बासमती पर बवाल – हाईकोर्ट में सरकार लड़ेगी कानूनी लड़ाई

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म.प्र. के हक पर लगाया अड़ंगा

(अतुल सक्सेना )
भौगोलिक संकेतक पंजीयन (जीआई रजिस्ट्री) द्वारा म.प्र. की खुश्बूदार धान बासमती को मान्यता नहीं देने के फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार ने चेन्नई हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी है। सरकार का दावा है कि प्रदेश में बासमती धान बहुतायत में पैदा होती है इसे जीआई टैग नहीं देने से न सिर्फ किसान हतोत्साहित हैं बल्कि व्यापार भी प्रभावित हो रहा है। एग्रीकल्चर एण्ड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेव्हलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) द्वारा प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर जी.आई. ने प्रदेश के ऐतिहासिक तथ्यों को दरकिनार कर प्रदेश की धान को बासमती मानने से इंकार कर दिया है। एपीडा के अडंग़ा लगाने के कारण बासमती पर बवाल मच गया है। केंद्र द्वारा ब्रीडर सीड की आपूर्ति रोकने को भी प्रदेश सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अलग से चुनौती दी है। चेन्नई एवं दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने के कारण अब घमासान मच गया है। प्रदेश सरकार पूरी ताकत से कानूनी लड़ाई लड़कर बासमती को जीआई टैग दिलाने का प्रयास कर रही है। गत मार्च 2018 में दिए गए फैसले के विरूद्ध प्रदेश सरकार को लगभग तीन माह का समय मिला है। जिसमें तैयारी कर सरकार पुन: दावा पेश करेगी।

म.प्र. की धान को बासमती का दर्जा देने की मांग केवल हवा-हवाई नहीं है। इसके पक्ष में वर्ष 1908 के दस्तावेज प्रस्तुत किए जा रहे हैं जिसमें बासमती धान म.प्र. के किसानों द्वारा पैदा करने का उल्लेख है। वर्तमान में राज्य के लगभग 80 हजार किसान 13 जिलों में इसकी खेती करते हैं। इसमें ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना, श्योपुर, दतिया, शिवपुरी, गुना, विदिशा, रायसेन, सीहोर, होशंगाबाद, जबलपुर और नरसिंहपुर जिले शामिल हैं। इन जिलों के लगभग 5 लाख एकड़ में बासमती उगाई जा रही है। यहां की मिट्टी और जलवायु भी इसके अनुकूल है। इसके बावजूद जीआई टैग न मिलना अब प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान भी केंद्रीय मंत्रियों के समक्ष अपना पक्ष रख कर म.प्र. को जी.आई.टैग दिलाने की वकालत कर चुके हैं। जी.आई. पंजीयन में वर्ष 2008 में मामला दायर किया गया था। पूर्व में जीआई पंजीयन ने फैसला भी म.प्र. के हक में सुनाया था परंतु एपीडा ने विरोध कर मामला उलझा दिया। दूसरी बार फैसला म.प्र. के विरोध में आया। अब प्रदेश सरकार निर्यात एवं बासमती के आधार बीज का केन्द्र द्वारा आवंटन को पुख्ता कर पक्ष में साक्ष्य जुटा रही है ताकि मजबूत दावा पेश किया जा सके।


