भण्डारण गृह को हानि पहुंचाने वाले कीटों का नियंत्रण

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भण्डारण के समय उपज का लगभग 30 प्रतिशत भाग (21.13 लाख मिट्रिक टन) खाद्य पदार्थ नष्ट हो जाता है। अन्न को मुख्यत: चूहों, कीटों, माइट्स (अष्टपादी), सूक्ष्म जीवों एवं सीलन द्वारा क्षति होती है। सम्पूर्ण क्षति का अनुमानत: 60 प्रतिशत से अधिक नुकसान केवल कीटों एवं चूहों के द्वारा होता है। अत: देश एवं राज्य की आर्थिक दशा सुधारने तथा खाद्यान्न में आत्मनिर्भर होने के लिये भण्डारण के समय होने वाली क्षति को रोकना अति आवश्यक है।
भण्डार गृह के मुख्य कीट
चावल का घुन/राइस वीविल
इसे सूंड वाली सुरसरी, किल्ला, घनेड़ा आदि भी कहा जाता है। यह कीट मध्य तापक्रम वाले जगहों में पाया जाता है। इसके प्रौढ़ तथा सुंडी (ग्रब) दोनों ही हानिकारक होते हैं परन्तु ग्रब प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक नुकसानदायक होते हैं। मादा कीट दाने में एक छोटा-सा छिद्र बनाकर अंडा रखती है जिसके फूटने के बाद ग्रब उसी के अंदर प्रवेश कर जाता है तथा अंदर के समस्त भाग को खा लेता है। इस प्रकार दाने खोखले हो जाते हैं। तथा वे खाने और बोने योग्य नहीं रह जाते। यह चाँवल के अलावा गेहूँ, धान, मक्का, ज्वार तथा जौ आदि को हानि पहुँचाता है। प्रौढ़ कीट भूरे रंग का लंबा बेलनाकार होता है। इसके सिर के आगे लंबी सूंड (स्नाउट) निकली रहती है।
गेहूँ का खपड़ / खपड़ा बीटल
इसे खपरा, वांतरी या पई भी कहा जाता है। यह उन क्षेत्रों में सामान्य रूप से पाया जाता है जहाँ तापक्रम 32-44 डिग्री सेल्सियस रहता है। इस कीट के सुंडी ही अधिक नुकसान पहुँचाते हैं वयस्क कीट नहीं के बराबर ही नुकसान करते हैं। यह कीट समान्यत: वर्ष भर क्षति पहुँचाते हैं परन्तु अधिक क्षति जुलाई से अक्टूबर के महिने में करते हैं। यह दानों के भ्रूण वाले भागों को खा लेते हैं। इसके साथ ही यह दानों के अंदर प्रवेश नहीं करते इसलिये दाना खोखला नहीं होता एवं कुछ भाग कटा हुआ दिखाई पड़ता है। इस प्रकार दानों की मात्रा में कोई विशेष कमी नहीं होती परन्तु भू्रण वाला भाग खा लेने से बीज के उगने की क्षमता नष्ट हो जाती है। गेंहू के अलावा यह चावल, मक्का, ज्वार तथा जौ आदि को हानि पहुँचाता है। प्रौढ़ कीट सलेटी भूरे रंग का होता है। इसका शरीर अंडाकार सिर छोटा तथा सिकुडऩे वाला होता है।

कठोर परिश्रम के बाद पैदा किए गए खाद्यान्न को सुरक्षित रखना एक महत्वपूर्ण समस्या है। भंडारण के दौरान बीज व अनाज को क्षति पहुंचाने में कीट अहम् भूमिका निभाते हैं। भंडार कीटों की लगभग 50 प्रजातियां हैं जिनमें से करीब आधा दर्जन प्रजातियां ही आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। भंडार कीटों में कुछ कीट आंतरिक प्राथमिक तो कुछ बाह्य (गौड़) भक्षी होते हैं। ऐसे कीट जो स्वयं बीज को सर्वप्रथम क्षति पहुंचाने में सक्षम होते हैं।

सुरसाली / रेड रस्ट फ्लोर बीटल
इसे लाल सुरसाली या लाल सुरी भी कहा जाता है। यह भारत में सर्वत्र पाया जाता है। यह कीट पूर्ण दानों को नुकसान नहीं पहुँचाता, केवल कटे दानों या अन्य कीटों के द्वारा ग्रसित दानों को ही हानि पहुँचाता है। इसकी संख्या अधिक हो जाने के कारण आटा पीला पड़ जाता है तथा उसमें कवक विकसित हो जाते हैं एवं एक विशेष प्रकार की अप्रिय गंध आने लगती है। आटे में जाले बन जाते हैं तथा कीट का मल भी मिल जाता है। इस प्रकार यह आटा खाने योग्य नहीं रहता। कीट प्राय: बरसात के दिनों में अधिक क्षति पहुँचाते हैं। यह कीट आटा, मैदा, सूजी आदि पदार्थों को अधिक हानि पहुँचाते हैं। प्रौढ़ कीट छोटे लाल-भूरे रंग के होते हैं।
लाल सुरही/लेजऱ ग्रैन बोरर
इसे थूथन विहीन सुंडी भी कहा जाता है तथा भारत में लगभग सभी प्रदेशों में मिलता है। इस कीट का प्रकोप मई से अगस्त तक अधिक होता है। इस कीट का सुंडी तथा प्रौढ़ दोनों ही हानि पहुँचाते हैं। प्रौढ़, दानों में टेढ़़े-मेढ़े छेद करके उन्हें खाकर आटे में बदल देते हैं। जिससे केवल भूसी और आटा ही शेष रह जाता है। ये खाते कम तथा नुकसान अधिक पहुँचाते हैं। सुंडी दानों के स्टार्च को खाती है एवं केवल छिलका ही छोड़ती हैं। इस कीट का आक्रमण गेहूँ, चावल, ज्वार, मक्का, चना, आटा आदि में अधिक होता है। प्रौढ़ कीट छोटा, बेलनाकार, गहरे बादामी अथवा काले रंग का खुरदुरे शरीर वाला होता है।

