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कपास को प्रमुख रोगों से बचायें

जड़ सडऩ या शुष्क विगलन रोग
कपास एक मौसमी फसल है जो कि खरीफ में ही की जाती है। इस फसल का महत्व अन्य फसलों की तुलना में विशेष है। कपास की खेती से अच्छी आय ली जा सकती है। परंन्तु फसलों में रोग की समस्या को नियंत्रण कर दिया जाये तो अच्छी आय में वृद्धि कर सकते है। कपास का जड़ सडऩ रोग से 5-17 प्रतिशत तक फसल उपज में प्रभाव देखा गया है। कपास की जहां -जहां खेती की जाती है वहां पर इस रोग का प्रकोप देखा गया है। रोगजनक एक वर्ष से दूसरे वर्ष मिट्टी में उपस्थित पौध अवशेषों के माध्यम से उत्तरजीवित रहता है।
रोग के लक्षण: यह रोग राइजोक्टोनिया बटाटीकोला नामक फफूंद जीव के प्रभाव से होते है। रोगलक्षण फसल के किसी भी अवस्था में प्रदर्शित हो जाती है। मुख्यत: जब फसल 25 – 30 दिन का होता है। उस समय रोग संक्रमण अधिक दिखाई देता है। रोग का प्रभाव पौध के जड़, पत्तियां व बीज पर देखा जा सकता है। पौधों की पत्तियॉ पीला पड़कर सुख जाती है, खेत में पर्याप्त नमी होते हुए भी इस प्रकार की लक्षण दिखाई पड़ती है। जड़े पतली होकर सड़ जाती है, और जब मुख्य जड़ को हाथ लगााने से छिलका बाहर निकल जाता है। बीज पत्रों पद उतकक्षय लाल भूरे रंग और बीज सिकुड़े हुए धब्बे दिखाई देतें है, जिसे कैंकर के नाम से भी जाना जाता है। बाद में पीला भूरा रंग काला रंग में परिवर्तित हो जाती है।
रोग प्रबंधन:

उकठा या ग्लानि रोग
रोगजनक द्वारा उत्सर्जन विषैला पदार्थों का पौध के सभी भागों में फैल जाना ही रोग का कारण है। कपास उकठा की समस्या फसल में आ जाने से 25 सें 30 प्रतिशत तक हानि बढ़ जाती है। उकठा रोग की समस्या काली मिट्टी में अधिक होती है, अन्य मिट्टी की तुलना में उकठा रोगजनक पौध जड़ों के अवशेषों में निरंन्तर साल दो साल जीवित रहते है।
रोग लक्षण: रोगजनक एक से दो सप्ताह की पौध अवस्था में ही संक्रमित करना शुरू कर देती है। एक माह में रोग लक्षण प्रदर्शित करने लगता है। रोग का मुख्य लक्षण खेत में पर्याप्त नमी के रहते हुए भी पौध पीले होकर मुरझाकर मर जाते है। ग्रसित पौधों को उखाड़कर देखनें से जड़ों में काली काली धारियां दिखाई पड़ती हैं। रोग का संक्रमण पौधों की मुख्य जड़ों में होती है जिसके कारण से पानी व पोषक तत्वों का संचालन पौध की पत्तियों तक नहीं पहुंच पाती है और पौध सूखकर मर जाती है।
रोग प्रबंधन:

कपास का जीवाणु अंगमारी रोग
यह रोग जेन्थोमोनास एक्सोनोपोडिस जीवाणु से संक्रमित होते हैं। इस रोग से फसल को 25 – 30 प्रतिशत तक उपज में क्षति देखा गया है। रोग का प्रसार पानी, हवा तथा ओस के द्वारा होता है और यह बीज व मिट्टी जनित होते हैं।
रोग लक्षण:
रोग के लक्षण के जड़ भाग को छोड़कर सभी भागों में संक्रमित देखा जा सकता है। रोगजनक संक्रमण के कारण से कलियां पूर्ण विकास के पूर्व ही गिर जाती है, फलों पर छोटे-छोटे भूरा धब्बे दिखाई देते हैं इसी के कारण से रूई के गुणवत्ता भी घट जाती है। रोग का आरंभ बीज अंकुरण से प्राप्त बीजपत्र से होता है, बीजपत्रों की निचली सतह पर छोटे-छोटे गीले से धब्बे बनते है। पत्तियों पर नीले से गहरे हरे रंग के धब्बे बनते हैं।
रोग प्रबंधन:

 

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