सदाबहार आलू लगायें

जलवायु एवं भूमि- आलू के कंदों के विकास के लिये भूमि का औसतन 17-19 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान होना चाहिए। आलू की अच्छी पैदावार के लिये दौमठ या बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जीवांशम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते है,एवं वायु का संचार भली प्रकार से होता है, उपयुक्त होती है। भूमि में जल का निकास अच्छे प्रकार से होना चाहिए। भारी भूमि में आलू को नहीं लगाना चाहिए।
बोवनी- आलू की अगेती खेती के लिये इसकी बोवनी (सितम्बर-अक्टूबर) में करते हैं जो कि 70 से 80 दिनों में खुदाई के लिये तैयार हो जाती है। मध्यकालीन फसल या मुख्य की बोवनी अक्टूबर माह में की जाती है। पिछेती खेती के लिये इसे नवम्बर माह में बोवनी करते हैं।

आलू एक महत्वपूर्ण कंदीय फसल है। यह स्वादिष्ट, बहुपयोगी, शक्तिदायक व वर्षभर उपलब्ध रहने वाली सब्जी फसल भी है। इसका उपयोग सम्पूर्ण विश्व के लगभग प्रत्येक देश में किया जाता है एवं उगाया भी जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से सब्जी, चिप्स, स्टार्च, एल्कोहालिक पेय पदार्थ एवं अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद बनाये जाते हैं।

खेत की तैयारी- अच्छे उत्पादन के लिये भूमि की अच्छी प्रकार से जुताई होना चाहिए एवं उसमें पाटा लगाकर उसे समतल कर लेना चाहिए जिससे कि उसमें नमी की मात्रा बनी रहे और मिट्टी भुरभुरी हो जाये। खेत की तैयारी करते समय 25 से 30 टन गोबर की पकी हुई खाद को मिट्टी में मिलाते हैं।


बीज एवं बीज दर- बीज हमेशा किसी विश्वसनीय संस्थान से ही लेना चाहिए। भोज्य आलू के लिये प्रमाणित बीज जबकि बीज उत्पादन के लिये प्रजनक बीज या आधार बीज का उपयोग करना चाहिए। आलू बीज दर उपयोग में लाये गये बीज आकार व लाइन से लाइन तथा कन्द से कंद की दूरी पर निर्भर करती है। पूर्ण रूप से अंकुरित लगभग 40 से 45 ग्राम भार वाले कन्दों को बीज के रूप में लगाने की अनुशंसा की जाती है। इस प्रकार बीज कंद के आकार के आधार पर प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 क्विंटल बीज की आवश्यकता पड़ती है। बोवनी के लिये लाईन से लाईन की दूरी 60 सें.मी. व कन्द से कन्द की दूरी 20 से.मी रखनी चाहिए। कन्दों को भूमि में 5 से 6 से.मी. गहराई में रखना चाहिए एवं उस पर मिट्टी चढ़ाना चाहिए।
उन्नत किस्में:– तैयार होने की अवधि के अनुसार (अ) अगेती (80-100 दिन)
कु.चन्द्रमुखी, कु. बहार, कु. लौकर, कु. अलंकार, कु.नवतेज.
(ब) मध्यम अवधि वाली (100-120 दिन)
कुफरी ज्योति, कुफरी शीतमान, कुफरी बादशाह, कु. लालिमा, कु. चिपसोना -1, कुफरी जवाहर, कु. पुखराज,
(स) पिछेती किस्में (120-150 दिन)
कु. देवा , कु. सिन्दूरी, कु.जीवन , कु. चमत्कार
पोषक तत्व पूर्ति- बीज आलू का उत्पादन करने के लिये 326 किलोग्राम यूरिया, 375 किलोग्राम स्फुर एवं 167 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से उपयोग करने की अनुशंसा की गई है। यदि भोज्य आलू का उत्पादन किया जाता है तो 400 किलोग्राम नत्रजन, 500 किलोग्राम स्फुर एवं 200 किलोग्राम पोटाश उपयोग की अनुशंसा की गई है। नत्रजन की आधी मात्रा एवं स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा बोवनी के समय उपयोग करें, शेष बची हुई नत्रजन की मात्रा को गुड़ाई के समय दें। यदि बोवनी के समय नत्रजन उर्वरक यूरिया से दे रहे है तो 2-3 दिन पूर्व उसे मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिला दें। किसी भी दशा में कंदों को यूरिया के सम्पर्क में नहंी आने देना चाहिए वरना इससेे अंकुरण पर प्रभाव पड़ता है।
सिंचाई- यदि खेत में पर्याप्त नमी नहीं है तो पलेवा करके खेत की तैयारी करना चाहिये यदि किसी कारण वश पलेवा नहीं कर सकें तो बोवनी के तुरंत बाद सिंचाई करें। सिंचाई फसल की मांग भूमि किस्म एवं मौसम पर निर्भर करती है। आमतौर पर सिंचाई 7-12 दिवस के अन्तराल में करना उचित होता है। सिंचाई करने में विशेष ध्यान दें कि आलू की मेड़ के दो तिहाई हिस्से तक ही पानी दें ताकि बचा हुआ एक तिहाई हिस्सा धीरे-धीरे अपने आप नमी गृहण कर ले।
निराई- गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण:-फसल के अच्छे उत्पादन के लिये खेत में खरपतवारों की रोकथाम अत्यंत आवश्यक है। इसके लिये 25-30 दिन के अन्दर जब पौधे 8-10 से.मी. के हो जाए, गुड़ाई करना चाहिए। इसके बाद 60-70 दिन के पश्चात पुन: गुड़़ाई करके खरपतवारों को नष्ट करना चाहिए। निंदाई गुड़ाई करने के बाद मिट्टी चढ़ाना चाहिए। इसमें खरपतवार नाशक का प्रयोग भी लाभप्रद है इसलिये मैट्रीब्यूजिन 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या पैराक्वाट की 0.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना पर्याप्त रहता है। इसे 600 से 800 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बनाकर उपयोग करना चाहिए। रसायनों का उपयोग बोवनी के बाद 3 से 4 दिन के अन्दर ही करें अन्यथा इसका प्रभाव आलू फसल पर पड़ेगा।
आलू की खुदाई एवं उत्पादन- आलू की खुदाई बाजार में आलू के मूल्य रूप उगाई गई फसल के प्रयोजन, अपनाया गया फसल चक्र एवं बाजार भाव आदि पर निर्भर करता है। आलू की अगेती फसल की खुदाई 70 से 80 दिन पर शुरू हो जाती है। पिछेती की खुदाई फसल जब परिपक्व हो जाये लगभग 120 से 150 दिनों में उसकी किस्मों के आधार पर करना चाहिए। जब फसल के पत्ते पीले पडऩे लगे तब फसल की खुदाई करना चाहिए। खुदाई के 10 दिवस पूर्व खेत में सिंचाई बंद कर देना चाहिए, जिससे उसका छिलका कड़ा हो जाए। अगेती किस्म से लगभग 200 क्विंटल एवं पिछेती किस्म से 25 से 35 टन भोज्य आलू एवं 20 से 22 टन बीज आलू आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

  •  डॉ. ए.के.बढ़ोलिया द्य अजय हलदार  कृषि महाविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र)  मो.: 9926722700

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