गेहूं की विभिन्न किस्में और बुवाई का तरीका

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विश्व के कुल कृषि योग्य भूमि के छठे भाग पर गेहूं की खेती होती है। जिसकी हमारे देश एवं मध्य प्रदेश में एक मुख्य अनाज वाली फसल है। हमारे देश मे गेहूं कि खेती लगभग 29.7 मि.हे. पर की जाकर 93.5 मि. टन उत्पादन लिया जाता है। भारत में गेहूं की वर्तमान उत्पादकता 31.5 क्ंिव/हे. है। यह प्रदेश की फसल प्रणाली तथा जनसंख्या के भोजन का एक मुख्य घटक है। मध्य प्रदेश में इसकी खेती 5.3 मि.हे. तथा उत्पादन 13.3 मि.टन पर की जाती है मध्य प्रदेश 25.0 क्विंटल /हे. की उत्पादकता के साथ देश के कुल गेहूं के क्षेत्रफल में 18 प्रतिशत तथा उत्पादन मे 14 प्रतिशत का भागीदार है । गेहूं की खेती विश्व के प्राय: दो मौसम यानी शीत एवं बसंत ऋतुओं में की जाती है। शीतकालीन गेहूं की खेती सामान्यत: ठण्डे देशों जैसे यूरोप, अमेरीका, आस्ट्रेलिया तथा रूस राज्य संघ आदि में उगाया जाता है जबकि बसंतकालीन गेहूं की खेती एशिया और संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में की जाती है। गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए गेहूं को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है; मृदु गेहूं एवं कठोर गेहूं। ट्रिटीकम एस्टीवम एक मृदु गेहूं है और ट्रिटीकम ड्यूरम कठोर गेहूं होता है। भारत में मुख्यत: ट्रिटीकम की तीन प्रजातियां जैसे एस्टीवम, ड्यूरम तथा डाइकोकम की खेती की जाती है।

गेहूं विश्वभर में भोजन के लिए उगाई जाने वाली फसलों में मक्का के बाद दूसरी फसल है। यह विश्वव्यापी फसल लाखों लोगों का मुख्य भोजन है। गेहूं के दानों को पीसकर प्राप्त हुआ आटा रोटी, डबल रोटी, कुकिज, केक, दलिया, पास्ता, नूडल्स आदी कई पकवान बनाने में प्रयोग होता है। विश्व के कुल कृषि योग्य भूमि के छठे भाग पर गेहूं की खेती होती है। जिसकी हमारे देश एवं मध्य प्रदेश में एक मुख्य अनाज वाली फसल है । भारत में ट्रिटीकम एस्टीवम कि खेती देश के सभी क्षेत्रों में की जाती है जबकि ड्यूरम की खेती पंजाब और मध्य भारत में तथा डाइकोकम की खेती कर्नाटक में की जाती है। इसके दानों की सीमित मात्रा पशुओं को अतिरिक्त पोषक आहार के रूप में दी जाती है जबकि इसके भूसे का कई क्षेत्रो में पशुओं आहार के रूप में उपयोग होता है।
प्रदेश में गेहूं उत्पादन में आने वाली समस्याओं पर एक नजर

  • विगत सात वर्षों का तापक्रम औसत विवरण निम्न हैं।
  • निम्न तापक्रम में 2-3 से.ग्रे. की वृद्धि।
  • उच्च तापक्रम में 3-5 डिग्री से.ग्रे. की वृद्धि।
  • नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक तापक्रम में अधिक उतार-चढ़ाव।
  • वास्तविक उच्च ताप प्रतिरोधी किस्मों का अभाव जो बदलते परिवेश में सामंजस्य कर सके।
  • अंकुरण के समय नमी का क्षरण तथा दाना भरते समय उच्च तापक्रम।
  • असिंचित क्षेत्रों में जड़ सडऩ की समस्या।
  • सोयाबीन-गेहूं फसल प्रणाली में असिंचित/ अर्धसिंचित गेहूं की देरी से बोवाई (प्रचलित किस्में लम्बी अवधि की है)।
  • प्रचलित किस्मों की कम ”जल उपयोग” तथा ”पोषक तत्व उपयोग” क्षमता।
  • रबी मौसम में ठण्ड की अवधि कम।
  • अनिश्चित मौसम।
  • कल्ले निकलने के समय तथा परागण के समय तापक्रम में वृद्धि जिससे समय से पूर्व फसल में परिपक्वता आती है परिणामस्वरूप दानों का भराव कम।
  • उच्च तापक्रम के कारण भूमि से वाष्पन अधिक, जिससे सिंचाई की संख्या तथा सिंचाई के पानी की मात्रा में वृद्धि।
  • कमाण्ड क्षेत्रों में भी समय पर सिंचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता।
  • बहु फसल प्रणाली के कारण देरी से बुवाई का अधिक रकबा।

