सदाबहार धनिया उपजायें

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जलवायु एवं भूमि – धनिया की खेती शीतोष्ण एवं उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जाती है। बसंत ऋतु में पाला पडऩे से पौधों को क्षति होने की संभावना रहती है। इसका अंकुरण होने के लिए 20 डिग्री से.ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। धनिया की खेती के लिए दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। ऐसी भूमि जिसमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा ज्यादा हो एवं जल निकास की भी उचित व्यवस्था हो, इसकी खेती के लिए उचित होती है। इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान 6.5-8 के बीच होना चाहिए, क्योंकि ज्यादा अम्लीय एवं लवणीय मृदा इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है।
खाद एवं उर्वरक – धनिया प्रति हेक्टेयर में बुआई के लिए 100-150 कुंटल सड़ी हुई गोबर खाद, 80 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस एवं 50 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता पड़ती है। खेत की तैयारी के समय गोबर खाद को मिट्टी में भली प्रकार से मिला लें। नत्रजन की दो तिहाई मात्रा एवं फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा को अन्तिम बार जुताई से पहले खेत में दें। नत्रजन की शेष एक तिहाई मात्रा को दो बराबर भाग में बांटकर पहली बार बुआई के 30-35 दिन बाद देना चाहिए एवं शेष भाग को फूल निकलते समय देना चाहिए। धनिया की फसल में कार्बनिक खादों के प्रयोग से अच्छे परिणाम मिलते हैं, जबकि ऐसे खेत में जिनमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा कम होती है, इससे पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है।
बुवाई – धनिया को पत्ती के रूप में उपयोग करने के लिए इसको सालभर, उगाया जाता है। जबकि बीज के उद्देश्य से उत्तरी व मध्य भारत में इसकी एक फसल ली जाती है जिसकी बुआई अक्टूबर में करते हैं। जबकि दक्षिणी भारत में इसकी दो फसल ली जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी बुवाई मार्च में करते हैं। कर्नाटक एवं तमिलनाडु में मई माह में बुआई करते है।

बीज की मात्रा – इसकी बुआई 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से करते हैं। बीज की बुआई से पहले हल्के हाथ से रगड़कर या तोड़कर दो भागों में बांट लेना चाहिए। धनिया के बीज को बोने से पहले कवकनाशी दवाओं जैसे बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर लेना आवश्यक होता है। इस प्रकार से उपचारित बीज को 24 घंटे तक पानी में भिगोकर बुआई करने से 71.33 प्रतिशत तक अंकुरण पाया गया था। धनिया के बीज बुआई के लगभग 10 दिन बाद अंकुरित होते हैं।
धनिया में पौध अंतराल – पंक्तियों में बुआई  25-40 सेमी. तक की जाती है एवं पौधों के बीच की दूरी 5 सेमी. तक रखी जाती है। बीज को 2-3 सेमी. गहराई में बोना चाहिए।
अन्त: सस्य क्रियायें – धनिया में पौधों को खरपतवार से मुक्त रखना अत्यन्त आवश्यक होता है। इसके लिए धनिया में दो से तीन बार निराई-गुड़ाई करें। पहली निराई बुआई अंकुरण से 20-30 दिन बाद आरम्भ करें। जबकि दूसरी एवं तीसरी 20-25 दिनों के अंतराल पर करें। खरपतवार नियंत्रण हेतु अनेक खरपतवारनाशी का प्रयोग भी करते हैं,जिनमें प्रमुख रूप से लिनूरान, आक्नोडियजात, प्रोमेटिन, प्रोवेमिल इत्यादि का प्रयोग करने से खरपतवार पर नियंत्रण किया जा सकता है।
सिंचाई – धनिया की पत्तियों को बराबर हरा-भरा एवं मुलायम तथा रसीला रखने के लिए बराबर एवं कम अन्तराल पर सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। सिंचाई की कुल संख्या भूमि के प्रकार एवं मौसम पर निर्भर होती है। भारी मिट्टी में लगभग 3-4 बार एवं हल्की भूमि में 5-6 बार सिंचाई करें।
पत्तियों की तुड़ाई एवं भण्डारण – धनिया में हरी पत्तियों की तुड़ाई, बीज को बुआई से लगभग 16-20 दिन बाद की जा सकती है। इस समय तक इसके पौधे 5-6 से.मी. की ऊंचाई के हो जाते है। पत्तियों की तुड़ाई बुआई के 60-70 दिन बाद तक जब तक उसमें पुष्प नहीं आ जाते हैं तब तक तुड़ाई करते रहते हैं। इसके अलावा यदि धनिया को पत्ती एवं बीज दोनों उद्देश्य से उगाया जाए तो पत्तियों की 1 से 2 बार कटाई करने के बाद बीज के लिए छोड़ देते हैं।
उपज – धनिया के बीज की औसत उत्पादन क्षमता 6-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। हरी पत्तियों की दृष्टि से इसकी उत्पादन क्षमता 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।

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