 

दालों का घुन/पल्स बीटल
इसे डोरा, चिरइया, घनुर, घुना आदि भी कहा जाता है तथा भारत में लगभग सभी भागों में पाया जाता है। इस कीट का प्रकोप खेत तथा भण्डार-गृह दोनों जगह ही होता है। इसके प्रौढ़ तथा सुंडी दोनों ही हानिकारक होते हैं परन्तु सुंडी अधिक हानी पहुंचाते हैं। खेतों में इस कीट का प्रकोप फरवरी के महिने से ही जिस समय खेतों में हरी फलियाँ बनती है, शुरू हो जाता है। मादा हरी फलियों के ऊपर अंडे देती हैं। अंडे से निकलने के बाद ग्रब फली में छेद करके अंदर प्रविष्ट करता है। तथा दानों को खा जाता है। दाने के अंदर ग्रब जिस जगह से घुसता है वह बंद हो जाता है तथा दाना अंदर से स्वस्थ दिखाई पड़ता है। इस प्रकार ग्रसित दाने के अंदर ही कीट भण्डार-गृह में पहुँच जाता है। भण्डार-गृह में कीट दरारों व बोरों आदि में छिपा रहता है। जिस समय दालें भण्डार-गृह में रखी जाती है उस समय मादा उनकी सतह पर अंडे देती है। ये अंडे दानों की सतह पर चिपके हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। अंडे से निकलने के बाद ग्रब दानों के अंदर घुस जाते हैं तथा अंदर ही अंदर खाकर पूरा दाना खोखला कर देते हैं। सामान्यत: यह कीट वर्ष भर सक्रिय रहता है परन्तु जुलाई से सितम्बर के महीनों में अधिक क्षति पहुँचाते है। इसके द्वारा होने वाली क्षति अनुमानत: 40 से 50 प्रतिशत तक आँकी गयी है। प्रौढ़ कीट भूरे रंग के होते हैं तथा इसका शरीर आगे नुकीला एवं पीछे की तरफ चौड़ा होता है।
अनाज का पतंगा/अंगुमस ग्रैन मोथ
इसे अन्न व आटे की सूंडी या सुरेरी भी कहा जाता है। यह भारत के सभी भागों में मिलता है। इस कीट की केवल सूँडी ही हानिकारक होती है। सूँडी छोटा सा छेद करके दानों के अंदर घुस जाता है। सामान्यत: एक दाने के अंदर एक ही सूँडी मिलती है यह अंदर ही अंदर दाने को खाकर खोखला कर देती है और केवल छिलका ही शेष रह जाता है। खाये हुए खोखले दाने से जब प्रौढ़ कीट निकलता है तो एक बड़ा गोलाकार छेद बन जाता है जो कि टोपी की तरह दिखाई पड़ता है। बरसात के मौसम में इस कीट का अधिक प्रकोप होता है। गेहूँ, चावल, मक्का, जौ, ज्वार, आटा तथा सूजी आदि इसके पोषक अन्न हैं। इसके द्वारा लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक क्षति होती हैं। प्रौढ़ कीट पीलापन लिये हुए, भूरा चमकदार रंग का होता है।

धान का पतंगा/राइस मोथ
इसे धान का शलभ भी कहा जाता है। यह धान के अलावा ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, मूंगफली, आटा आदि को भी हानि पहुंचाते हैं। इसका सूंडी ही केवल हानिकारक होता है। मादा दानों पर अंडे से निकलने के बाद सूंडी दानों के अंकुर को खा जाते हैं। ये दानों को चारों ओर से रेशमी धागों से बुन देते हैं। धागों का यह जाल वायु प्रवाह में बाधा डालता है जिससे दानों का तापमान बढ़ जाता है एवं उसमें कवक पैदा हो जाता हैं। यह मार्च से नवम्बर तक अधिक नुकसान करते हैं। प्रौढ़ कीट का शरीर पीला-धूसर रंग का होता है। अग्र जोड़ी पंख पीला-धूसर रंग का होता है तथा इसमें काले रंग की धारियां होती है।

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