इन प्रजातियों कि भारत में कुल गेहूं के क्षेत्रफल में क्रमश: लगभग 95, 4 एवं 1 प्रतिशत भागीदारी है। ट्रिटीकम एस्टीवम की खेती देश के सभी क्षेत्रों में की जाती है जबकि ड्यूरम की खेती पंजाब और मध्य भारत में तथा डाइकोकम कि खेती कर्नाटक में की जाती हंै।
मध्य प्रदेश में गेहूं की खेती लगभग सभी जिलों में सिंचाई साधनों की उपलब्धता के अनुसार की जाती है। गेहूं की खेती से अधिक से अधिक उत्पादन एवं लाभ कमाने के लिए उन्नत एवं तकनीकी ढंग से खेती करना आवश्यक हैं जिसका विवरण नीचे किया गया है।
खेत का चयन एवं तैयारी
गेहूं की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है फिर भी इसकी अच्छी तैयारी हेतु जल निकास वाली पोषक एवं जैव पदार्थों से युक्त दोमट मृदा उत्तम होती है। मृदा का पीएच मान 6.0 से 8.0 उपयुक्त रहता है। खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके 2-3 बार हैरो चलायें जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जायें। इसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल करें जिससे नमी संचित रहें।

  • ग्रीष्मकालीन जुताई
  • तीन वर्षों में एक बार गहरी जुताई
  • काली मिट्टी को भुरभुरा बनाना कठिन
  • रोटावेटर का प्रयोग उपयुक्त
  • डिस्क हेरो का भी प्रयोग उपयुक्त
    बुवाई का उचित समय
  • असिंचित: मध्य अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक
  • अर्धसिंचित: नवम्बर माह का प्रथम पखवाड़ा
  • सिंचित (समय से): नवम्बर माह का द्वितीय पखवाड़ा
  • सिंचित (देरी से): दिसंबर माह का द्वितीय सप्ताह से
    उन्नत कठिया किस्में
    एच डी 8713 पूसा मंगल, एचआई 8381मालवश्री,एच आई 8498 मालवशक्ति, एच आई 8663 पोषण, एमपीओ 1106 सुधा, एमपीओ 1215, एचडी 4672 मालवरत्न, एचआई 8627 मालव र्कीति
    बीज की मात्रा
  • औसत रूप में 100 कि.ग्रा./हे. (हजार दाने का वजन 40 ग्राम तक है)
  • हजार दाने का वजन 1 ग्राम बढऩे पर (40 ग्राम के ऊपर), 2.5 कि.ग्रा. प्रति/हे. बढ़ाते जायें
  • असिंचित / अर्धसिंचित दशा में कतार से कतार की दूरी 25 से.मी.
  • सिंचित (समय से) बुवाई की स्थिति में 23 से.मी.
  • बीज को उर्वरक के साथ न मिलायें
  • मिलाने पर 32 प्रतिषत अंकुरण की कमी (5 वर्षो के अनुसंधान आंकड़ें)
  • क्योंकि गेहूं की फसल में अनुकूल मौसम होने पर प्रत्येक अवस्था में क्षतिपूर्ति रखने की क्षमता है।
  • अत: बीज कम फर्टिलाइजर ड्रिल का प्रयोग करें।
    बीजोपचार
    बुवाई से पूर्व बीजों को उपचारित कर ही बोयें, बीजोपचार के लिये कार्बोक्सिन 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी. एवं कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी. 2.5-3.0 ग्राम दवा/किलो बीज के लिए पर्याप्त होती है। साथ ही टेबूकोनोजाल 1 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करने पर कण्डवा रोग से बचाव होता है। जैव उर्वरकों मे पीएसबी एवं ऐजेटोबेक्टर कल्चर 5 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करने पर फास्फोरस की उपलब्धता तथा नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है।


