बीटी कपास लगाएं, उत्पादन में क्रांति लाएं

बोनी की विधियां:-
चौफुली पद्धति:- इस विधि से बोने पर पौधों की संख्या बराबर आती है । दोनों दिशाओं में कोल्पा चलाने में सुविधा होती है । इसमें कतार तथा पौधे से पौधे की दूरी आवश्यकतानुसार रखें ।
संकर कपास का बीज महंगा होने के कारण एक बोनी बिन्दु एक या दो बीज ही बोये जा सकते है। अंकुरण में सहायता पहुंचाने के लिए कपास के बीज के साथ दो या तीन परिचारी बीज (नर्स प्रमोटर बीज जैसे सनई, तुअर, चावल) या देशी कपास को बोयें । यह बीज पहले अंकुरित होकर जमीन की पपड़ी अलग कर देते हैं जिससे संकर कपास का अंकुरण आसानी से होता है खाद के साथ 1 किलो सक्सेनिक एसिड प्रति हेक्टर देने से अंकुरण में वृद्धि होती है ।
शुष्क बोनी:- चौफुली पद्धति में बोनी के स्थानों पर छोटा गड्ढा कर लें, गड्ढे की गहाई 4 से 5 से.मी. तक रखें । बीज को गड्ढे में रखने के पहले खाद उर्वरक एवं मिट्टी का मिश्रण भली-भांति मिला लेना चाहिए । इसके बाद प्रत्येक गड्ढे में तीन से चार बीज रखकर अच्छी तरह मिट्टी से ढक दें।


वर्षा के बाद या सिंचित बोनी:- वर्षा के बाद बोने पर या सिंचित कपास बोने पर, खाद उर्वरक या मिट्टी के मिश्रण को छोटा गड्ढा बनाकर नीचे रखें फिर बीज रखकर अच्छी तरह मिट्टी से ढक दें ।
सरता द्वारा बोनी:- बोने के लिए समय कम हो या मजदूरों के अभाव में सरते द्वारा भी बोनी की जा सकती हैं। इसमें चौफुली पद्धति की अपेक्षा बीज की मात्रा दोगुनी लगती है । पौधों की संख्या बराबर नहीं आती है इसलिए यह पद्धति सुलभ अवश्य है किन्तु अनुमोदित नहीं है ।
कतार छोड़ पद्धति (स्किप कतार बोनी):- गत तीन वर्षो के अनुसंधान से संकेत मिले हैं कि शुष्क खेती में कपास की प्रत्येक दो कतारों के बाद कए कतार खाली छोड़ देते हैं तथा इस छोड़ी गई कतार के पौधों को पहले बोने वाली दो कतारों में आधा-आधा समाविष्ट कर देवें । खंडवा-2, नर्मदा बदनावर-1, जाति की प्रत्येक दो कतारों के बीज 45 से.मी. का अंतर रखें व कतार के अंदर पौधे से पौधे की दूरी 30 से.मी. रखें इस विधि में प्रत्येक दो कतारों की जोडिय़ों के बीच 90 से.मी. का अंतर होगा। कतारों के पूर्व पश्चिम दिशा में बोना अधिक लाभदायक होगा, क्योंकि पौधों को पर्याप्त प्रकाश मिलेगा ।

