गेहूँ की उन्नतशील खेती

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देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिये खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये किसानों को अपनी पारंपरिक खेती के तरीकों में परिवर्तन कर उन्नतशील तकनीकों की आवश्यकता है। इसके लिए सूचना एवं संचार प्रौघोगिकी (आईसीटी) का कृषि विस्तार शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान है। इसी के अंतर्गत वर्तमान समय में किसानों की जरुरत के अनुसार विशेष जानकारी को किसानों तक पहँुचाने की आवश्यकता है। इसी कड़ी में पूसा एम कृषि मोबाइल आधारित सलाह सेवा विश्व बैंक द्वारा राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना को प्रदत्त ऋण के अंतर्गत, कमज़ोर क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के लिए अनुकूल क्षमता बढ़ाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान एनई दिल्ली और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (गैर) सरकारी संस्था ने मिलकर भारत के चार राज्यों मध्यप्रदेश के धार, ओडि़सा के गंजाम, हरियाणा के मेवात और महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में आरम्भ की गई थी।

खाद्यान्न एवं पोषण सुरक्षा के लिये मालवा गेहूँ की खेती अवश्य करें :

मालवा गेहूँ की नई किस्मों की खेती के अनेक लाभ हैं, जैसे-

  • अधिक उत्पादकता के साथ-साथ ये किस्में अनेक रोगों जैसे भूरा गेरुआ एकण्डवा तथा करनाल बंट आदि के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी हैं।
  • सूखारोधी तथा तापरोधी होने के कारण इनमें कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।
  • इनमें आवश्यक पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, विटामिन-ए तथा खनिज तत्वों की अधिकता होने से कुपोषण समस्या से निपटने में मदद मिलेगी।
  • प्रचलित फास्ट-फूड़ त्वरित भोजन उद्योगों के लिये सस्ता और गुणवत्ता वाला कच्चा माल देश में ही उपलब्ध हो सकेगा। इन उद्योगों द्वारा रोजग़ार को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • शरबती तथा ड्यूरम गेहूँ की साथ-साथ खेती करने से भूरे तथा काले गेरू, की महामारी से पूरे देश को बचाया जा सकता है। गेरुआ के जो प्रकार ‘पेथोटाईप’ चंदौसी गेहूँ पर अधिक आक्रामक होते हैं, वे मालवी गेहूँ को प्रभावित नहीं करते हैं। इसी प्रकार मालवी गेहूँ को रोगग्रस्त करने वाले पेथोटाईप से चंदौसी गेहूँ प्रतिरोधी है।
  • अत: गेहूँ की खेती को जोखिम रहित तथा अधिक लाभदायक बनाये रखने के लिये मध्य प्रदेश में मालवी गेहूँ की खेती को बढ़ावा देना एक वैज्ञानिक आवश्यकता है। मध्य प्रदेश के कई जिलों में इस गेहूँ के वांछित विकास एवं प्रसार को देखते हुये, उन्हें मालवी/कठिया गेहूँ का ‘कृषि निर्यात क्षेत्र’ घोषित किया गया है।
  • उपलब्ध सिंचाई एवं बुवाई – समय के आधार पर उपयुक्त प्रजातियों का चुनाव करना चाहिये।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, इंदौर के अध्यक्ष के आदेशानुसार ‘मेरा गाँव मेरा गौरव’ के अंतर्गत पुन: मोबाइल आधारित एम कृषि. सलाह सेवा मध्य प्रदेश के सभी जिलों में शुरूकी गई। एम कृषि. द्वारा किसानों को कृषि अनुसंधान संस्थानों से जोड़ता है और मोबाइल पर ही उनकी समस्या का समाधान भी करता है। इस एप्लीकेशन द्वारा ग्रामीण किसानों के लिए विशेषज्ञ सलाह प्रदान की जाती है। एम कृषि- एप्लीकेशन के द्वारा किसानों के मोबाइल पर फसल अलर्ट सन्देश, स्थानीय मंडी भाव तथा मौसम की पूर्व जानकारी के साथ फसल की बुवाई, सिंचाई का समय, कटाई, भण्डारण, पोषक तत्वों, कीट एवं बीमारियों की जानकारी तथा किसानों द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाब कृषि विशेषज्ञ द्वारा स्थानीय भाषा में लिखित या वाईस सन्देश के द्वारा प्रदान किया जाता है। किस्मों का चुनाव सिंचाई जल उपलब्धता के अनुसार ही करें। एक सिंचाई उपलब्ध होने पर भी गेहूँ की खेती कर सकते हैं।
खेत की तैयारी एवं बुवाई उचित समय पर करनी चाहिये-
सितम्बर-अक्टूबर में सोयाबीन कटाई के लगभग 7-10 दिनों तक खेत की जमीन काफी मुलायम रहती है। अत: आड़ी एवं खड़ी, केवल दो जुताई कर,पाटा चलायें। आपका खेत रबी बुवाई के लिये तैयार हो जायेगा। सोयाबीन कटाई के बाद, खेत को जल्द से जल्द तैयार करने से उसमें ढेपड़े नहीं बनेगें एवं खेत में उपलब्ध नमी संरक्षित हो जायेगी तथा बुवाई के बाद सिंचाई करने में जल की बचत होगी।
बीज दर- 1000 दानों के वजन के आधार पर बीज की दर निर्धारित करें। 1000 दानों का वजन जितने ग्राम आये, उतने ही किलोग्राम बीज प्रति एकड़ उपयोग में लायें। यदि 1000 दानों का वजन 40 ग्राम आता है तो उस किस्म के बीज की 40 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ बोना चाहिये। देर से बोनी की अवस्था में बीज की दर में 20-25 प्रतिशत बढ़ोतरी करना तथा खाद में 20.25 प्रतिशत कमी करना आवश्यक है।

