गौपशुओं का आवास

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गौपशु आवास:
पशुशाला – आसपास की जमीन से ऊंचे स्थान पर बनाना चाहिये जिससे पशुशाला से पानी, पेशाब इत्यादि नाली से आसानी से बाहर जा सके तथा पशुशाला सूखी तथा साफ रह सकें।
हवा तथा रोशनी – गोपशु का आवास का सूर्य की किरणों के प्रवेश के लिये उत्तर दिशा में ज्यादा तथा पश्चिम दिशा में कम खुला होना चाहिये तथा साथ-साथ तेज हवाओं से बचाव आवश्यक है।
जल उपलब्धता- पशुओं को पीने तथा अन्य कार्यों के लिेय स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना अति आवश्यक है क्योंकि पानी ही जीवन का मूल आधार है।
जल निकासी – आवास के आसपास जमीन रेतीली तथा फर्श में उचित ढलाव होना चाहिये, जिससे जल निकासी आसानी से होकर आवास सूखा तथा स्वच्छ रहें। ऐसी स्थिति में पशु स्वस्थ तथा अच्छी तरह से रह सकताहै। इन सबके अलावा गोपशु आवास के स्थान के चयन के लिये चौबीस घंटे बिजली की आपूर्ति व आधुनिक संचार सुविधाओं का भी ध्यान रखना चाहिये।
पशु आवास की बनावट – आवास का मुख्य उद्देश्य पशुओं को वातावरण की विपरीत परिस्थितियों से बचाकर उनकी उत्पादकता को नियमित रखना होता है। इसीलिए निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
दिशा-निर्धारण – पूर्व – पश्चिम दिशा वाले आवासों को उत्तर – दक्षिण दिशा के मुकाबले अच्छा माना जाता है, जबकि उत्तर-दक्षिण दिशा वाले आवास में अधिक देर तक सूर्य की किरणें आने से सूखे तथा साफ दिखाई देते हैं। पूर्व-पश्चिम दिशा वाले आवासों में, पश्चिम की ठंड में पशु ज्यादा खुले रहते हैं इस तरह के आवासों में ज्यादा समय के लिये छाया रहने के कारण फर्श भी सामान्यतया ठंडा होता है। इस तरह से पशु आवास की स्थिति, पशुओं के तापमान नियंत्रण में सहायक सिद्ध होता है तथा पशुओं को वातावरण की विपरीत परिस्थितियों से बचाता है।
आवास परिवेश – पशु आवासों के आसपास छायादार वृक्ष लगाकर, उस स्थान के तापक्रम को गर्मी में कम किया जा सकता है। तथा पशुओं पर गर्मी के प्रभाव को कम कर सकते हैं। 31.8 डिग्री सेंटीग्रेड वायु तापक्रम पर, पेड़ों के बाहरी सतह पर तापक्रम लगभग वातावरण के तापक्रम के बराबर होता है, जबकि वायुमंडल में उपस्थित धूल के कणों तथा कंकरीट का तापक्रम क्रमश: 60 सेंटीग्रेड व 48 डिग्री सेंटीग्रेड पाया गया है। व्यवहारिक रूप से यह संभव नहीं है कि पशुशाला के चारों तरफ छायादार पेड़ों या घास को उगाया जा सके, इसीलिये ऐसी परिस्थितियों में पशुशाला का फर्श ऐसी सामग्री का बना होना चाहिए। जो कि ऊष्मा को कम अवशोषित करें।
पशु आवास के प्रकार- सभी जलवायुओं व सभी स्थानों के लिये, सभी सुविधाओं से युक्त पशु आवास बना पाना मुश्किल है। क्योंकि देश के विभिन्न स्थानों पर पशुपालन अलग ढंग से किया जाता है। मोटे तौर पर पशु आवास दो तरह के बनाये जाते हैं।
पारम्परिक बाड़ा- इस तरह के आवासों में पशुओं को गले में चैन बांधकर रखा जाता है तथा उसी आवास पर पशु की खिलाई-पिलाई व दूध दुहा जाता है। ये आवास पूरी तरह से छत से ढके होते हैं तथा उचित स्थानों पर हवा के आदान-प्रदान के लिए खिड़किया लगाई जाती हैं।
खुले आवास – ऐसे आवासों में गौपशुओं को पूरे दिन-रात खुला रखा जाता है। ऐसे आवासों में एक किनारे पर ढका आवास होता है जिससे वातावरण को विपरीत परिस्थितियों में (अधिक गर्मी व सर्दी) पशु आराम कर सके। पशु के चारे के लिये खौर व पानी पीने का स्थान सुरक्षित किया जाता है। हमारे देश में जहां पर साल के अधिकतर महीनों में गर्मी का वातावरण रहता है पशु आवास ऐसे होने चाहिये जो कि सौर किरणों से पशुओं का बचाव कर सके। करीब 18 प्रतिशत किरणेंं सूर्य से धरती पर पहुंचती है, तथा लगभग 15 प्रतिशत किरणें वातावरण में विद्यमान कणों, बादलों द्वारा शोषित हो जाती हैं। जब सूर्य से आने वाली किरणों जमीन पर (मिट्टी, पानी और वनस्पति इत्यादि) शोषित होकर इनको गर्मी में बदल देती है। और तापमान में बढ़ोत्तर हो जाती है फिर गर्म-तल गर्मी निकालता है। आवास इस आने वाली गर्मी को रोककर पशुओं को अच्छा वातावरण प्रदान करता है तथा वर्षा, आंधी तूफान इत्यादि से भी बचाता है।
वातावरण के उच्च तापक्रम का विपरीत प्रभाव और ज्यादा बढ़ जाता है जब गर्मी के साथ-साथ वातावरण में आद्र्रता की प्रतिशत मात्रा ज्यादा हो। सामान्यतया पशुओं से अच्छा उत्पादन लेने के लिये वातावरण का तापक्रम 15 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच तथा आद्र्रता लगभग 50 प्रतिशत के आसपास होनी चाहिये। मनुष्य जलवायु की दशाओं को बदल नहीं सकता लेकिन वातावरण की विपरीत परिस्थितियों के प्रभाव को पशु रखरखाव में बदलाव लाकर इसके प्रभाव को कर सकते हैं।
किसान भाई पशुओं को अच्छा आवास प्रदान करके विपरीत मौसम में उत्पादन पर होने वाले विपरीत प्रभाव को कम कर सकते हैं तथा इसके साथ-साथ बीमारियों आदि से भी बचाव कर सकते हैं।

