विटामिनों से भरपूर गांठ गोभी लगायें

भूमि
जिस भूमि का पीएच मान 5.5 से 7 के मध्य हो वह भूमि गांठ गोभी के लिए उपयुक्त मानी गई है। अगेती फसल के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी तथा पिछेती के लिए दोमट या चिकनी मिट्टी उपयुक्त रहती है। साधारणतया गांठ गोभी की खेती विभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद उपलब्ध हो इसकी खेती के लिए अच्छी होती है। हल्की रचना वाली भूमि में पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद डालकर इसकी खेती की जा सकती है।
खेत की तैयारी
पहले खेत को पलेवा करें जब भूमि जुताई योग्य हो जाए तब उसकी जुताई 2 बार मिट्टी पलटने वाले हल से करें इसके बाद 2 बार कल्टीवेटर चलाएं और प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं।

गांठ गोभी में एन्टी एजिंग तत्व होते हैं। इससे विटामिन बी पर्याप्त मात्रा के साथ-साथ प्रोटीन भी अन्य सब्जियों की तुलना में अधिक पाया जाता है। उत्पत्ति स्थल मध्य सागरीय क्षेत्र और साइप्रस में माना जाता है। पुर्तगालियों द्वारा भारत में लाया गया। जिसका उत्पादन देश के प्रत्येक प्रदेश में किया जाता है। गांठ गोभी में विशेष मनमोहक सुगंध ‘सिनीग्रिन’ ग्लूकोसाइड के कारण होती है। पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती है। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ तथा कैल्शियम, फास्फोरस खनिज होते हैं।

खाद
गांठ गोभी की अच्छी उपज लेने के लिए भूमि में कम से कम 35-40 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद 50 किलो ग्राम नीम की खली और 50 किलो अरंडी की खली आदि इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर खेत में बुवाई से पहले इस मिश्रण को समान मात्रा में बिखेर लें इसके बाद खेत में अच्छी तरह से जुताई कर खेत को तैयार करें इसके उपरांत बुवाई करें। रोपाई के 15 दिनों के बाद वर्मी वाश का प्रयोग किया जाता है।
रसायनिक खाद का प्रयोग करना हो तो 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 60 कि.ग्रा. पोटाश तत्व के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
प्रजातियां
अगेती किस्में : इस वर्ग के अंतर्गत अर्ली व्हाइट, व्हाईट वियना, प्राइड ऑफ इंडिया, गोल्डन एकड़, पूसा सम्बन्ध, अगस्त किस्में आती हैं। 65-75 दिन।
पछेती किस्में : इस वर्ग के अंतर्गत पर्पिल टॉप, पर्पिल वियना, श्री गणेश ग्रीज किस्में आती हैं। गांठ गोभी की प्रमुख दो उन्नत किस्मों का उल्लेख नीचे किया गया है।
व्हाईट वियना : यह एक अगेती और कम बढऩे वाली किस्म है इसकी गांठे चिकनी हरी और ग्लोब के आकार की होती है इसका गुदा कोमल और सफेद रंग का होता है। तनों और पत्ती का रंग हरा होता है इसकी बुवाई अगस्त के दूसरे पखवाड़े से अक्टूबर तक की जाती है यह प्रति हे. 150 क्विंटल उपज देती है।
पर्पिल वियना : यह एक पिछेती किस्म है इसके पौधों में पत्ते अधिक होते हैं। पत्तों और तनों का रंग बैंगनी होता है। इसकी गांठों का छिलका भी बैंगनी और मोटा होता है। इसका गुदा हरापन लिए सफेद रंग का और मुलायम होता है। गांठों में रेशा देरी से बनता है इसके बीजों की बुवाई अगस्त के अंत से अक्टूबर तक की जाती है। यह प्रति हे. 150 क्विंटल उपज देती है।
बोने का समय
फूल गोभी की भांति इसकी पौध पहले पौधशाला में तैयार की जाती है। लगभग 100 मीटर वर्ग क्षेत्र में उगाई गई पौध एक हे. भूमि की रोपाई के लिए पर्याप्त होती है। इसका बीज पौधशाला में फसल के अनुसार मध्य अगस्त से नवम्बर तक बोया जाता है जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुवाई फरवरी में की जाती है।
मैदानी क्षेत्रों में इसकी खेती के लिए पौधशाला में बीज बोने का समय निम्न प्रकार से है।
अगेती फसल – मध्य अगस्त
पिछेती फसल – अक्टूबर से नवम्बर
बीज की मात्रा
गांठ गोभी के लिए प्रति हे. 1-1.5 किलो बीज पर्याप्त होता है।
कैसे करें बीज बुवाई
पहले 200 से 300 ग्राम गौमूत्र या नीम का तेल प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए। इसके साथ ही साथ 160 से 175 मिली लीटर को 2.5 लीटर पानी में मिलाकर प्रति पीस वर्ग मीटर के हिसाब से नर्सरी में भूमि शोधन करना चाहिए। स्वस्थ पौधे तैयार करने के लिए भूमि तैयार होने पर 0.75 मीटर चौड़ी, 5 से 10 मीटर लम्बी, 15 से 20 से.मी. ऊंची क्यारियां बना लेनी चाहिए। दो क्यारियों के बीच में 50 से 60 से.मी. चौड़ी नाली पानी देने तथा अन्य क्रियाओं करने के लिए रखनी चाहिए। पौध डालने से पहले 5 किलोग्राम गोबर की खाद प्रति क्यारी मिला देनी चाहिए तथा 10 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश व 5 किलो यूरिया प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से क्यारियों में मिला देना चाहिए। पौध 2.5 से 5 से.मी. दूरी की कतारों में डालना चाहिए। क्यारियों में बीज बुवाई के बाद सड़ी गोबर की खाद से बीज को ढंक देना चाहिए। इसके 1 से 2 दिन बाद नालियों में पानी लगा देना चाहिए या हजारे से पानी क्यारियों में देना चाहिए।
सिंचाई
पौध रोपण के तुरंत बाद सिंचाई कर दें। उसके बाद में एक सप्ताह के अंतर से, देर वाली फसल में 10-15 दिन के अंतर से सिंचाई करें। यह ध्यान रहे कि फूल निर्माण के समय भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।

रोपाई
जब पौधे 4-5 सप्ताह के हो जाएं तब उसकी रोपाई कर देनी चाहिए। इसकी पौध की रोपाई करते समय पंक्तियों और पौधों की आपसी दूरी 25 और 15 से.मी. रखें, जबकि कभी-कभी 20&20, 20&25, 25&35, से.मी. पर भी रोपाई करते हैं।

  • सोहन लाल काजला
  • नीलू कुमारी
    email : neelu.kumari789@gmail.com

www.krishakjagat.org

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