दूसरे राज्यों से स्पर्धा
देश में बासमती के लिये उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उ.प्र., हिमाचल एवं जम्मू कश्मीर को जी.आई टैग दिया गया है। इससे यहां की बासमती को गुणवत्ता का दर्जा मिल गया है, परंतु इसके विपरीत म.प्र. से लगभग 20 फीसदी बासमती चावल का क्रय कर निर्यात किया जा रहा है। दूसरे नामों से यह कारोबार होता है इसका सालाना कारोबार लगभग 3000 करोड़ रुपये आंका गया है। म.प्र. के हक को अन्य राज्य छीनने के प्रयास में है वे नहीं चाहते कि म.प्र. बासमती कारोबार में आगे आए क्योंकि इससे उनके व्यापार एवं आय पर असर पड़ेगा। देश में बासमती का उत्पादन 60 लाख टन होता है इसमें से 40 लाख टन का निर्यात किया जाता है। जो लगभग 25 हजार करोड़ का होता है। शेष बासमती की खपत देश में ही हो जाती है। इधर मध्य प्रदेश में बासमती का 8 लाख टन उत्पादन होता है।
एपीडा की मनमानी
एपीडा ने बासमती को जीआई टैग देने के लिए उत्पादन क्षेत्र की व्याख्या में दोहरा रवैया अपनाया है। उसने कहीं हिमालय के फुट हिल्स (तराई) की परिभाषा को इस्तेमाल किया तो कहीं इंडो गंगेटिक प्लेन एरिया (गंगा कछार) को शामिल कर लिया। उत्पादन क्षेत्र के इसी भेद में मध्यप्रदेश को बाहर कर दिया गया, इसलिये अब सरकार इन दोनों व्याख्याओं को भी कोर्ट में चुनौती देगी। इसके दस्तावेज और एपीडा के तर्कों को एकत्रित किया जा रहा है। मध्यप्रदेश का बासमती पर दावा खारिज करने में एपीडा ने सबसे पहले यह हवाला दिया कि हिमालय के फुट हिल्स क्षेत्र में बासमती का उत्पादन होता है। बाद में उसी ने बासमती उत्पादन के मामले में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ ऐसे हिस्सों को शामिल कर लिया, जो हिमालय के फुट हिल्स क्षेत्र में नहीं आते है। इन राज्यों के इन हिस्सों को शामिल करने के लिये एपीडा इंडो गंगेटिक प्लेन एरिया की व्याख्या को आधार बना लिया। एपीडा ने कहा कि जनता में इंडो गंगेटिक प्लेन एरिया में ही बासमती की पारम्परिक खेती होने की आम धारणा है। इस कारण इन राज्यों के हिमालय के फुट हिल्स में न आने वाले हिस्से भी बासमती की पारम्परिक खेती के लिये शामिल कर लिए गए। मध्यप्रदेश सरकार के मुताबिक एपीडा ने अपनी सुविधा के हिसाब से सात राज्यों को बासमती जीआई-टैग के लिए कभी हिमालय के फुट हिल्स और कभी इंडो गंगेटिक प्लेन एरिया शब्दों का उपयोग किया। प्रदेश ने इस पर आपत्ति ली, लेकिन कोई साक्ष्य नहीं रखे गए।

 म.प्र. में बासमती की खेती
– 13 जिले के 5 लाख एकड़ में
– 80 हजार किसान संलग्न
– 3 हजार करोड़ का निर्यात
– 8 लाख टन उत्पादन

हरियाणा और पंजाब के लिए एपीडा ने इंडो गंगेटिक प्लेन एरिया की व्याख्या को भी तोड़ा-मरोड़ा है। इसमें हरियाणा के उन हिस्सों को शामिल किया गया, जो मध्यप्रदेश के बासमती उत्पादन के 1908 के रिकार्ड से बरसों बाद 1947 में बासमती उत्पादन में आए। उत्पादन के रिकार्ड को भी इन व्याख्याओं में दरकिनार किया गया।