उन्नत कृषि कार्यमाला
कपास के लिये हल्की मध्यम से भारी काली भूमि उपयुक्त होती है, जो उपजाऊ व अधिक पानी सोखने के साथ पर्याप्त जल निकास वाली हो, क्योंकि पानी के अत्यधिक जमाव कपास के लिये हानिकारक होता है।
भूमि की तैयारी
मिट्टी पलटने वाले हल से दो वर्षो के अंतर से जहां तक संभव हो 8-10 से.मी. से गहरी जुताई नही करना चाहिए। सामान्य वर्षा में देशी हल से एक बार जुताई के बाद पाटा चलाकर वर्षा आरम्भ होने से पहले चार से पांच बार बखरनी करके खेत को समतल बना देना चाहिये। ग्रीष्म कालीन जुताई से खरपतवार नियंत्रण एवं कीट पतंगों के नियंत्रण में काफी सहायता मिलती है।
बुवाई की गहराई
मृदा नमी कम होने पर बुवाई की गहराई व मृदा नमी पर्याप्त होने पर बुवाई कम गहराई पर की जाती है। सामान्य अवस्था में बुवाई की गहराई 5-8 से.मी. रखी जाती है।
बुआई का समय
सिंचित क्षेत्र में पलेवा देकर कपास की बोनी 25 मई से जून के प्रथम सप्ताह तक कर लें।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
सिंचाई की सुविधा         बीज की मात्रा कि.ग्रा./हे.
सिंचित/अद्र्ध सिंचित      2.5-4.0
असिंचित                         3.0-5.0
बीज उपचार
बोने के लिए ग्रेडिंग किया हुआ प्रमाणित बीज लें । बीजोपचार के लिए औद्योगिक गंधक के तेजाब से उपचारित करें। इससे बीज पर के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं एवं अंकुरण शत-प्रतिशत होता है । इसक बाद बीज को 0.1 प्रतिशत स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (एक लीटर पानी में एक ग्राम दवा) के घोल में दो घंटे तक रखकर फिर छाया में सुखाकर डेल्टाव, बाविस्टीन या बेनगाई या बेनगाई 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें। बोआई मई के अंतिम सप्ताह से लेकर जून के द्वितीय सप्ताह तक ।
बी.टी. कपास किस्में
एमआरसी-7301 बीजी-2 (नीना), एमआरसी-7326 बीजी-2 (बेम्बीनो), एमआरसी-6301 बीजी-1, मेक-12 बीटी, मेक 184 बीटी, मेक-162 बीटी, जी.के.205 बीटी, पारस ब्रम्हा बीजी, अजीत 33 बीटी, अजीत 155 बीटी, अजीत-11 बीजी-2, एनसीईएच-2 आर (विश्वनाथ) फ्यूजन बीटी, केडीसीएचएच-441 बीजी-2 (सुपर मारूति), अंकुर-09 बीटी, अंकुर 651 बीटी, एनसीएस-145 (बन्नी), एनसीएस-207 (मल्लिका), आरसीएच शक्ति-9 बीटी, आरसीएच-2 बीटी, आरसीएच-377 बीटी (आल्टो), आरसीएच-188 (सांई) बीटी, टीसीएचएच-4 बीटी (श्रीतुलसी), जेके वरूण, वीआईसीएच-9 बीटी, वीआईसीएच-5 बीटी, पीआरसीएचएच-102।
खाद एवं उर्वरक:-
गोबर की खाद, /नाडेप, कम्पोस्ट 60-80 क्विं. प्रति हेक्टेयर, नीम खली 25-30 कि.ग्रा./ हेक्टेयर डालें। 150-180 नत्रजन, 75-90 स्फुर एवं 70-85 पोटाश किग्रा./हे. डालें। इन पोषक तत्वों के अलावा 25 किग्रा./हे. जिंक सल्फेट व 25 किग्रा./हे. मैग्नेशियम सल्फेट बुआई के समय उपयोग करें।

सफेद सोना के नाम से मशहूर कपास भारत की एक महत्वपूर्ण फसल हैं जो कि सम्पूर्ण कृषि वर्ष में लगभग 92 लाख हेक्टेयर में लगायी जाती हैं। कपास की फसल को 40-50 प्रतिशत तक हानि करने वाले तीन प्रकार के छेदक कीट अमेरिकन बालवर्म, स्पोटेड बालवर्म तथा पिंक बालवर्म है कीटनाशक का सबसे अधिक प्रयोग लगभग 54 प्रतिशत इसी फसल में किया जाता है। जिसमें 60 प्रतिशत कीटनाशक उपरोक्त कीटों के नियंत्रण में उपयोग की जाती है। बीटी प्रौद्योगिकी के आने से देश में कपास की फसल के परिदृश्य में उल्लेखनीय सुधार आया हैं। हम जानते है बीटी (बेसिलस थुरिजिएंसिस) एक ऐसा जीवाणु है जो मृदा में पाया जाता है तथा इसकी कीटनाशी क्रिया इसके बीजाणु में उपस्थित एक विशिष्ट प्रकार के प्रोटीन के कारण होती है जो कीटों के मध्य आंत में प्रोटीनलयन से विष उत्पन्न करता है इस बी.टी. जीवाणु के विशेष प्रोटीन उत्पन्न करने वाले जीन को कपास में आनुवांशिक अभियांत्रिकी द्वारा प्रवेश कराया जाता है।
  • राजेश खवसे
  • व्ही. के. पराड़कर
    आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र, चन्दनगाँव, छिन्दवाड़ा
    Email : adrcwa@gmail.com

www.krishakjagat.org
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