विधुत वितरण कंपनियों की मनमानी!

किसान और सरकार को दे रही झटके

(श्रीकांत काबरा,मो. ९४०६५२३६९९)
ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री निरंतर मैराथन किसान हितैषी घोषणायें कर रहे हैं, कृषि को लाभ का धंधा बनाने और कृषि आय दुगनी करने का सब्जबाग दिखा रहे हैं वहीं जमीनी स्तर पर किसानों की दुर्दशा बद से बदत्तर हो रही है। इसकी एक बानगी विद्युत वितरण कंपनियों की कारगुजारियों से प्रत्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री सिंचाई पम्प योजना के माध्यम से किसानों की लूट मची हुई है। विद्युत वितरण कंपनियों, ठेकेदारों की मौज है और किसान विवशता के आंसू पी रहा है।

किसान योजना का लाभ नहीं ले पाएगा

विद्युत वितरण कंपनियां किसानों के सिंचाई पम्पों के संयोजन को आधारकार्ड से जोड़ रही है। इसके बाद किसानों के खाते में शासकीय अनुदान राशि सिंचाई पम्पों के लिए दी जाएगी और किसान विद्युत वितरण कंपनी द्वारा जारी बिल की भरपाई करेगा। प्रथम दृष्टया यह योजना रसोई गैस के सिलेंडर पर दी जा रही अनुदान सहायता के समान है लेकिन यदि क्रियान्वयन के स्तर पर इसकी परख करें तो किसान इस योजना का लाभ ही नहीं ले पायेगा। क्योंकि कुल बिजली बिल की राशि में किसान का योगदान बहुत कम है वहीं शासकीय अनुदान सहायता की राशि भारी भरकम है जिसका अग्रिम भुगतान करना किसान के बूते की बात नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझें। माना कि किसान के पास आठ हार्स पावर का सिंचाई पम्प है जिसमें उसे बिजली बिल भरने के लिए साल भर में अपनी जेब से लगभग रु. दस हजार देने पड़ते हैं और इसके लिये विद्युत वितरण कंपनी को शासन लगभग चौरासी हजार रु. की अनुदान सहायता देता है अब नई प्रस्तावित योजना में कृषक को इस संयोजन के लिये पहले अपनी ओर से चौरानवे हजार रु. का बिल भरना पड़ेगा और बाद में उसके खाते में चौरासी हजार रु. की अनुदान राशि समायोजन के रूप में आयेगी। यक्ष प्रश्न यह है कि दो किश्तों में दस हजार रु. का अग्रिम बिजली बिल भुगतान करने वाला किसान चौरानवे हजार रु. जमा करने के लिए कहां से लायेगा? ना नौ मनतेल होगा और न राधा नाचेगी।
अनुदान के नाम पर किसानों से लूट
वस्तुत: शासन द्वारा जब से अनुदान सहायता विद्युत वितरण कंपनियों को सीधे दी जा रही है तभी से इन कंपनियों ने किसानों से और सरकार से भी ठगी और मनमानी शुरू कर दी है। मनमाने तरीके से किसानों के तीन हार्स पावर के विद्युत संयोजन पांच हार्स पावर में और पांच हार्स पावर के कनेक्शन छ:,सात, आठ हार्स पावर में बदल दिये ताकि शासन से अधिक से अधिक अनुदान सहायता राशि वसूली जा सके। रखरखाव के नाम पर कोताही बरतने वाली विद्युत वितरण कंपनियों ने न तो कभी 40-40 साल पुराने बिजली के तार बदले और न ही ट्रॉसफार्मरों का रखरखाव किया। न ही विद्युत खपत के वास्तविक आंकलन के लिये बिजली के उर्जा मीटर लगाये, न ही सही वोल्टेज की विद्युत आपूर्ति पर ध्यान दिया और तो और विद्युत प्रवाह के लिए बिना ट्रांसफार्मर की क्षमता जांचें मनमाने अधिक भार के विद्युत कनेक्शन जारी कर दिये। इसके कारण कम वोल्टेड के कारण किसानों के विद्युत पम्प चलें, न चलें, बिजली की मोटरें कम-ज्यादा वोल्टेज प्रदाय के कारण जल जायें, इन कंपनियों को कोई परवाह नहीं है। यदि उपलब्ध आंकड़ों की बारीकी से जांच की जाए तो किसानों को बिजली देने के लिये विद्युत वितरण कंपनियां शासन से अनुदान के नाम से जितनी धनराशि वसूलती हैं, उसकी शाठ प्रतिशत ही किसानों को विद्युत आपूर्ति की जाती है। सिंचाई पम्पों के लिये विद्युत संयोजन देने पर किसान से उसके भूमि स्वामित्व के कागजात खसरे-नक्शे लिये जाते हैं तब इस विद्युत संयोजन का आधार नंबर से जोडऩे का क्या औचित्य है? प्रदेश भर में किसानों की जमीनें टुकड़ों में बंटी हुई हैं व उन्हें इस कारण एक से अधिक विद्युत कनेक्शन ले रखे हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि भविष्य में विद्युत कनेक्शन को आधार नंबर से जोड़कर मात्र एक ही सिंचाई पम्प के लिए शासन द्वारा अनुदान सहायता दी जावे, अन्य सिंचाई पम्पों के लिये कोई रियायती बिजली न दी जावे, ऐसे हालात में तो किसानों का बंटाढार होना तय है।

‘विधुत वितरण कंपनियों को केवल अपने मुनाफे की, अपनी जेब भरने की चिंता है तभी शासकीय भूमि पर अतिक्रमणकारियों को भी बिना उनसे भूस्वामित्व के कागजों को लिये स्थाई विद्युत कनेक्शन दिये जा रहे हैं ताकि विवाद की दशा में अतिक्रमणकारी न्यायालयों में इन सिंचाई के विद्युत बिलों को प्रस्तुत कर शासकीय भूमि पर कब्जे का दावा प्रमाणित कर सकें।’

