मूँगफली को प्रमुख रोगों से बचायें

टिक्का-पर्णदाग रोग
यह रोग मूँगफली का प्रमुख रोग है, लक्षण पत्तियों, तनों व शाखाओं पर प्रदर्शित होते है। वैज्ञानिकों ने 22 प्रतिशत उपज में कमी का अनुमान लगाया है। पर्णदाग रोग एक कवक जीव से संक्रमण से होता है, दो तरह के कवक इस रोग को संक्रमण करता है इसलिए रोग लक्षण भी दो तरह से दिखाई देते है।
रोग लक्षण :

  • अग्रिम पत्ती धब्बा (सर्कोस्पोरा अरेचडिकोला) रोग लक्षण पत्तियों में लाल से भूरे रंग में धब्बे के रूप में प्रकट होते है साथ ही साथ धब्बे पर्णवृंतों एवं तनों पर भी दिखाई देते है, पत्तियों में धब्बे के चारों ओर पीला घेरा होता है। यह रोग फसल के माह अवस्था में ही संक्रमित शुरू हो जाता है।
  • पछेती पत्ती धब्बा रोगजनक (सर्कोस्पोरा परसोनेटा) पत्तियों पर यह लक्षण 45-60 दिन बाद प्रकट होता है, पत्तियों में छोटे-छोटे काला, भूरा धब्बा दिखाई देता है, पत्तियों में धब्बे के चारों ओर पीला घेरा नहीं होता है।

बुआई पूर्व रोग प्रबंधन:

  • पिछली फसल के पौध अवशेष को एकत्र कर जला दें।
  • फसल बुआई समय में परिवर्तन – यदि फसल को 15 दिन पहले बुआई कर देते हैं तो रोग प्रकोप से बचाया जा सकता है।
  • बीज उपचार – 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम मैंकोजेब प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें या 4.8 ग्राम ट्राइकोडर्मा से।
  • रोग प्रतिरोधी किस्मों को उगाना – सी.एस.एम.जी.-9570, आई.सी.जी.एस.-1038

खड़ी फसल में रोग प्रबंधन:

  • डाइथेन एम 45 – 0.2 प्रतिशत की दर से तीन बार 12 से 15 दिन के अंतराल में छिड़काव करें या ब्लाइटॉक्स-50।
  • रोग ग्रसित पौध को निकालकर जला दें।

स्क्लेरोशियम जड़ सडऩ रोग
इस रोग का प्रभाव जहां-जहां पर मूंगफली के खेती होती है वहां पर देखा गया है।
रोग लक्षण : स्क्लेरोशियम रोल्फसाई रोग जनक है जो फसल पकने के कुछ समय ही जड़ को सक्रमण करता है। प्रभावित पौधा पीला पड़ जाता है और अंत में पौधे मर जाते है। पौधों को उखाड़कर देखने पर प्रमुख जड़ के आस-पास सफेद मकड़ी जाल जैसे फफूंद संरचना दिखाई देती है। इस रोग का प्रभाव जड़ के साथ ही फल्लियों पर भी दिखाई देता है जिससे फलियों व दाने सिकुड़े हुए व सतह पर सफेद फफूंद रचनाएं दिखाई पड़ती हैं।
रोग प्रबंधन:

  • ग्रीष्म कालीन जुताई व फसल चक्र अपनायें।
  • प्रभावित पौधों को निकाल कर जला दें।
  • बीज उपचारित करें, 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से।

पद सडऩ या कॉलरराट रोग
यह रोग पौधों को शत-प्रतिशत नुकसान पहुंचाती है, क्योंकि रोगजनक बीज पर ही उपस्थित होते है। रोगजनक भण्डारण में अधिक नमी होने पर बीज को संक्रमित करता है।
रोग लक्षण: इस रोग का प्रभाव जब फसल 30 दिन की होने पर लक्षण प्रकट होना शुरू हो जाता है पर रोग का प्रभाव पौधे की किसी भी अवस्था में संक्रमण करने में सक्षम होती है। प्रभावित पौधा सूखकर व मुरझाकर गिर जाता है क्योंकि रोग मिट्टी की ऊपरी सतह के तने का भाग रोगजनक के कारण से संक्रमित होकर कमजोर हो जाती है। संक्रमण भाग पर फफूंद की काली संरचनाएं दिखाई देती है।
रोगजनक बीज की बाहरी सतह अथवा मिट्टी में पौध अवशेषों पर निरंतर साल दो साल तक जीवित रहता है।
रोग प्रबंधन:

  • बीज उपचारित करें – थीरम/डाइथेम एम 45-2.5 ग्रा/किलो बीज की दर से।
  • रोग प्रतिरोधी जाति का चुनाव करें।
  • ग्रीष्म कालीन जुताई करें।
  • पौध अवशेषों को एकत्र कर जला दें।

गेरूआ या रस्ट रोग
मूंगफली फसल पर रोग संक्रमण पिछले 7-8 वर्षों से देखी जा रही है। इस रोग से फसल की उपज में 30 प्रतिशत तक कमी देखी गयी है।
रोग लक्षण : 30-35 दिन की फसल अवस्था पर संक्रमण दिखाई देने लगते है। पत्तियों के ऊपरी भाग पर हरे पीले धब्बे के रूप में दिखाई पड़ते हैं व नीचे भूरे या नारंगी रंग के स्फोट के रूप में प्रदर्शित होते हैं।
प्रभावित पत्तियां झुलसी हुई दिखाई देती है व समय से पूर्व ही पत्तियां गिर जाती हैं।
रोग आक्रमण के कारण फल्लियां समय से पहले पक जाती है। जिसके कारण से बीज चपटे और विकृत हो जाते है।
खड़ी फसल में रोग प्रबंधन

  • प्रभावित पौधों को उखाड़ कर जला दें।
  • डाइथेन एम- 45, 0.2 प्रतिशत की दर से 3 बार 12-15 दिन के अंतराल में छिड़काव करें।
  • कार्बेन्डाजिम – 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें।

बुआई पूर्व रोग प्रबंधन

  • रोग मुक्त फसल बीज का चुनाव करें।
  • पौध अवशेषों को एकत्र कर जला दें।
  • फसल चक्र अपनायें।
  • ग्रीष्म कालीन जुताई करें।
  • रोग सहनशील किस्म सी.एस.एम.जी. 9510 का चयन करें।
  • बीज उपचारित के लिए – 0.1 प्रतिशत की दर से वीटावैक्स या प्लान्टवैक्स।

 

  • दिलीप कुमार
  • ललीता रामटेके
  • देवेन्द्र कुमार
  • मिथलेश कुमार
    email: patle.dilip.kumar@gmail.com

www.krishakjagat.org

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