फसलों का दुश्मन कामलिया कीट

इस समय कामलिया कीट का प्रकोप बढ़ता जा रहा है यह कीट जब फसल दो से तीन पत्ती की हो जाती है तब इसका अधिक प्रकोप होता है तथा इनका प्रकोप पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक देखा गया है। इस कीट के बारे में विस्तृत जानकारी निम्न है-

पोषक पौधे – यह सर्वभक्षी कीट है जो प्राय: सोयाबीन, अरण्डी, तिल, मूंग, उड़द, अलसी, सरसों तथा कुछ सब्जियों वाली फसलों को अधिक नुकसान पहुंचाता है।
विवरण – यह कीट भारतवर्ष में बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा पंजाब में अधिकता से पाया जाता है।
क्षति एवं महत्व – इस कीट की केवल सुंडी ही हानि पहुंचाती है प्रौढ़ कीट क्षति नहीं करते, केवल संतति बढ़ाने में सहायक होते हैैं। सुंडी के काटने तथा चबाने वाले मुखांग होते हैं। यह पौंधे के कोमल भागों विशेषकर पत्तियोंं को खाते है। नवजात सुंडियां झुण्ड में पत्तियों की सतह को खाती है। जिससे उनकी हरी पर्त समाप्त हो जाती है तथा केवल शिरायें ही दिखाई पड़ती हैं। 5 या 6 दिन बाद जब सुंडियां कुछ बड़ी हो जाती हैं तो ये अलग-अलग पत्तियों पर फैल जाती है तथा पूरी की पूरी पत्तियों को खा जाती है। जिससे पौधों में केवल डंठल ही शेष रह जाते हैं। इनके प्रकोप पर जलवायु तथा मौसम का बड़ा प्रभाव पड़ता है। सभी कुछ अनुकूल होने पर इनके द्वारा अत्यधिक क्षति होती है तथा पूरी की पूरी फसल चौपट हो जाती है । प्राय: ऐसा देखा गया है कि हल्की भूमि और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इनसे पूरी फसल चौपट हो जाती है।
जीवन चक्र
इसके जीवन चक्र में चार अवस्थाएं अण्डा, सुंडी, कृमिकोष तथा प्रौढ़ मिलती है।
अण्डा- बरसात के प्रारम्भ होते ही इस कीट के प्रौढ़ बड़ी संख्या में दिखलाई पड़ते हैं ये वास्तव में शीत निष्क्रियता तथा ग्रीष्म निष्क्रियता कर रहे कृमिकोषों से निकलने के बाद ही ये मैथुन करते हैं तथा मादा कीट फसलों, जंगली घासों, खरपतवारों आदि की पत्तियों की निचले सतह पर अण्डे देते हैं। मादा प्राय: अण्डे 50-100 तक के झुण्डों में देती है। एक मादा अपने जीवनकाल में लगभग 1000 अण्डे देती है। इसके अण्डे पोस्ता के बीजों जैसे दिखलाई पड़ते हैं। ये अण्डे 4-5 दिनों में पककर फटते है।
सुंडी- अण्डों से निकलने के पश्चात ही सुंडियां प्रारम्भ में तथा बाद में इधर- उधर फैल कर पत्तियां खाती हैं। इस समय यह 10-15 मी.मी. लम्बी होती है। तथा शरीर पर बाल होते है। पूर्ण विकसित गिडार प्राय: 6 बार त्वचा निर्मोचन करने के पश्चात 40-50 मी. लम्बी हो जाती है जिसका सम्पूर्ण शरीर लम्बे-लम्बे, घने, भूरे रंग के बालों से ढका रहता है। इसको पूर्ण विकसित होने में उचित वातावरण मिलने पर 15 से 20 दिन का समय लगता है। इसके पश्चात यह कोषावस्था में बदलती है।
कृमिकोष – पूर्ण विकसित सुंडी जमीन के अन्दर अथवा भूमि पर पड़ी हुई सूखी पत्तियों के नीचे कोषावस्था में बदलती है। कृमिकोष का रंग गहरा भूरा होता है तथा लम्बाई लगभग 20 मि.मी. होती है।
प्रौढ़– इस कीट के प्रौढ़ पीताम्भरी रंग के मध्यम आकार वाले होते हैं इनके पंखों तथा शरीर के पिछले खण्डों पर काले रंग के धब्बे होते हंै।
नियंत्रित करने के लिए निम्न उपाय है –

  • कृषक भाई इस कीट कीे प्यूपा अवस्था में पेड़ों के नजदीक गड्ढे खोद कर इन प्यूपा को एकत्रित कर नष्ट किया जा सकता है।
  • कीट की वयस्क अवस्था में इसे नियंत्रित करने के लिए प्रकाश प्रपंच का प्रयोग किया जाता है।
  • इसकी लार्वा अवस्था को नष्ट करने के लिए क्विनालफॉस 1.5 लीटर/हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें।
  • इल्ली के नियंत्रण हेतु इन्डॉक्साकार्ब 14.5 एस. सी. 400 मि.ली./हे. या लेमडा सायहेलोथ्रिन 4.9 ई.सी. 750 मि.ली./हे. 500 ली. पानी में चिपको के साथ घोलकर छिडकाव करें।
  • संभव हो तो खेत के आस-पास 1 फिट गहरी नाली खोदें।

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