 

हमारे देश में ज्यादातर हिस्सों तथा साल के ज्यादातर महीनों में वातावरण की परिस्थितियों गौपशुओं के उत्पादन के अनुकूल नहीं होती है, क्योंकि वातावरणीय तीव्रता, वर्षा की मात्रा, हवा की गति इत्यादि ऐसे कारक हैं, जो कि गौपशुओं के उत्पादन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। वातावरणीय तापक्रम शून्य के नीचे से लेकर 50 डिग्री सेन्टीग्रेड से ऊपर तक पहुंच जाता है। इन दोनों ही परिस्थितियों में पशु अपनी शारीरिक व आन्तरिक क्रियाओं को नियमित नहीं रख पाते हैं। उत्पादन के लिये पोषण के रूप में दी गयी खुराक उनके तापक्रम को नियमित करने में ही लग जाती है। इन सब बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है। जिससे विपरीत वातावरण की परिस्थितियों में पशु उत्पादन को नियमित रखा जा सके। अच्छा आवास उसी को कहा जा सकता है, जो सस्ता, आरामदायक, साफ तथा जीवाणुरहित हो, जिसमें कार्य करने में दिक्कत न हो तथा जिसमें पशु का उत्पादन बढ़ता हो। गर्मी के मौसम में पेड़ों की छाया पशुओं को सौर प्रकाश द्वारा उत्पन्न बाह्य गर्मी से बचाने के लिये एक आदर्श प्राकृतिक साधन है।

 

लाभ :
  • कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है।
  • बीमारी का आसानी से पता लग सकता है और उनको रोका जा सकता है।
  • पशु आपस में लड़ाई नहीं कर सकते।
  • अलग – अलग खिलाई -पिलाई संभव है।
  • शरारती पशुओं से दूसरे पशुओं को खतरा नहीं रहता है।

 

खुले आवास के लाभ
  • बनाने का खर्च दूसरों की अपेक्षा कम।
  • जब भी चाहे बड़ा कर सकते हैं। पशुओं की संख्या बढ़ाने में आसानी होती है।
  • प्रबंध आसानी से किया जा सकता है।
  • आग आदि लग जाने पर पशुओं के जीवन को खतरा बहुत कम होता है।
  • पशुओं को घूमने की सुविधा फलत: अधिक आराम मिलता है।
  • स्वच्छ वातावरण के कारण उत्तम किस्म का दूध उत्पन्न किया जा सकता है।
  • गौपशुओं के व्यवहार को देखकर पशु के गर्मी में आने का पता आसानी से लगाया जा सकता है।
  • श्रम की बचत भी होती है।

 

  • मनजीत
    email : manjeetpanwar365@gmail.com
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