फसल की खेती (Crop Cultivation)

खरीफ में अरहर की जबरदस्त पैदावार के लिए अपनाएं ये पूसा तकनीकें

13 जुलाई 2025, नई दिल्ली: खरीफ में अरहर की जबरदस्त पैदावार के लिए अपनाएं ये पूसा तकनीकें – दलहनी फसलों में अरहर का विशेष स्थान है। यह न केवल प्रोटीन का भंडार है, बल्कि वायुमंडल में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता को भी बढ़ाती है। ग्रीष्मकालीन अरहर की खेती में अच्छी उपज के लिए समसामयिक कृषि कार्यों की सही जानकारी और समय पर अमल जरूरी है। पूसा संस्थान के विशेषज्ञों ने अरहर की उन्नत किस्मों और उनकी उत्पादन तकनीकों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जो किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है। आइए, जानते हैं कि अरहर की खेती को कैसे और बेहतर बनाया जा सकता है।

बीज उपचार और खेत की तैयारी

खेती की शुरुआत बीज उपचार से होती है। बुवाई से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम और बाविस्टिन (1 ग्राम + 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से उपचारित करना चाहिए। इसके बाद राइजोबियम से भी बीज उपचार करें, ताकि पौधों को नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़े। खेत की तैयारी के लिए पहले डिस्क प्लाव से जुताई करें, फिर कल्टीवेटर और पाटा लगाकर खेत को समतल करें। समतल खेत जल निकास के लिए जरूरी है, खासकर खरीफ मौसम में। बेसल उर्वरक के रूप में नाइट्रोजन 20 किग्रा, फास्फोरस 40 किग्रा, पोटाश 20 किग्रा, जिंक सल्फेट 20 किग्रा और आवश्यकतानुसार जिप्सम 20 किग्रा प्रति हेक्टेयर डालें। डीएपी 100 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से भी उपयोग किया जा सकता है।

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बुवाई की तकनीक

अरहर की बुवाई हमेशा कतारों में और मेड़ (रिज) पर करनी चाहिए, क्योंकि यह खरीफ की फसल है और मेड़ पर बुवाई से जलभराव की समस्या से बचा जा सकता है। पूसा संस्थान की उन्नत किस्मों के लिए कतारों और पौधों के बीच की दूरी अलग-अलग है। पूसा अरहर 16 के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेमी रखें। वहीं, पूसा अरहर 2017-1, पूसा अरहर 2018-2 और पूसा अरहर 2018-4 के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेमी रखें। सही दूरी से पौधों को पर्याप्त स्थान और पोषण मिलता है, जिससे उपज बढ़ती है।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार फसल की बढ़त को प्रभावित करते हैं, इसलिए इनका समय पर नियंत्रण जरूरी है। बुवाई के तुरंत बाद पेंडामेथालिन (0.75 किग्रा प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करें। 20-25 दिनों बाद इमेजेथापायर (100 ग्राम प्रति हेक्टेयर) या क्विज़ालोफॉप इथाइल (100 ग्राम प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करें। यदि खरपतवार कम हों, तो 14-15 दिनों बाद कस्सी या खुरपी से निराई-गुड़ाई कर सकते हैं। इससे रासायनिक खरपतवारनाशकों की आवश्यकता कम हो सकती है। इसके अलावा, ट्रैक्टर या ड्रोन उपकरणों से अंतर-संवर्धन (इंटरकल्चर) करने से फसल की बढ़त में सुधार होता है।

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कीट प्रबंधन: समय पर सावधानी

अरहर की फसल में कीट प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण है, खासकर कली बनने की अवस्था में। इस समय मारुका विट्राटा (फली छेदक) नामक कीट का प्रकोप हो सकता है। जब कली हरी से सफेद होने लगे और पत्तियों पर ग्रे रंग के बिंदु जैसे अंडे या मुड़ी हुई पत्तियों में छोटी इल्लियां दिखें, तो तुरंत क्लोरनट्रानीलीप्रोल (0.5 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। फूल खिलने पर ब्लिस्टर बीटल फूलों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके लिए डेल्टामेथ्रिन (1 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव सुबह या शाम के समय करें। यदि पहला छिड़काव प्रभावी रहा हो, तो तीसरे छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अगर मारुका की इल्लियां फिर दिखें, तो क्लोरनट्रानीलीप्रोल का छिड़काव दोहराएं।

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फलियां बनने पर पॉड बग (फली का कीड़ा) दानों का रस चूसकर उपज को नुकसान पहुंचाता है। यदि पौधों पर सफेद छींटे दिखें, तो डेल्टामेथ्रिन (1 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। कीट नियंत्रण में कली वाली अवस्था में पहला छिड़काव सबसे महत्वपूर्ण है। यदि कीट दिखाई न दें, तो छिड़काव की जरूरत नहीं है।

पूसा की उन्नत किस्में और कटाई

पूसा संस्थान ने अरहर की कई उन्नत किस्में विकसित की हैं, जो अलग-अलग अवधि में पकती हैं। पूसा अरहर 16 (120 दिन), पूसा अरहर 2017-1 (124 दिन), पूसा अरहर 2018-2 (132 दिन) और पूसा अरहर 2018-4 (135-140 दिन) में पकती हैं। मध्य प्रदेश के लिए पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ (पूसा अरहर 22-1, 132 दिन, 84 सेमी ऊंचाई), पूसा अरहर 22-2 (115 दिन, 110-115 सेमी ऊंचाई) और पूसा अरहर 21-29 (135-140 दिन, मोटे दाने) रिलीज की गई हैं। पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ कंबाइन हार्वेस्टिंग के लिए उपयुक्त है, जिससे श्रम लागत कम होती है। जब 80-85% फलियां पक जाएं, तो कटाई करें। कटाई से 7-8 दिन पहले सिंचाई करें, ताकि खेत रबी फसलों के लिए तैयार हो सके। कटाई के बाद फसल को बंडलों में बांधकर सीधा खड़ा करें, ताकि सूखने में आसानी हो और बारिश से बचाव हो।

रबी फसलों के लिए अवसर

पूसा की इन किस्मों के बाद किसान सरसों, आलू, चना या गेहूं की फसल ले सकते हैं। पूसा अरहर 16 और 2017-1 के बाद सरसों, आलू, चना और गेहूं, पूसा अरहर 2018-2 के बाद चना और गेहूं, और पूसा अरहर 2018-4 के बाद गेहूं की खेती संभव है। कटाई के बाद खेत को डिस्क प्लाव, हैरो और कल्टीवेटर से तैयार कर रबी फसलों की बुवाई समय पर करें।

पूसा संस्थान ने अरहर हाइब्रिड 5 (पूसा अरहर यमुना) भी विकसित किया है, जो जल्द ही किसानों के लिए उपलब्ध होगा। ये उन्नत किस्में और तकनीकें किसानों को बेहतर उपज और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करेंगी। समय पर सही कदम उठाकर और पूसा संस्थान की सलाह मानकर किसान ग्रीष्मकालीन अरहर की खेती में शानदार सफलता हासिल कर सकते हैं।

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