खीरा की खेती

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जलवायु – खीरा गर्म जलवायु का पौधा है। यह अधिक ठंड एवं पाला सहन नहीं कर सकता है। जहां वातावरण में आद्र्रता कम हो और सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में हो तो खेती अच्छी प्रकार से की जा सकती है। 18-24 डिग्री सेल्सियस तापमान बेलों की बढ़वार एवं उपज के लिए उत्तम रहता है।
भूमि – खीरे की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। खीरे की अगेती फसल के लिए बलुई या बलुई-दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। लेकिन अधिक उपज के लिए जीवांश युक्त दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। 5.5 से 6.8 पीएच मान वाली मिट्टी खेती के लिए उपयुक्त होती है। खीरे की अधिक पैदावार के लिए जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए ।
उन्नत किस्मेें –जापानी लाँग ग्रीन, चाइना, पोइन सेट, पूसा उदय
बुवाई विधि एवं समय- खेत की जुताई दो-तीन बार करके मिट्टी को भुरभुरा बना चाहिए । अच्छी प्रकार से तैयार खेत में 1.5-2 मीटर की दूरी पर 30 से.मी. चौड़ी नालियां बना लेते हैं। नालियों के दोनों किनारों पर 60 से.मी. की दूरी पर थाला बनाकर बीज की बुवाई करते है। एक थाला में दो-तीन बीज ही बोते हैं। बीज जमने पर प्रत्येक थाले में एक पौधे को छोड़कर बाकी पौधे निकाल लेते हैं।
बुवाई का समय – जायद की जिसमें 1/3 भाग सड़ी हुई गोबार खाद मिलाकर भरें इसके पश्चात उपचारित बीजों को इन थैलियों में बोएं एवं झारे से सिंचाई करें । थैलियों में जमे पौधे को थैलियों से निकालकर मिट्टी सहित खेत में स्थानांतरित कर देते हैं।
बीज की मात्रा एवं बीज शोधन- एक हेक्टेयर खेत की बुवाई के लिए 80-85 प्रतिशत अंकुरण क्षमता वाले बीज की 2.5-3.5 किलोग्राम मात्रा की आवश्यकता होती है। बीज को बोने से पहले 1 ग्राम बाविस्टीन दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए।
एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन- खाद एवं उर्वरक का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करें। सामान्यत: खेत की तैयारी करते समय 20-25 टन गोबर सा कम्पोस्ट बुवाई से एक माह पूर्व प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देना चाहिए। इसके अतिरिक्त तत्व के रूप में 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस एवं 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से डालते हैं। नाईट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय थाले में डालना चाहिए। बचे हुए नाईट्रोजन की मात्रा बुवाई 30 एवं 45 दिन बाद बराबर-बराबर पौधें की जड़ो के पास थाले में देना चाहिए। खाद डालते समय खेत में पर्याप्त नमी होना चाहिए अन्यथा खाद को मिट्टी में मिलाकर पानी डाल देना चाहिए।
सिंचाई एवं जल निकास- खीरे में सिंचाई भूमि एवं मौसम के अनुसार करनी चाहिए । ध्यान रहे कि खेत में जल भराव नहीं होना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति हो जाए तो अतिरिक्त जल को तुरंत निकाल देना चाहिए अन्यथा पौधों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। निराई-गुड़ाई- अच्छी पैदावार के लिए फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना आवश्यक है। इसके लिए समय-समय पर निराई -गुड़ाई करते रहने से मिट्टी में वायु – संचार समुचित होता रहता है। खरपतवारों द्वारा बहुत से रोगों एवं कीटो द्वारा फसल को नुकसान होने का डर रहता है।
उपज – प्रति हेक्टेयर 100-150 क्व्ंिाटल तक उपज मिल जाती है।

  • सुनील त्यागी
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