अरंडी में रोग नियंत्रण

उकटा रोग (विल्ट) – यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम कवक से होता है। लगभग 43 वर्ष पूर्व राजस्थान के सिरोही जिले में सबसे पहले पाया गया था। आजकल अरंडी उगाये जाने वाले राज्यों में यह रोग पाया जाता है।
नियंत्रण – रोगग्रस्त खेतों में 2-3 वर्षों तक अरंडी की फसल न बोकर रोग की उग्रता को एवं फैलाव को कम किया जा सकता है।

  • बीजों को कार्बेण्डाजिम 2 ग्राम/किलो या थाइरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करके बुवाई करें।
  • मित्र फफूंद ट्राइकोडर्मा विरडी से 10 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें तथा इसी फफूंद का ढाई किलो प्रति हेक्टर एफ.वाई.एम. के साथ मिलाकर बुवाई पूर्व भूमि उपचार करें।
  • रोग रोधी किस्मों की बुवाई करें। सरदार कृषि नगर गुजरात में गीता, एस.के.पी.16, एस.के.पी.23, एस.के.पी. 106, एस.के.पी. 108, एस.के.आई 80, एस.के.आई 225, जे.आई 258, 48-1 सूत्रकृमि-उखटा रोगरोधी पाए गए हैं।
  • फसल चक्र में बाजरा, फिंगर मिलेट, अरहर बुवाई से उकटा रोग में कमी होती है।
खरीफ की फसलों में अरंडी वानस्पतिक औद्योगिक तेल प्रदान करने वाली प्रमुख तिलहनी फसल है। इसके बीज में 45 से 55 प्रतिशत तेल तथा 12 से 16 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा होती है। इसके तेल में प्रचुर मात्रा में (93 प्रतिशत) रिसिनीलिक नामक वसा अम्ल पाया जाता है जिसके कारण इसका औद्योगिक महत्व अधिक है। भारत में कुल उत्पादन का एक बड़ा भाग हर वर्ष विदेशों में निर्यात किया जाता है। इसकी खेती आंध्रप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा तथा पंजाब व हरियाणा के शुष्क भागों में बहुतायत से की जाती है। अरंडी की फसल में कई रोग लग जाते हैं जिससे पैदावार पर भारी प्रभाव पड़ता है। अरंडी में लगने वाले मुख्य रोग:-

जड़ गलन (रूट रॉट) –
नियंत्रण- रोगग्रस्त खेतों में अरंडी की फसल न लें।

  • जहां ज्वार में जड़ सडऩ का प्रकोप हुआ हो तो उसमें अगले वर्ष अरंडी न लगायें।
  • बुवाई पूर्व बीजों को कार्बेण्डाजिम या थाइरम से उपचारित करें।
  • अरंडी की किस्में जी.सी. एच-4, जी.सी. एच-5, जी.सी.एच.-6, जे.आई.-102 की बुवाई करें, इनमें रोग अपेक्षाकृत कम लगता है।

फाइटोप्थोरा अंगमारी (सीडलिंग ब्लाईट)– यह बहुत ही विनाशकारी रोग है। इस रोग की उग्रता नीचे वाले खेतों तथा जिन खेतों में पानी का निकास न हो वहां अत्यधिक होता है। तथा 30 से 40 प्रतिशत तक फसल नष्ट हो जाती है।
नियंत्रण- इस रोग की रोकथाम का प्रमुख उपाय अच्छी जल निकास की व्यवस्था वाले खेतों का चुनाव करें।

  • रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों तथा मलबे को खेत से निकालकर जला दें तथा खेत की सफाई रखें।
  • रोग के लक्षण बीज पत्र तथा पत्तियों पर दिखाई देते ही मेन्कोजेब 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। जरूरत पड़े तो 15 दिन बाद दोहरायें।
  • रोगरोधी किस्में उगाएं, टी.एम.बी.-3, टाइप-9, झांसी सलेेक्शन, एच.सी. 6 और पंजाब नं.-1 किस्में रोग रोधी क्षमता वाली है।

आल्टरनेरिया अंगमारी एवं पत्ती धब्बा रोग-यह रोग आल्टरनेरिया रिसीनाई कवक से होता है। फसल में फूल आने के समय लगता है तो पुष्प कलियां मर जाती हैं तथा फूलों के गुच्छे काले पड़ जाते हैं और फूल नष्ट हो जाते हैं।
नियंत्रण – खेतों के रोगीले अवशेषों को नष्ट कर दें।