बिजली कनेक्शन पर वसूली
मुख्यमंत्री सिंचाई पम्प योजना के अंतर्गत आवेदन करने पर सिंचाई पम्प के लिए विद्युत लाईन तार, खंभे, ट्रांसफार्मर सभी को लगाने के लिये किसान से भरपूर धनराशि वसूली जा रही है। पूर्व सरकारों ने गांव भर में सिंचाई पम्पों के लिए विद्युत पम्प की जाने के लिये संरचना विकसित करने हेतु स्वयं राशि खर्च की व किसानों से न केवल विद्युत शुल्क की वसूली की जाती थी। निजी क्षेत्र के ठेकेदार बिजली के खंभे खड़े कर रहे हैं, तार खींच रहे हैं हर किसान के खेत में प्रत्येक सिंचाई पम्प के लिए अलग-अलग ट्रांसफार्मर लगा रहे हैं और इनके लिए धनराशि शासन से भी वसूल की जा रही है और किसानों से भी वसूल की जा रही है। विद्युत वितरण कंपनियों के अधिकारी केवल सुपरवीजन के नाम पर पंद्रह प्रतिशत राशि वसूल रहे हैं और इसके बावजूद विद्युत वितरण नेटवर्क तार खंभे आदि लगाने वाले ठेकेदार को भी बिल भुगतान के लिए घेर रहे हैं। एक दस एकड़ के किसान के खेत में मात्र 100 मीटर की दूरी पर खंभा लगा कर विद्युत कनेक्शन मय ट्रॉंसफार्मर के देने के लिये किसान से लगभग अड़सठ हजार रु. और शासन से लगभग 2 लाख चालीस हजार रु. वसूले जा रहे हैं। पांच एकड़ भूमिधारक किसान से पांच हार्स पावर के कनेक्शन के लिए पैंतीस हजार रु. वसूले जा रहे हैं तथा शासन से एक लाख पैंतीस हजार रु. लिये जा रहे है। वहीं मुख्यमंत्री अपनी सिंचाई पम्प योजना का गुणगान करते ढोल पीटते नहीं थक रहे। गांव भर में विद्युत प्रदाय का नेटवर्क स्थापित करने के लिये पूर्ववर्ती सरकारों ने किसान से फूटी पाई भी नहीं ली और वर्तमान सरकार किसानों के आर्थिक दोहन में कोई कसर बाकी नहीं रख रही, एक-एक खंभा तार लगाने के लिए भी किसानों का आर्थिक शोषण कर रही है। गांव भर में किसानों के समूह के लिए विद्युत वितरणहेतु सार्वजनिक ट्रॉंसफार्म लगाने की बजाय हर किसान के खेत पर प्रत्येक पम्प के लिये ट्रांसफार्मर लगाने का औचित्य पर सवाल है। विद्युत पम्प की खपत दर्शाने वाले मीटर तो विद्युत वितरण कंपनियाँ नहीं लगा पा रही, प्रत्येक किसान के खेत पर ट्रांसफार्मर लगाकर किसान से उसकी लागत और ट्रांसफार्मर निर्माता से उसका ट्रांसफार्मर बिकवाने के लिये कमीशन खोरी का खेल जबरदस्त चल रहा है। किसानों की सहायता का दम भरने वाली मुख्यमंत्री विद्युत पम्प सिंचाई योजना की यही वास्तविक सच्चाई है। मुख्यमंत्री ने किसानों केबकाया बिलों के एक मुश्त भुगतान करने पर सरचार्ज माफ करने की घोषणा की है। बार-बार अपनी सभाओं में इसे दोहराते भी हैं परंतु आज तक विद्युत वितरण कंपनियों को इस संदर्भ में कोई आदेश नहीं मिले हैं यही ढपोरशंखी बातें हैं। इसी तारतम्य में सौर उर्जा से संचालित सिंचाई पम्पों की स्थापना की मध्यप्रदेश शासन द्वारा म.प्र. उर्जा विकास निगम के माध्यम से संचालित योजना की बात करें तो वहां भी एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है। उर्जा विकास निगम ने सिंचाई पम्प लगाने के लिए किसानों से धरोहर राशि के रूप में पांच-पांच हजार रु. तो अग्रिम के रूप में जमा करा लिये हैं परंतु किसानों के खेत में सौर उर्जा पम्प कब स्थापित होंगे इसका अता-पता निगम के अधिकारियों तक को नहीं है। म.प्र. शासन से अनुदान सहायता राशि की बाट जोहते निगम के अधिकारी हाथ पर हाथ रख कर बैठे हैं वहां भी किसान भाई चक्कर लगा-लगाकर हैरान-परेशान हैं।

10 घंटे बिजली देने का दावा खोखला 

किसानों को सिंचाई के लिये दस घंटे बिजली देने का शासन का दावा भी खोखला है। जर्जर विद्युत के खंभे पुराने जोड़ लगे बिजली के तार और मेंटेनेंस के अभाव में दम तोड़ते ट्रांसफार्मरों से आये दिन गांवों में विद्युत आपूर्ति बाधित होती है, इसमें सुधार के लिये कोई त्वरित कार्यवाही नहीं होती, तीन-तीन चार-चार दिन तक विद्युत प्रवाह बाधित रहने पर भी कोई अतिरिक्त समय के लिए विद्युत आपूर्ति नहीं की जाती। ग्राम स्तर पर विद्युत आपूर्ति की पूरी व्यवस्था ही चरमरा रही है और सरकार अपनी सफलता के दावे पर दावे किये जा रही है।

www.krishakjagat.org
Share