संतुलित उवर्रक प्रबंधन
मिट्टी परीक्षण के आधार पर की गयी सिफारिशों के अनुसार ही खाद एवं उर्वरकों की मात्रा सुनिश्चित की जानी चाहिए। अच्छी फसल के लिये 5 टन अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टर की दर से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिला देनी चाहिए। प्रदेश में लगभग सभी जिलों में सूक्ष्म तत्वों की कमी है इसलिए 25 कि.ग्रा./हे. की दर से जिंक सल्फेट का प्रयोग प्रत्येक 3 फसल के उपरांत (न की प्रत्येक वर्ष) करना चाहिए। गेहूं की सामान्य उर्वरक मांग नीचे दी गई है।

अवस्था नत्रजन (किग्रा/हे.) फास्फोरस (किग्रा/हे.) पोटाश (किग्रा/हे.)
असिंचित 40 20 0
अर्धसिंचित 60 30 15
सिंचित 120 60 30
देरी से 80 40 20

  •   किस्मों का चयन
    किस्म   अवधि (दिन) उपज क्विं./हे. विशेष गुण
    जेडब्ल्यू 1201 118-122 51-55 काला गेरूआ रोधी
    जेडब्ल्यू 3269 120-130 42-45 सूखा एवं काला गेरूआ के प्रती सहिष्णु
    जेडब्ल्यू 3288 115-125 45-47 बारानी खेती के लिए अनुशंसित
    एचआई 1531 110-120 25-27 कम अवधि तना गेरूआ के प्रति रोगरोधी
    एचआई 1500 126 -134 15-20 तना एवं काले गेरूआ के प्रति रोगरोधी एवं कम सिंचाई के लिए अनुशंसित
    डब्ल्यूएच 1142 130-140 45 -50 अधिक पोषक तत्व एवं पीला गेरूआ के प्रतिरोग रोधी
    डब्ल्यूएच 1105 142-145 55-60 मुख्य रोगों के प्रतिरोग रोधी
    जेडब्ल्यू 322 126 -134 41-45 तना एवं पीला गेरूआ के प्रतिरोग रोधी
    लोक वन 105-110 37-40 कम अवधि

    सिंचाई प्रबंधन
    गेहूं की खेती में सिंचाई प्रबंधन का विशेष महत्व है। जहां तक सम्भव हो स्प्रिंकलर का उपयोग करें । पुरानी किस्मों में 5 – 6 सिंचाई की आवश्यकता होती थी जबकि जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय से विकसित नयी किस्मों में 3 – 4 सिंचाईयां ही पर्याप्त होती हैं। तथा इन किस्मों से 55 – 60 क्ंिव/हे. कि उपज प्राप्त की जा सकती है। सिंचाईयों की संख्या सीमित होने पर निम्न अवस्थाओं पर देना चाहिए।