  • रोग रहित बीजों को बोने के काम में लें तथा थाइरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करके बोएं।
  • रोग के लक्षण दिखाई देते ही मेन्कोजेब 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।
  • खेतों के आसपास अरंडी की जंगली जातियां न पनपने दें।

छाछिया रोग (पाऊडरी मिल्डयू) – यह रोग ऐरिसाइफी सिकोरेसिएरम तथा ‘लेवीलूला टोरिका’ नामक फफूंदों से होता है।
नियंत्रण – अरंडी में छाछिया रोग की रोकथाम के लिये सल्फेक्स 0.3 प्रतिशत या केराथेन 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव रोग के लक्षण दिखाई देते ही करें।
जीवाणु पर्णदाग या अंगमारी (बेक्टीरियल ब्लाइट) – यह रोग जेन्थोमोनास रिसीनोकोला नामक जीवाणु से होता है।
नियंत्रण – रोग रहित बीजों का प्रयोग करें।

  • खेत में पड़े संक्रमित पौधों के रोगी अवशेषों को नष्ट कर देें।
  • रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही स्ट्रेप्टोसाइक्लिन का एक ग्राम प्रति 18 लीटर पानी में या पौसायाइसीन 0.025 प्रतिशत और कॉपर आक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

टहनी अंगमारी (ट्विंग ब्लाईट) – यह रोग ‘कोलेटोट्राइकम ग्लोइस्पोरी आइडीज’ कवक से होता है।
नियंत्रण – टहनी अंगमारी की रोकथाम के लिये ऊपर बताए फाइटोप्थोरा अंगमारी रोग की तरह ही विधि अपनायें।
बीट्राइटिस ग्रे रोट- यह रोग बोट््राइटिस नामक कवक से होता है। अधिक नमी या वर्षा वाले क्षेत्रों में पुष्प क्रमों तथा केप्स्यूल पर रोग लक्षण दिखते हैं। रोग से प्रभावित केप्स्यूल सड़ जाते हैं।
नियंत्रण – रोगी पौधों के पुष्पक्रमों तथा केप्स्यूल को नष्ट कर देेें।

  • फसल पर कार्बेण्डाजिम 0.1 प्रतिशत या थायोफिनेट 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव तूफानी बरसात की आशंका से पहले ही कर देें।

 

वैज्ञानिकों ने किया मक्का फसल का निरीक्षण

बैतूल। गतदिनों कृषि विज्ञान केन्द्र के पौध संरक्षण वैज्ञानिक सर्वश्री आर.डी. बारपेटे, उपसंचालक कृषि के.एस. खपेडिय़ा एवं सहायक संचालक कृषि डॉ. रामवीर सिंह ने बैतूल विकासखंड में गोराखार, कोलगांव, बडोरी क्षेत्र में खरीफ फसलों का निरीक्षण किया। निरीक्षण में मक्का फसल में जीवाणुजन्य तना सडऩ रोग एवं झुलसा रोग आरंभिक अवस्था में देखा गया। लगातार उच्च तापमान एवं उच्च आर्द्रता बनी रहना साथ ही नत्रजनयुक्त उर्वरक यूरिया का अधिक मात्रा में प्रयोग इन रोगों को बढ़ाता है। तना सडऩ रोग में लगभग एक फीट की ऊंचाई से तना पिलपिला होकर सड़कर गिर जाता है एवं सडऩे के कारण बदबू फैलती है। झुलसा रोग में पर्णवृन्त एवं पत्तियां अचानक सूखने लगती हैं।
प्रबंधन-

  • नत्रजनयुक्त उर्वरक (यूरिया) का संतुलित एवं संयमित प्रयोग करें। टाप ड्रेसिंग के रूप में अधिकतम 75 कि.ग्रा. यूरिया प्रति एकड़ की अनुशंसा है। इस मात्रा को भी कम से कम दो भागों में बांटकर दें।
  • रोगग्रस्त पौधों को खेत से बाहर करें।
  • ताम्रयुक्त कवकनाशी 3.5 ग्राम एवं 3 ग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लिन प्रति टंकी (15 लीटर) की दर से छिड़काव करें।
  • डॉ. तखत सिंह राजपुरोहित

www.krishakjagat.org

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