भूमि क्षरण कारण एवं निवारण

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रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मृदा संरचना नष्ट हो जाती है जिससे  भूमि क्षरण मृदा के कण एक दूसरे से अलग हो जाते हैं परिणामस्वरूप मृदा अपरदन की दर में तीव्र वृद्धि की सम्भावना बढ़ जाती है। कृषि में जल के अत्यधिक प्रयोग से जलजमाव के कारण मृदा की लवणता एवं क्षारीयता में वृद्धि होती है जिससे उपजाऊ भूमि उसर भूमि में परिवर्तित हो जाती है। सिंचाई जल के कुप्रबंधन के कारण देश की लगभग 6 मिलियन हेक्टर भूमि जल जमाव से प्रभावित है तथा तकरीबन 7 मिलियन हेक्टेयर भूमि लवणता एवं क्षारीयता से प्रभावित है।

भूमि क्षरण के कारण:

जनसंख्या विस्फोट, औद्योगीकरण, शहरीकरण, वनविनाश, अत्यधिक चराई, झूम कृषि तथा खनन गतिविधियां भूमि संसाधनों के क्षरण के प्रमुख कारण हैं। इनके अतिरिक्त रसायनिक उर्वरकों एवं नाशीजीवनाशकों (पेस्टीसाइड्स) पर आधारित पारम्परिक कृषि भी भूमि क्षरण का एक प्रमुख कारण है। हरित क्रान्ति के आगमन से कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए रसायनिक खादों, कीटनाशकों तथा शाकनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से न केवल वातावरण प्रदूषित हुआ है, अपितु भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों की जनसंख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की गयी है जिससे मृदा की पैदावार शक्ति में कमी आयी है।

अत्यधिक रसायनिक उर्वरकों विशेषकर यूरिया के प्रयोग से भूमि अम्लीय हो जाती है। अम्लीय मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे कापर तथा जिंक पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। इसके अतिरिक्त इस प्रकार की मृदा में आमतौर से कैल्शियम तथा पोटेशियम तत्वों का अभाव होता है। इसलिए इस प्रकार की मृदा में फसल की पैदावार में गिरावट आ जाती है।

भूमि क्षरण का निवारण :

भूमि जैसे महत्वपूर्ण संसाधन का क्षरण देश के समक्ष एक गंभीर समस्या है। अत: इस समस्या का निराकरण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो निकट भविष्य में देश में खाद्यान्न उत्पादन की दर में गिरावट होगी परिणामस्वरूप आर्थिक विकास अवरूद्ध होगा और 125 करोड़ की आबादी वाले देश भारत में भूख और कुपोषण के चलते मृत्यु दर में अभूत पूर्व बढ़ोत्तरी होगी। यद्यपि 1950 की तुलना में (लगभग 51 मिलियन टन) आज देश की कुल खाद्यान्न उत्पादन क्षमता में पांच गुना से ज्यादा वृद्धि हुई है (लगभग 259 मिलियन टन)।

सत्येन्द्र कुमार गुप्ता फिर भी बढ़ती जनसंख्या एवं मांग को देखते हुए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि देश की लगभग 42 करोड़ आबादी आज भी अत्यंत ही गरीब होने के कारण भुखमरी एवं कुपोषण की शिकार है। इसलिये उपजाऊ भूमि का संरक्षण तथा क्षरित भूमि का पुनरुत्थान अत्यंत ही आवश्यक है ताकि देश में खाद्यान्न उत्पादन को और बढ़ाया जा सके जिससे कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था को और सुदृढ़ किया जा सके।

भूमि क्षरण रोकने के लिए संपोषित कृषि को अपनाया जाये 

इसके लिए आवश्यक है कि पारम्परिक कृषि के स्थान पर संपोषित कृषि को अपनाया जाये जिसमें रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, शाकनाशकों आदि का प्रयोग केवल आवश्यकता पढऩे पर सीमित मात्रा में होता है। संपोषित कृषि में मृदा की उर्वरा शक्ति की वृद्धि के लिये हरी खाद, गोबर खाद, कम्पोस्ट, केंचुआ, केंचुआ खाद, जैविक खाद आदि का उपयोग होता है जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य बना रहता है परिणामस्वरूप मृदा संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।

जल अपरदन से प्रभावित कृषि भूमि का संरक्षण एवं पुनरुत्थान घास की प्रजातियों के रोपण से किया जा सकता है

जल अपरदन से प्रभावित कृषि भूमि का संरक्षण एवं पुनरुत्थान घास की प्रजातियों जैसे दूब (साइनोडान डेक्टिलान), अंजान (सिनक्रस सिलिएटस) तथा मुंज (सैक्रम मुंजा) के रोपण से किया जा सकता है। उक्त घास की प्रजातियां आमतौर से बहुवर्षीय एवं कठोर प्रवृत्ति की होती हैं। इनकी जड़ें मिट्टी के कड़ों को बांधकर मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होती हैं। घासों के निरन्तर उगने से मृदा में जीवांश पदार्थ की वृद्धि होती हैं। जिससे मृदा संरचना में सुधार के साथ-साथ उसकी उपजाऊ क्षमता में भी वृद्धि होती है।

देश के शुष्क एवं अद्र्ध-शुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन एक गंभीर समस्या है। वायु अपरदन से प्रभावित भूमि को मेंहदी (लावसोनिया एल्बा), कनेर (थीबेटिया नेरीफोलिया), आक (कैलोट्राफिस प्रोसेरा), मदार (कैलोट्रापिस जाईजेण्टिया) अरण्ड, (रीसिनस कम्यूनिस), बेर (जीजीफस मारिसियाना), खैर (अकेसिया कटेचू), सफेद कीकर (अकेसिया ल्यूकाफिलया), शीशम (डेलबर्जिया शीशू), ईमली (टेमरिण्डस इण्डिका) तथा खेजरी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) जैसे कठोर पौधों की प्रजातियों के रोपण के संरक्षण प्रदान किये जाने की तत्काल आवश्यकता है।

यद्यपि बीहड़ भूमि का पुनरूत्थान मुश्किल कार्य है बावजूद इसके खैर (अकेसिया कटेचू), खेजरी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया), पलास (ब्यूटिया मोनोस्परमा), शिरीष (एल्बिजिया लिबेक), नीम (एजाडिराक्टा इण्डिका), शीशम (डेलबर्जिया शीशू), चिलबिल होलोप्टीलिया इन्ट्ग्रीफोलिया), करंज (पानगैमिया पिन्नेटा) तथा नरबास (डेण्ड्रोकेलैमस स्ट्रिक्ट्स) जैसी काष्ठीय प्रजातियों का रोपण कर बीहड़ भूमि को स्थिरता प्रदान किये जाने की आवश्यकता है ताकि बीहड़ भूमि विस्तार को रोका जा सके।

यद्यपि खनन गतिविधियां पर्यावरण के दृष्टिकोण से हानिकारक होती हैं परंतु आर्थिक विकास के लिए अत्यन्त ही आवश्यक होती हैं। खनन गतिविधियों के कारण भूमि में जबरदस्त उलटफेर होता है फलस्वरूप नीचे की मृदा जिसमें पोषक तत्वों तथा कार्बनिक पदार्थों का अभाव होता है ऊपर आ जाती है जबकि इसके विपरीत ऊपर की उपजाऊ मृदा की परत नीचे चली जाती है। इस प्रकार खनन कार्य से प्रभावित भूमि की उपजाऊ क्षमता शून्य हो जाती है।

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