अरहर में रोग व्याधि प्रबंधन

अरहर पर लगने वाले प्रमुख रोग उकटा, फायटोप्थोरा, ब्लाईट है साथ ही देरी से बोई जाने वाली जातियॉें में कभी-कभी स्टरलिटी मोजेक की समस्या देखी जा सकती है। उकटा एवं फायटोप्थोरा ब्लाईट भूमि जनित रोग है अत: इनका नियंत्रण समन्वित रोग प्रबंधन द्वारा ही संभव है।
उकटा रोग
यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है।
रोग के लक्षण – इस रोग के लक्षण छोटे पौधों पर फसल की फूल लगने की अवस्था पर देखे जा सकते हैं छोटे पौधे समूहों में सूखते हुए दिखाई पड़ते हैं। रोग ग्रसित पौधों के तनों पर बैंगनी रंग की धारियां नीचे से ऊपर की ओर दिखाई देती है। रोगी पौधे को लम्बवत काटकर देखने पर अंदर काले भूरे रंग की धारियां दिखाई देती है। यह लक्षण जड़ों व तनों में देखे जा सकते हैं। कभी पौधे का एक भाग उकटा रोग से प्रभावित होता है।
प्रबंधन –

  • बोनी हेतु रोग रहित प्रमाणित बीज का उपयोग करें।
  • लगातार एक ही खेत में अरहर की फसल न बोयें।
  • उकटा रोग से प्रभावित खेत में तीन साल तक अरहर की फसल न लें।
  • अरहर के साथ अंतरवर्तीय फसल ले जैसे- ज्वार।
  • ग्रीष्म ऋतु में खेतों की गहरी जुताई करें, न पूर्व फसल के अवशेषों को बीनकर नष्ट करे।
  • बीजों को बोनी के पूर्व 2 ग्राम थायराम $ 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम या वीटावेक्स पावर की एक ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज के हिसाब से बीजोपचार करें।
  • जे.के.एम.-189, सी.4, जे.के.एम-7, बी.एम.एम.आर.-853, 736 आशा आदि रोग निरोधक किस्मों का प्रयोग करें।
  • उकटा ग्रस्त पौधों को उखाड़कर जलाने हेतु उपयोग करें।
मध्यप्रदेश में दलहनी फसलों के स्थान पर सोयाबीन के क्षेत्रफल में वृद्धि होने से दलहनी फसलों को रकबा घट रहा है, साथ ही साथ अरहर फसल का क्षेत्र उपजाऊ समतल जमीन से हल्की ढाल, कम उपजाऊ जमीन पर स्थानांतरित हो रहा है। जिससे उत्पादन में भारी कमी हो रही है, परन्तु अरहर फसल की व्यापक क्षेत्रों के अनुकूल उच्च उत्पादन क्षमता वाली उकटारोधी प्रजातियों के उपयोग करने से उत्पादकता में होने वाले उतार-चढ़ाव में कमी तथा उत्पादकता में स्थायित्व आया है। अरहर दाल के आसमान छूते भाव के कारण फिर से मध्यप्रदेश के किसानों का रूझान अरहर की खेती की ओर बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में अरहर को लगभग 5.3 लाख हेक्टेयर भूमि में उगाया जाता है। जिससे औसतन 530 किलो प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

फायटोप्थोरा ब्लाईट (झुलसा रोग)
यह रोग फायटोप्थोरा डेक्सलरी उपजाति के द्वारा होता है>
लक्षण – रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें तने पर जमीन के ऊपर गठान नुमा असीमित वृद्धि दिखाई देती है व पौधा हवा आदि चलने पर यहीं से टूट जाता है। पौधों पर फफुंद के आक्रमण से तने पर डंठल पर भूरे काले रंग के क्षेत्र दिखाई देते है।
प्रबंधन –

  • रोग रहित खेतों में अरहर की फसल ले।
  • निचले व पानी से भरे रहने वाले खेतों में अरहर फसल न ले क्योंकि इस रोग का संक्रमण पानी व हवा के द्वारा होता है।
  • रोग से बचाव हेतु ऊंची उठी हुई क्यारियां बनाकर बुवाई करे।
  • दो कतारों के बीच की दूरी ज्यादा रखें।
  • 3 ग्राम मैटालिक्सिल फफूंदनाशक दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें।
  • अंकुरण के 15-20 दिन पश्चात् रेडोमिल नामक फफूंदनाशक के दो छिड़काव 15 दिन के अंतराल से करे।
  • अरहर की रोग सहनशील उन्नत जातियां जैसे जे.ए.-4, जे.के.एम.-189, आई.सी.पी.एल.-150, 288, 304 आदि का उपयोग करें।

स्टरलिटी मोजेक (बांझपन विषाणु रोग)
यह एक विषाणु (वायरस) से होता है। यह रोग रस चूसने वाले कीटों एरियोफिड माईट के द्वारा फैलता है।
लक्षण – रोग ग्रसित पौधों के ऊपरी शाखाओं में पत्तियां छोटी, हल्के रंग की तथा अधिक लगती है और फूल फली नहीं लगती। रोगग्रस्त पौधे झाड़ीनुमा हल्के रंग के होते है।
प्रबंधन –

  • फसल कटने के बाद बचे हुए ठूंठ नष्ट करे।
  • जैसे ही रोगी पौधा दिखाई दे उखाड़कर जला दें।
  • फसल चक्र अपनायें।
  • फुराजन -3 जी या 10 प्रतिशत एल्डीकार्ब 3 ग्राम 1 कि.ग्रा. बीज से बीजोपचार करे।
  • माइट्स के नियंत्रण हेतु कीटनाशक जैसे कि थायोमिथोक्सेम या इमिडा, 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  • आई.सी.पी.एल. 87119 (आशा), बी.एस.एम.आर.-853, 736 को लगाना चाहिए।

 

  • डॉ. धनंजय कठल
  • डॉ. शैलेन्द्र भलावे
    email : dkathal@gmail.com

www.krishakjagat.org

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