विदेश निर्यात आधार बनेगा
मध्यप्रदेश का बासमती चावल यूएस, यू.के. सहित कई देशों को निर्यात किया जाता है। यह प्रदेश में होने वाले उत्पादन का 60 प्रतिशत हिस्सा होता है। अब प्रदेश सरकार बासमती का जीआई टैग पाने के लिए इस निर्यात के समूचे डाटा भी जुटाएगी। ये डाटा कोर्ट में सुनवाई के दौरान पेश किए जाएंगे।
मध्यप्रदेश का बासमती विदेशों में भी बेचा जाता है। उसे लेकर कभी कोई शिकायत भी नहीं आई। प्रदेश के बासमती चावल से इस किस्म की कीमत में भी इजाफा हुआ है। दरअसल, एपीडा के मध्यप्रदेश के दावे को खारिज करने के पीछे यह कारण भी बताए गए थे कि यदि यहां के इस चावल को बासमती किस्म में शामिल किया जाता है तो इससे बासमती निर्यात में कीमत घट सकती है। अब सरकार विदेश निर्यात के डाटा और फीडबैक का एनालिसिस करेगी।
पाकिस्तान ने भी लगाया था अडंग़ा
इसी क्रम में वर्ष-2014 में पाकिस्तान ने बासमती जीआई टैग का विरोध किया था, तब कानूनी लड़ाई में पाकिस्तान की ओर से पर्याप्त साक्ष्य नहीं दिए गए थे। भारत की ओर से जो साक्ष्य दिए गए, उनमें मध्यप्रदेश के साक्ष्य भी शामिल थे। वर्ष-2016 के बाद दोनों देशों ने ब्रांड बासमती के लिये काम करना तय किया था। इसलिए मध्यप्रदेश के तथ्यों में इन बिंदुओं को भी शामिल किया गया है। म.प्र. सरकार द्वारा अब प्रत्येक उन तथ्यों को वापस देखा जा रहा है, जो कोर्ट में मध्यप्रदेश के दावे को मजबूत कर सकते हैं। इसलिये सरकार ने इसका एक प्रेजेटेंशन भी तैयार किया है। इसमें बासमती के प्राचीन तथ्यों के साथ पाकिस्तान के दावे और उसके बाद साक्ष्य देने में विफल हो जाने के तथ्यों को भी लिया गया है। हालांकि पाकिस्तान के साथ तथ्यों की लड़ाई में भारत के पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के तथ्य भी महत्वपूर्ण थे। बावजूद इसके मध्यप्रदेश के कानूनी संघर्ष में इन तथ्यों को शामिल किया है।
मध्यप्रदेश का विरोध
मध्य प्रदेश में उगाए जाने वाले बासमती चावल को ज्यॉग्राफिकल इंडीकेटर (जीआई) पेटेंट दिए जाने के विरोध में उद्योग संगठन उतर आए हैं। संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार को बासमती चावल की ग्लोबल प्रतिष्ठा को बचाना चाहिए और मध्य प्रदेश समेत दूसरे राज्यों को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए। अगर ऐसा किया गया तो उद्योग और बासमती की पैदावार वाले पारंपरिक राज्यों के किसानों पर इसका बुरा असर पड़ेगा।
बासमती राइस फार्मर्स एंड एक्सपोर्टर्स डवलपमेंट फोरम का कहना है कि सरकार को बासमती ब्रांड की उसी तरह सुरक्षा करनी चाहिए जैसे फ्रांस अपनी शैंपेन की सुरक्षा करता है। फोरम की सदस्य प्रियंका मित्तल ने एक बयान में कहा कि मध्य प्रदेश बासमती चावल का ब्रांड हासिल करना चाहता है। अगर बासमती उत्पादक क्षेत्रों में मध्य प्रदेश को भी शामिल किया जाता है तो इससे ब्रांड की खासियत पर असर पड़ेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मध्य प्रदेश के बासमती का विरोध भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा भी किया जा रहा है।
ब्रीडर सीड आवंटन रोकने पर ऐतराज
बासमती को लेकर केंद्र से ब्रीडर सीड आवंटन रोकने और एपीडा के जीआई टैग से बाहर करने के खिलाफ मध्यप्रदेश कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। बाकी किसी राज्य ने इन फैसलों को चुनौती नहीं दी। बासमती छिनने के चलते केंद्र सरकार ने ब्रीडर सीड का आवंटन रोक दिया था। प्रदेश सरकार ने इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में गुहार लगाई। केंद्र ने मध्यप्रदेश के साथ बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का आवंटन भी रोका था। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में यह पक्ष रखेगा कि केवल उसने ही केंद्र के आवंटन रद्द करने को चुनौती दी। प्रदेश का तर्क है कि जब 1999 से 2016 तक हर साल ब्रीडर सीड आवंटन होता रहा और उसमें किसी तरह की कोई शिकायत नहीं रही तो अचानक आवंटन कैसे रोका जा सकता है। इस आवंटन रोकने को मध्यप्रदेश ने गलत ठहराया और कहा कि इन 18-20 सालों में केन्द्र ने लगभग 34000 क्विंटल बीज प्रदेश को उपलब्ध कराया है इससे उत्पादन भी लिया गया है।
बहरहाल बासमती जीआई टैग के लिये म.प्र. की अगली सुनवाई में सरकार पूरा जोर लगा रही है।

 म.प्र. सरकार बासमती को जीआई टैग दिलाने के लिए पुख्ता सबूतों के साथ इस बार सुनवाई में अपना मजबूत दावा पेश करेगी। कृषि विभाग सारे सबूत जुटा रहा है प्रदेश का यह हक है इसमें हार नहीं मानेंगे। मुझे उम्मीद है कि इस बार फैसला हमारे पक्ष में होगा। चेन्नई एवं दिल्ली हाईकोर्ट दोनों जगह कानूनी लड़ाई में हम जीतेंगे।
                                                          – मोहन लाल
                                              संचालक कृषि (म.प्र.)

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