किसान आंदोलन से डिजिटल का डमरू थमा 1 जून से नहीं हुआ उर्वरक वितरण डीबीटी पर

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(विशेष प्रतिनिधि)
भोपाल। उग्र हुए किसान आंदोलन की आंच में तपी सरकार फूंक-फूंक कर छाछ पी रही है। आत्ममुग्ध शिवराज सरकार प्रशासन के हर मामले के डिजिटलीकरण के प्रयास में बैकफुट पर आ रही है। 1 जून से उर्वरक वितरण में डीबीटी (डायरेक्ट बेनीफिट ट्रान्सफर) योजना लागू होने का डमरू खूब जोर-शोर से बजा परन्तु उग्र किसानों की आवाज में डीबीटी के डमरू की आवाज दब गई। अब इस योजना के लागू होने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। उर्वरक वितरण में लगी सहकारी संस्थाएं, उर्वरक कम्पनियां, विक्रेता सभी असमंजस में हैं कि किस व्यवस्था के तहत उर्वरक वितरण किया जाये।
उर्वरक वितरण से जुड़े सूत्र बताते हैं कि 1 जून से डीबीटी व्यवस्था प्रारंभ करने के पूर्व की प्रक्रिया ही में कई व्यवहारिक समस्याएं रहीं जिन्हें दूर करने में शासन स्तर पर कोई रुचि नहीं दिखाई गई। इनमें मुख्य रूप से सहकारी संस्थाओं में पीओएस मशीन के प्रशिक्षण के प्रति उदासीनता, संचालन के लिए स्टॉफ की कमी, पीओएस मशीनों की समय पर सप्लाई नहीं होना जैसी समस्याएं रहीं। अभी भी कई जिलों में पीओएस मशीनें उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।
इन अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ी डीबीटी योजना के ताबूत में अंतिम कील किसान आंदोलन ने ठोंक दी। सहकारी संस्थाओं के कर्मचारी तो यह सोचने लगे कि किसान से अंगूठा लगवाने में कहीं सिर न फूट जाये।
बहरहाल अभी तो केन्द्र और राज्य सरकारें किसानों के देशव्यापी संगठित आंदोलनों से भयभीत होकर अपनी नीतियों पर मौन साधे बैठी है और लगी आग बुझाने के लिए अटकल पच्चू निर्णय ले रही है।

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