स्मॉग का फैलता खतरा

उत्तरी भारत में अक्टूबर-नवम्बर में स्मॉग से बढ़ती परेशानी लगातार होने वाली घटना बनती जा रही है। राजनैतिक दल इस गंभीर मुद्दे पर एक-दूसरे पर दोषा रोपण और हल्की राजनीति करने का अवसर तलाश रहे हैं, जबकि इस मुद्दे पर करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य, सुरक्षा, और आर्थिकी दांव पर है। यह देखकर अफसोस होता है कि इस मुद्दे को उद्योग बनाम किसान बनाम परिवहन बनाम निर्माण कार्य बनाने की कोशिश हो रही है। यह भी हैरान करने वाला है कि दिल्ली की स्मॉग तो मुद्दा बन रही है, किन्तु असली मुद्दा तो पूरे उत्तरी भारत का धीरे-धीरे स्मॉग की चपेट में आते जाना है। इस खतरे की धमक अब हिमाचल, उत्तराखंड जैसे स्वास्थ्यवर्धक स्थलों तक भी पहुंचने लगी है। हिमाचल के बिलासपुर, मंडी, हमीरपुर, कांगड़ा, और चम्बा जिले भी अब इसकी चपेट में आ गए हैं। इस वर्ष पिछले 20 दिनों से इन क्षेत्रों की सुनहरी धूप और नीला आसमान गायब है। धुंधलका सा फैला है। कांगड़ा हवाई अड्डे में उड़ानों का संचालन भी इससे बाधित हुआ है।
यह समस्या किसी एक वर्ग या राजनैतिक दल की फैलाई हुई तो है नहीं, इसका मूल कारण तो वर्तमान विकास मॉडल है। जिसकी सुविधाओं के तो सभी कायल हैं किन्तु इसके नुकसानों की ओर ध्यान देना नहीं चाहते। जब जान पर बन आई है तो एक-दूसरे पर दोषा रोपण करके अपनी-अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे का प्रयास कर रहे हैं। आखिर इस जहरीली हवा में सांस लेने से कौन बच सकता है। रोजी-रोटी कमाने की मजबूरियां भी हैं किन्तु रोजी-रोटी के चक्कर में हम पूरे देश को गैस चैंबर तो नहीं बना सकते। इसलिए अपनी अपनी कमजोरी को मन से मानकर समाधान की दिशा में काम करना शुरू करें। परिवहन गाडिय़ों का धुआं, उद्योगों का धुआं, पराली जलाने का धुआं, जंगल जलाने का धुआं, खुले में कचरा जलाने, डम्पिंग स्थलों में कचरा जलाने जैसे अनेक कारण इस स्थिति तक पहुंचने के लिए जिम्मेदार हैं। अत: सभी जागे राजनीति त्यागकर सही दिशा तलाशें। अल्पकालीन और दीर्घकालीन योजनाएं एक साथ लागू करना आरंभ करें। परिवहन क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र में धुआंरहित तकनीकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग आरंभ हो। उत्सर्जन नियंत्रण नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। पराली जलाने को इतना बड़ा मुद्दा तो कंबाइन हार्वेस्टरों ने बनाया है। ये आधे बीच से फसलों को काटता है और शेष लम्बे तनों को जलाने का चलन चल पड़ा। प्रकृति का नियम है कि वह जैविक पदार्थों को सड़ा कर खाद बना देती है। किसान इन अध बीच से काटे तनों को जुताई करके जमीन में सड़ाने की विधि निकालें, इसके लिए सरकार हैप्पी सीडर जैसी मशीनों या इससे भी बेहतर मशीनें मुफ्त उपलब्ध करवाकर शुरूआत करवाएं।

 स्मॉग एक तरह का वायु प्रदूषण ही है। यह स्मोक और फॉग से मिलकर बना स्मोकी फॉग, यानी कि धुआं युक्त कोहरा। इस तरह के वायु प्रदूषण में हवा में नाइट्रोजन ऑक्साइड्स, सल्फर ऑक्साइड्स, ओजोन, स्मोक और पार्टिकुलेट्स घुले होते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, फैक्ट्रियों और कोयले, पराली आदि के जलने से निकलने वाला धुआं इस तरह के वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण होता है। इन्हीं खतरों के प्रति आगाह करता प्रस्तुत आलेख। – का.सं.

उत्तराखंड देहरादून में मैंने एक आदमी द्वारा चलाई जाने वाली दरांती जैसी मशीनें देखीं जो तने से फसल काटती हैं। मशीन लगभग 10-12 हजार रुपये की है और छोटे किसानों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। पराली को सीमित मात्रा में पशु चारे के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं। मल्च करने लिए भी प्रयोग कर सकते हैं जिससे फसल में घास भी कम आएगा और जैविक खाद भी बनता रहेगा। इसे बायलरों और ताप बिजली संयंत्रों र्में इंधन के रूप में प्रयोग करके उत्सर्जन बहुत कम किया जा सकता है क्योंकि आधुनिक कुशल प्रज्वलन तकनीकों का प्रयोग करके धुंए और गैसों को संयंत्र में ही जलाया जा सकता है। जहां पुरानी तकनीक के संयंत्र हैं उन्हें आधुनिक तकनीक द्वारा उन्नत बनाया जाना चाहिए।
विभिन्न उद्योगों और ईंट भट्टों में धुआं और गैसों को चिमनी पर ही जला देने वाले आधुनिक उपकरण लगवाए जाने चाहिए। स्वीडन से इस मामले में सीखा जा सकता है। इसी तरह अन्य ठोस कचरा जो खुले में व्यक्तिगत तौर पर या डंपिंग स्थलों में खुले में जलाया जा रहा है, उसे ज्वलनशील कचरे को अलग करके आधुनिकतम तकनीक से ताप बिजली संयंत्रों में जला कर बिजली बना लेनी चाहिए। पुराने ताप बिजली संयंत्रों का आधुनिकीकरण करना चाहिए। बहुत-सा जैविक कचरा एनेरोबिक सडऩ विधि द्वारा सड़ा कर उससे बायो गैस बनाई जा सकती है। गैस से बिजली बना लें या सीधे सिलेंडरों में भरकर उपयोग कर लें। सड़ा हुआ जैविक कचरा बढिय़ा जैविक खाद का काम देता है। परिवहन व्यवस्था वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बन चुकी है। वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है इसे नियंत्रित करना जरूरी है या फिर धुआं रहित इलैक्ट्रिक वाहन, गैस से चलने वाले, सीएनजी से चलने वाले वाहनों को बड़ी मात्रा में प्रोत्साहित करना पड़ेगा। मेडेलिन और रियो जैसे दक्षिण अमरीकी शहरों की तरह शहरों में केबल कार व्यवस्था से भी वाहन संख्या घटाने और जाम से मुक्ति की दिशा में काम करना चाहिए। जाम से निरर्थक ही बहुत वायु प्रदूषण होता रहता है। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सर्व सुलभ और आरामदायक बनाने का काम प्राथमिकता से करना होगा। समस्या को सभी पक्षों से दबोचने से ही सफलता मिलेगी। इसके लिए कृषि, उद्योग, परिवहन, ऊर्जा, स्थानीय निकाय और पंचायती राज मंत्रालयों के संयुक्त प्रयास की जरूरत होगी। इसके लिए तालमेल का स्थाई तंत्र योजना निर्माण से लेकर लागू करने के स्तर तक बनाया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर राजनैतिक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तो हो किन्तु खोखली राजनीति जरा भी नहीं।

 

 

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