काबुली चने में भूरा रस्ट एक नया खतरा

किसान भाईयों सावधान- किसान की एक समस्या का समाधान नहीं होता और दूसरी समस्या खड़ी हो जाती है। खरीफ 2017 सोयाबीन में सफेद लट और स्टेम फ्लाई,। अगर आप मध्यप्रदेश के किसान है, और आपने इस समय चने की फसल लगाई है या अगले वर्ष लगाने वाले है तो आप कृपया सावधान रहे क्योंकि हम जिसके बारे में बात करने जा रहे है वह चने की एक फफूंद जनित बीमारी है जिसका रोगजनक यूरोमाइसेससेसेरीस एरेटिनी नामक फंजाई है। चने के पर्णीय रोगो में, चने के रस्ट (यूरोमाइसेससेसेरीस एरेटिनी) को मामूली माना जाता था। क्योंकि यह फसल के आखिरी दिनों दिखाई देती है जो चने की फसल परिपक्व व होने लगती है। लेकिन, हाल ही के दिनों में मध्यप्रदेश में चने की खेती के लिए चने का रस्ट एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है।
चने का भूरा रस्ट सबसे पहले मैक्सिको में 1961 और संयुक्त राज्य अमेरिका में 1985 में देखा गया था। (रिपोर्ट एग्रोपीडिया) भारत में यह रोग सबसे पहले कर्नाटक में एक महामारी के रूप में 1987 में देखा गया। (करंट रिसर्च, यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेस, बैंगलोर, 1987) और इसके बाद महाराष्ट्र में 2009 में देखा गया था। (जर्नल ऑफ महाराष्ट्र एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, 2010)
अगर किसानों की माने तो इस वर्ष चने के उत्पादन में भी करीब 2 से 3 क्विंटल प्रति एकड़ की कमी देखने को मिली है साथ ही साथ अनुभवी किसानों के अनुसार उनके 30-40 वर्ष खेती के अनुभव में ऐसा पहली बार देखने को मिला है कि चने का कोई पर्णीय रोग इतना उग्र हुआ था।
निमाड़ के तीन जिलों के सर्वे में रोग की औसत रोग की व्यापकता (डिजिज इंसीडेंस) 100 प्रतिशत तथा उसकी रोग की तीव्रता (डिजिज सिवियर्टी)70 प्रतिशत से 80 प्रतिशत पाई गई।

चने का रस्ट इसी वर्ष इतना उग्र क्यों हुआ?
इस सवाल का जवाब शायद पिछले वर्ष चने का उत्पादन मूल्य (1000 से 1100 प्रति क्विन्टल) हो सकता है। फसल का मूल्य अधिक होने के कारण किसानों ने चने की खेती के लिये बहुत अधिक रूचि दिखाई। निमाड़ में अधिकांश भाग पर खरीफ की फसल के रूप में कपास उगाया जाता है, और कपास की फसल अक्टूबर से नवम्बर के आखिरी सप्ताह तक पूर्ण रूप से हार्वेस्ट होने के कारण चने की फसल की बुआई विलम्बित होती है जो की नवम्बर के मध्य सप्ताह से प्रारंभ होकर दिसम्बर के आखिरी सप्ताह तक पूरी होती है। चूंकि चने का रस्ट एकलेटसीजन रोग है, और निमाड़ में चने की बुआई दिसम्बर के आखिरी सप्ताह तक की गई थी अत: रस्ट के रोगजनक को अधिक उग्र होने के लिये उचित फसल अवस्था और अनुकूल वातावरण, दोनों ही एक साथ मिलने से ये रोग अधिक उग्र हो गया।
विश्व के कुल चना उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत में होता है। भारत में सबसे अधिक चने का क्षेत्रफल एवं उत्पादन वाला राज्य मध्यप्रदेश है। चने का उत्पादन कुल दलहन फसलों के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत होता है। देश में चने का सबसे अधिक उत्पादन मध्यप्रदेश मे होता है। जो कुल चने उत्पादन का 25.3 प्रतिशत पैदा करता है। चने की फसल को लगभग 50 से अधिक रोगजनक प्रभावित करते हैं जिनमें मृदा एवं हवा जनित रोग जनक शामिल हैं। चने की फसल में अभी तक जो भी अनुसंधान कार्य हुए वह केवल मृदाजनित रोगजनकों के प्रतिरोग रोधिता के लिए किये गए क्योंकि ये बीमारियां अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती हंै और इसके विपरीत पर्णीय बीमारियों को बहुत ही कम महत्व का माना जाता था क्योंकि इनसे फसल हानि बहुत कम होती थी।

क्षति लक्षण:
रस्ट के लक्षण सबसे पहले पत्तियों पर छोटे गोल या अंडाकार, हल्के भूरे रंग के धब्बे (छाले) के रूप में पत्तियों की दोनों सतह पर दिखाई देते है। उग्रता अधिक होने पर ये हल्के भूरे रंग के धब्बे (छाले) पत्तियों एवं तने पर भी देखने को मिलते हैं। इसके बाद जैसे ही रोग जनक के बीजाणु परिपक्व होते हैं ये पत्ती की दोनों सतहों को तोड़कर एक भूरे या काले पाउडर के रूप में बहार निकलते हैं तथा एक विशिष्ट प्रकार की आकृति में देखे जा सकते है।
अनुशंसा एवं सारांश:

  • क्या जलवायु परिवर्तन के कारण ये रोग इस वर्ष ज्यादा उग्र हो गया जो पहले केवल एक नगण्य रोग हुआ करता था?
  • यदि हां तो ये रोग कितना नुकसान करता है?
  • यदि हां तो इसके नियंत्रण के क्या उपाय होने चाहिए?
  • यह रोग इसी वर्ष इतना अधिक मात्रा में क्यों उग्र रहा?
  • क्या यह रोग आने वाले समय में भी इसी उग्रता से आएगा?
  • यदि हां तो क्या हम इसके लिए तैयार है?

हमारे पास इनमें से कुछ प्रश्नों के उत्तर तो शायद हो लेकिन अभी भी इस रोग के बारे में हमारा ज्ञान अधूरा है।
सलाह:

  • (डॉलर) काबुली चने की देरी से बुआई करने से बचे।
  • खेत तथा मेढ़ों के साफ रखे।
  • चने की फसल में फूलों की अवस्था के बाद प्रतिदिन खेतों की निगरानी करे तथा रस्ट से प्रभावित पौधों को नष्ट कर दें।

 

  • तुमेर सिंह पनवार, टेक्निकल सर्विस गोदरेज
    एग्रोवेट लि., इन्दौर, मो. : 9993098921

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