धान की उत्तम खेती

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धान (चावल) महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है और धान (चावल) आधारित पद्धति खाद्य गरीबी उम्मूलन और बेहतर आजीविका के लिए जरूरी है। विश्व में धान (चावल) के कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कम आय वाले देशों में छोटे स्तर के किसानों द्वारा उगाया जाता है। इसलिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास और जीवन में सुधार के लिए दक्ष और उत्पादक (चावल) आधारित पद्धति आवश्यक है।
धान उत्पादन की एसआरआई पद्धति
श्री पद्धति धान उत्पादन की एक तकनीक है जिसके द्वारा पानी के बहुत कम प्रयोग से भी धान का बहुत अच्छा उत्पादन संभव होता है। इसे सघन धान प्रणाली (एसआरआई या श्री पद्धति) के नाम से भी जाना जाता है। जहां पारंपरिक तकनीक में धान के पौधों को पानी से लबालब भरे खेतों में उगाया जाता है, वहीं मेडागास्कर तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है, लेकिन सिंचाई के पुख्ता इंतजाम जरूरी हैं, ताकि जरूरत पडऩे पर फसल की सिंचाई की जा सके। सामान्यत: जमीन पर दरारें उभरने पर ही दोबारा सिंचाई करनी होती है। इस तकनीक से धान की खेती में जहां भूमि, श्रम, पूंजी और पानी कम लगता है, वहीं उत्पादन 300 प्रतिशत तक ज्यादा मिलता है। इस पद्धति में प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर उत्पादन कर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
इस विधि को फ्रांसीसी परदरी फादर हेनरी डे लाउलानी द्वारा शुरूआत में मेडागास्कर में विकसित किया गया था इसलिए भी इसे धान उत्पादन की मेडागास्कर विधि कहते हैं।
नर्सरी उगाना– श्री पद्धति में नर्सरी बेड की तैयारी में बहुत ज्यादा सावधानी बरते जाने की जरूरत है जबकि 8 से 12 दिन पुराने पौधे को लगाना हो।
मुख्य खेत की तैयारी– श्री पद्धति में मुख्य खेत की तैयारी ठीक उसी तरह से होती है जैसे कि परंपरागत तरीके से। हालांकि यह आदर्श स्थिति होगी कि सूखे की जुताई हो और गारा बनाने का काम ट्रैक्टर से ना करवाया जाए। ग्रीष्म ऋतु में खासकर काली मिट्टी में खेती की जुताई कर तैयारी रखें।
धान की खेती पूर्ण क्षमता का इस्तेमाल और ज्यादा उपज के लिए

  • एक पौधे में ज्यादा संख्या में टिलर हों।
  • प्रभावकारी टिलर की संख्या ज्यादा होनी चाहिए।
  • पुष्प-गुच्छ और प्रति पुष्प-गुच्छ में दानों की संख्या उच्च होनी चाहिए।
  • अनाज का वजन ज्यादा होना चाहिए।
  • जड़ें लंबी और स्वस्थ हों।

श्री पद्धति की विशेषताएं जिसकी मदद से उच्च उपज हासिल की जा सके

  • विस्तृत या व्यापक पौधारोपण
  • कम बीज द्य विकसित पौधे का रोपण
  • घास-फूस को वापस मिट्टी में मिलाना
  • कम पानी द्य जैविक खाद का प्रयोग
  • उपयुक्त मिट्टी का चुनाव।

श्री पद्धति से धान खेती में निम्न लक्ष्य हासिल किए जाते हैं-
धान की खेती में ज्यादा उपज के लिए-

  • एक पौधे में ज्यादा संख्या टिलर हो।
  • प्रभावशाली टिलर की संख्या ज्यादा होनी चाहिए।
  • दानों का वजन ज्यादा होना चाहिए।
  • एक पौधे की क्षमता और संभावना की किस तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है?

अगर पौधे में मौजूद संभावना का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाए तो

  • सहायक जड़ें जो पानी और पोषक तत्वों को ग्रहण करते हैं तो स्वस्थ और अच्छी तरह से फैला होना चाहिए।
  • मिट्टी उपजाऊ हो और ढेर सारी जीवाणुओं के साथ हो।
  • पौधे स्वस्थ और मजबूत हों।

श्री पद्धति से खेती करने के तरीके से उपरोक्त लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। इस पद्धति को धान, रागी, गन्ना और दूसरी तरह की खेती में अपनाया जा सकता है।

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