई।

 

  •  श्रीकांत काबरा- 9406523699
www.krishakjagat.org
Share
Share