अलसी के रोग – निदान

www.krishakjagat.org

गेरूआ- रोगजनक का नाम मेलैम्पसोरा लाइनाइ है। भारतवर्ष में सभी अलसी के खेतों में गेरूआ रोग प्रकोप होता है। पूर्व में यह रोग फसल का 50 प्रतिशत उत्पादन नष्ट करता था एवं किसी न किसी वर्ष तो रोग महामारी से प्रकोप करता था। परंतु रोग प्रतिरोधी जातियों के उपयोग से रोग की उग्रता में कमी हुई है। रोग से 50 प्रतिशत तक उपज में कमी आंकी गई है। अलसी का यह सबसे महत्वपूर्ण रोग है। रोग प्रकोप से बीज की उपज में कमी के साथ-साथ तेल की मात्रा में भी कमी करता है।
लक्षण- गेरूआ रोग का प्रकोप जनवरी के अंतिम सप्ताह से शुरू हो जाता है तथा फरवरी तक इसका फैलाव स्पष्ट दिखाई देने लगता है। आरंभ में रोग द्वारा चमकदार नारंगी रंग के स्फोट पत्तियों के दोनों ओर बनते हैं। ये स्फोट लगभग 1 से 1.5 से. मी. व्यास के होते हैं। यह रोगजनक की यूरिडीयल अवस्था है। रोग की उग्र अवस्था में सभी पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं।
नियंत्रण –
(क) खड़ी फसल में – खड़ी फसल में रोग नियंत्रण के लिये फरवरी माह के माह के प्रथम सप्ताह में केवल एक छिड़काव घुलनशील गंधक 0.2 प्रतिशत का करें अथवा 300 मेश का गंधक 15 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें। दूसरा छिड़काव या भुरकाव आवश्यकतानुसार किया जा सकता है।
(ख) बुवाई पूर्व – रोग प्रतिरोधी जातियों का चुनाव किया जा सकता है। उपलब्ध गेरूआ रोधी जातियों के नाम है। नीलम, मुक्ता, आर-552, किरण, टी-397 आदि इन सभी उन्नत जातियों में से किसी भी किस्म को उपयोग में लाया जा सकता है एवं बिना किसी खर्च के रोग नियंत्रित किया जा सकता है। जंगली अलसी पौधों को खेत एवं आसपास से नष्ट करें।
उकठा या म्लानि- इस रोग के रोगजनक का नाम फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम फा. स्पि. लाइनाइ है। रोग प्रकोप से प्रभावित पौधे मर जाते हैं। कभी-कभी 5 प्रतिशत तक रोग प्रकोप देखा गया है। इस रोग का महत्व इसलिये भी अधिक हो जाता है क्योंकि प्रभावित पौधे किसी भी समय संक्रमित हो सकते हैं।
लक्षण – फसल की किसी भी अवस्था में रोग का संक्रमण हो सकता है। प्रभावित पौधे पर्याप्त नमी के रहते हुए पीले पड़े लगते हैं और कुछ ही दिनों में मुरझाकर सूख जाते हैं। नियंत्रण –
(क) खड़ी फसल में – खड़ी फसल में नियंत्रण के कोई भी उपाय न अपनाये जायें क्योंकि कोई भी उपाय रोग नियंत्रण नहीं कर सकेंगे।
(ख) बुवाई पूर्व –रोग नियंत्रण केवल रोगरोधी जातियों के लगाने से संभव है। रोग रोधी किस्मों के नाम के नीचे दिए जा रहे हैं जिन्हें कई वर्षों के परीक्षण के बाद रोगरोधी पाया गया है इन्हें समस्या ग्रस्त क्षेत्र के लिए चुनना चाहिए। एन.पी.-12, एन.पी.21, आर. आर.-5 बी.के.-1, के-2 तथा मयूरभंज 1।
बीज बाविस्टीन दवा 2.5 ग्राम प्रति किलो की दर से उपचारित करके बोयें। लगातार अलसी फसल एवं खेत में न ली जाये एवं फसल चक्र अपनाया जाये जो समस्याग्रस्त खेतों की उग्रता कम करने में सहायक होता है।
चूर्णी फफूंद या पाउडरी मिल्ड्यू- यह रोग ऑडडियम लाइनाइ नामक फफूंद से उत्पन्न होता हैं। यह रोग भारतवर्ष में सभी देरी से बोई गई फसल पर निश्चित ही प्रकोप करता है। रोग से होने वाली हानि का सही अनुमान नहीं लगाया गया है परंतु प्रभावित फसल से बहुत कम उपज प्राप्त होती है।
लक्षण – इस रोग के लक्षण जनवरी मध्य से फसल पर देखे जा सकते है। सबसे पहले पौधों की सबसे नीचे की पुरानी पत्तियों पर सफेद चकत्तों के रूप में प्रकट होता है। रोग तीव्रता से बढ़ता है। और 15-20 दिन में ही पूरी फसल पर फैल जाता है। पत्तियों के दोनों पर पाउडर वास्तव में रोगजनक फफूंद के कवकजाल एवं अलैंगिक बीजाणुओं का समूह है।
नियंत्रण –
(क) खड़ी फसल में- अलसी के गेरूआ रोग के नियंत्रण के लिए सुझाई गई दवा इस रोग के नियंत्रण के लिए भी कारगर होती है। घुलनशील गंधक 0.2 प्रतिशत का छिड़काव अथवा 300 मेश वाले गंधक चूर्ण का भुरकाव किया जा सकता है। एक छिड़काव या भुरकाव जनवरी के अंतिम सप्ताह या फरवरी प्रथम सप्ताह में किया जाना चाहिए।
(ख) बुवाई पूर्व – अलसी की फसल कम खर्च की खेती विधि द्वारा उगाई जाती है इसलिए रोग नियंत्रण के लिए व्यवस्था करना आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं होता है। बिना खर्च रोग नियंत्रण रोग प्रतिरोधी जातियों के चुनाव से संभव है।

  • टिकेन्द्र कुमार
    email: tikendrasahu4481@gmail.com
FacebooktwitterFacebooktwitter
www.krishakjagat.org
Share