  • एक सिंचाई: 40 – 45 दिनों बाद
  • दो सिंचाई: किरीट अवस्था, फूल निकलने के बाद
  • तीन सिंचाई: किरीट अवस्था, पूरे कल्ले निकलने पर, दाना बनने के समय
  • चार सिंचाई: किरीट अवस्था, पूरे कल्ले निकलने पर, फूल आने पर, दूधिया अवस्था
    अधिक उत्पादन के लिए विभिन्न तकनीक
    जीरो टीलेज तकनीक
    धान की पिछेती फसल की कटाई के उपरांत खेत में समय पर गेहूं की बोनी के लिये समय नहीं बचता और खेत, खाली छोडऩे के अलावा किसान के पास विकल्प नहीं बचता ऐसी दशा में एक विशेष प्रकार से बनायी गयी बीज एवं खाद ड्रिल मशीन से गेहूूं की बुवाई की जा सकती है।
    जिसमें खेत में जुताई की आवश्यकता नहीं पड़ती धान की कटाई के उपरांत बिना जुताई किए मशीन द्वारा गेहूं की सीधी बुवाई करने की विधि को जीरो टिलेज कहा जाता है। इस विधि को अपनाकर गेहूं की बुवाई देर से होने पर होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है एवं खेत को तैयारी पर होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकता है।
    इस तकनीक को चिकनी मिट्टी के अलावा सभी प्रकार की भूमियों में किया जा सकता है। जीरो टिलेज मशीन साधारण सीड ड्रिल की तरह ही है इसमें टाइन चाकू की तरह है यह टाइन्स मिट्टी में नाली जैसी आकार की दरार बनाता है जिससे खाद एवं बीज उचित मात्रा एवं गहराई पर पहँुचता है। इस विधि के निम्न लाभ हैं:-
    जीरो टीलेज तकनीक के लाभ
  • इस मशीन द्वारा बुवाई करने से 85-90 प्रतिशर्त ईंधन, ऊर्जा एवं समय की बचत की जा सकती है।
  • इस विधि को अपनाने से खरपतवारों का जमाव कम होता है।
  • इस मशीन के द्वारा 1-1.5 एकड़ भूमि की बुवाई 1 घंटे में की जा सकती हैं यह कम ऊर्जा की खपत तकनीक है अत: समय से बुवाई की दशा में इससे खेत तैयार करने की लागत 2000-2500 रू. प्रति हेक्टर की बचत होती है।
  • समय से बुवाई एवं 10-15 दिन खेत की तैयारी के समय को बचा कर बुवाई करने से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।
  • बुवाई शुरू करने से पहले मशीन का अंशशोधन कर ले जिससे खाद एवं बीज की उचित मात्रा डाली जा सके।
  • इस मशीन में सिर्फ दानेदार खाद का ही प्रयोग करें जिससे पाइपों में अवरोध उत्पन्न न हो।
  • मशीन के पीछे पाटा कभी न लगाएँ।
    फरो इरीगेशन रेज्ड बेड पर बुआई तकनीक –
    मेड़ पर बुवाई तकनीक किसानों में प्रचलित कतार में बोनी या छिड़ककर बोनी से सर्वथा भिन्न है इस तकनीक में गेहूं को ट्रैक्टर चलित रोजर कम ड्रिल से मेड़ों पर दो या तीन कतारों में बीज बोते है। इस तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाला अधिक बीज उत्पादन किया जा सकता है। बीज एवं उर्वरक में महंगे आदान इन्हें कम करने के लिये मेड़ – नाली पद्धति अपनाकर बीज दर को 30 – 35 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है इस तकनीक से उर्वरक की खपत में कमी, नींदा नियंत्रण आसान तथा सिंचाई में पानी की कम मात्रा होने पर भी अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।
    मेड़ पर बुआई तकनीक के लाभ
  • बीज, खाद एवं पानी की मात्रा में कमी एवं बचत, मेड़ों में संरक्षित नमी लम्बे समय तक फसल को उपलब्ध रहती है एवं पौधों का विकास अच्छा होता है।
  • गेहूं उत्पादन लागत में कमी।
  • गेहूं की खेती नालियों एवं मेड़ पर की जाती इससे फसल गिरने की समस्या नहीं होती। मेड पर फसल होने से जड़ों की वृद्धि अच्छी होती है एवं जड़ें गहराई से नमी एवं पोषक तत्व अवशोषित करते हैं।
  • इस विधि से गेहूं उत्पादन में नालियों का प्रयोग सिंचाई के लिये किया जाता है यही नालियाँ अतिरिक्त पानी की निकासी में भी सहायक होती हैं।
  • मशीनों द्वारा निंदाई गुड़ाई भी की जा सकती है। तथा अवांछित पौधों को निकालने में आसानी रहती है।

म.प्र.में उत्पादित होने वाले गेहूं की विशेषता

  • म.प्र. का गेहूं देश में गुणवत्ता में सर्वश्रेष्ठ
  • दानों की चमक तथा दानों का वजन अधिक।
  • दूसरे राज्यों की तुलना में प्रोटीन की मात्रा 1 प्रतिशत अधिक।
  • अभी तक प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने का प्रयास किया गया।
  • वर्तमान में विकसित किस्में सूक्ष्म तत्वों से भरपूर है।
  • वर्तमान में विकसित किस्में जे.डब्ल्यू. 1202 एवं जे.डब्ल्यू. 1203 में देश में विकसित अन्य किस्मों की अपेक्षा सबसे अधिक प्रोटीन
  • वर्तमान में विश्वविद्यालय विकसित किस्मों में सबसे अधिक ”विटामिन ए” सबसे अधिक लोहा, जिंक तथा मैग्नीज
  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जे.डब्ल्यू. 1142, जे.डव्ल्यू. 1201, जे.डब्ल्यू. 3211 एवं जे.डब्ल्यू. 3288 किस्में विकसित की गई उच्च ताप पर भी अधिक उत्पादन देने की क्षमता।
  • सुनील चौधरी
  • सतबीर सिंह
    जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर
    चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि वि.वि. हिसार, हरियाणा
    email : schoudhary612@gmail.lcom
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