जैसा बोओगे वैसा काटोगे

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अशुद्ध बीजों को पहचानना जरूरी
एक पुरानी कहावत है कि जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। इस मुहावरे का यहां अर्थ यह है कि अगर किसान अशुद्ध/मिश्रण बीज बोयेगा तो उसे भी अशुद्ध बीज प्राप्त होगा। किसान भाई जो भी बीज बोनी के काम में लाते हैं, वे केवल बीजों में निकला हुआ कचरा, मिट्टी, कंकड़ इत्यादि ही निकालते है। एक ही फसल में अगर विभिन्न प्रजातियों के बीज मिलें हों तो उन्हें अलग करना बहुत कठिन कार्य होगा। अत: आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रकार की अशुद्धता का नियंत्रण खड़ी फसल से शुरू करें। फसल में जब बालियां/फल्लियां आ जाये तो उसी समय से अलग प्रकार के लक्षण दिखाने वाले पौधों को अलग कर दें।

अच्छी पैदावार का आधार होता है शुद्ध एवं स्वस्थ बीज, स्वस्थ बीजों का उपयोग करने से जहां एक ओर अच्छी पैदावार मिलती है वहीं दूसरी ओर समय एवं पैसों की बचत होती है। किसान भाई अगर अशुद्ध बीज तैयार करते हैं तो न तो इससे अच्छी पैदावार मिलती है और न बाजार में अच्छी कीमत, अशुद्ध बीज होने से सबसे ज्यादा परेशानी बोनी के समय होती है। अशुद्ध बीज जहां एक ओर खरपतवारों को बढ़ावा देते हैं वहीं दूसरी ओर अच्छी पौध न होने से अच्छा बीज, अच्छी उपज नहीं मिलती है। खरपतवारों के उगने से नींदा नियंत्रण के लिये अधिक पैसा खर्चा करना पड़ता है। साथ ही साथ फसल को खनिज तत्वों, पानी, जगह इत्यादि के लिये भी खरपतवारों से संघर्ष करना पड़ता है। अगर किसान भाई चाहते हैं कि अनावश्यक खर्चे घटें और अधिक उत्पादन मिले, तो उन्हें अच्छे बीजों का उत्पादन एवं उपयोग करना होगा।

देर से बोनी करने पर
खासतौर से खरीफ से इस प्रकार की परिस्थितियां निर्मित होती हैं। बरसात के मौसम में कभी-कभी शुरू-शुरू में थोड़ा पानी गिरकर वर्षा रूक जाती है। यह वर्षा बोनी के लिये तो पर्याप्त नमी के लिये किसान भाईयों को कुछ समय तक इंतजार करना पड़ता है नतीजा यह होता है कि इतने समय में खरपतवार खेतों में अपना अधिकार जमा लेते हंै। उपयुक्त समय आने पर समय अभाव मौसम की स्थिति को देखकर बुआई करना पड़ता है इस प्रकार से देर से बोनी की स्थिति में खरपतवारों की उपस्थिति में बोनी करने से बीज शुद्ध प्राप्त नहीं होता है।
मजदूरों की कमी से
कभी-कभी समय पर बोनी न होने से समय पर खरपतवारों को न निकालने की विपरीत परिस्थितियों के कारण एवं जल्दी-जल्दी कटाई एवं गहाई के समय किसान भाई उन बारीकियों पर ध्यान नहीं दे पाता जो शुद्ध बीज बनाने के लिये आवश्यक होती है। इसी प्रकार पैसों के अभाव में किसान भाई समय पर निंदाई-गुड़ाई नहीं कर पाता है। नतीजा अशुद्ध बीज प्राप्त होता है बोनी के समय भी पैसों की कमी के कारण लोग सस्ते के चक्कर में अशुद्ध बीज का उपयोग बोनी के लिये करते हैं। शुद्ध प्रमाणित उन्नत किस्मों के बीज साधारण बीजों की अपेक्षा महंगे भी होते हैं। अत: किसान इन उन्नत बीजों को खरीदकर बोनी नहीं कर पाते है। इस प्रकार अशुद्ध बीज बोने से अशुद्ध उपज प्राप्त होती है।
एक ही जगह पर सुखाई – गहाई
खलिहान एक ऐसी जगह है जहां पर बीजों में मिलावट होने की अधिक संभावना रहती है। कटाई के बाद अलग-अलग किस्मों की लांक, अलग-अलग फसलों की लांक एक ही स्थान पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर रखी एवं सुखाई जाती है। चूंकि खलिहान में किसानों, जानवरों, गहाई का आवागमन बना रहता है, तेज हवा भी बहने लगती है कम एवं एक ही जगह पर विभिन्न फसलें/ प्रजातियों को रखा जाता है अत: एक ही फसल की विभिन्न किस्मों के मिल जाने की संभावना बनी रहती है। फसल सुखाने एवं गहाई का कार्य भी साथ ही साथ चलता रहता है एवं सामान की अदला-बदली भी बिना सफाई के चलती रहती है। इन सब कारणों से भी बीज अशुद्ध हो जाता है।
गहाई-उड़ाई जल्दी करना
चूंकि खलिहान खुले और मौसम की अनिश्चितता बनी रहती है अत: हर किसान चाहता है कि उसकी फसल सुरक्षित रूप से भंडार गृह में चली जाये। एक ओर कहावत सच है कि जब तक दाना घर के अंदर न पहुंच जाये तब तक सुरक्षित नहीं। अत: कटाई के बार किसान की चिन्ता और बढ़ जाती है। वह शीघ्रता से अपना काम निपटाना चाहता है। आज ज्यादातर किसान जानवरों की मदद के साथ पावर थे्रसर का भी प्रयोग करता है। चूंकि फसल एक ही स्थान पर रखी रहती है अत: एक किसान की फसल की थे्रसिंग गहाई उड़ाई के बाद दूसरा किसान अपनी फसल की थे्रसिंग शुरू कर देता है। अत: पहिले किसान की फसल के अवशेष, बीज वगैरह वही रह जाते है। अत: इस प्रकार किसान की फसल के बीज दूसरे से मिल जाते है और बीज धीरे-धीरे अशुद्ध होता चला जाता है।
बोनी के समय शुद्ध बीज न होना
कभी-कभी किसानों को बोनी के समय शुद्ध/प्रमाणित बीज उपलब्ध नहीं हो पाता है ऐसी परिस्थिति में किसान भाई गैर सरकारी संस्था अन्य किसानों, बाजार इत्यादि से बीज खरीदकर बोनी करता है। इस प्रकार के बीज पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होते है। अशुद्ध बीजों की बोनी करने से अशुद्ध बीज कहीं प्राप्त होते है।

  • डॉ. एल. डी. कोष्टा
  • डॉ. यू. के वैश्य
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