  मध्य प्रदेश के लिये गेहूँ की नवीन अनुमोदित गेरूआ रोग प्रतिरोधी प्रजातियाँ
बुवाई                  अवस्था बुवाई          का समय सिंचाई                                   प्रजातियाँ  उर्वरक की मात्रा एनपीके (ना.फा.पो.) (कि.ग्रा./हे.) उत्पादन (क्विं./हे.)
      चन्दौसी /शरबती कठिया / मालवी    
अगेती  20 से 30 वर्षा एचडब्लू 2004(अमर) एच.आई.8627 (मालवकीर्ति) 60:30:15 20-25
अक्टूबर आधारित एचआई.1500 (अमृता),
एमपी- 3288,
जेडल्ब्यू- 3020, 3173,
एचआई.1605(पूसा उजाला)
20 अक्टूबर 1-2 सिंचाई एचडब्लू.2004 (अमर), एच.आई.8627(मालवकीर्ति) 80:40:20 30-40
से 10 नवंबर एचआई.1500(अमृता),
एचआई.1531(हर्षिता),
एमपी-3288, जेडल्ब्यू-3020,
जेडल्ब्यू-3173, 3211, 3269,
एचआई.1605(पूसा उजाला)
समय से 10  से एचआई1418(नवीन चन्दौसी) एचआई.8498(मालव शक्ति) चन्दौसी शरबती
25 नवम्बर एचआई.1479(स्वर्णा), एम.पी.ओ.1106(सुधा) 120:60:30 50-55
एचआई.1544(पूर्णा), एच.आई.8663(पोषण)
जेडल्ब्यू-1201 एच.आई. 8713(पूसा मंगल) कठिया/मालवी
जीडबल्यू. 273, एम.पी.ओ.1215 140:70:35
जीडबल्यू. 322, एच.आई.8737(पूसा अनमोल),
जीडबल्यू 366 एच.आई. 8759 (पूसा तेजस)
पिछेती दिसम्बर से 4-5 सिंचाई एचआई.1418(नवीन चन्दौसी), 100:50:25 30-45
 जनवरी एमपी. 4010,जेडल्ब्यू-1202,
जेडल्ब्यू-1203,
एचडी-2932 (पूसा 111),
एमपी- 3336 राज.4238 .

बुवाई – पलेवा जमीन गीली कर देकर बुवाई न करें इससे पानी का नुकसान तो होता ही है साथ ही फसल की वृद्धि अच्छी नहीं होती है। सूखे खेत में ही आवश्यकतानुसार संतुलित उर्वरक डालकर उथली (1-2 इंच गहरी) बुवाई कर सिंचाई करें।

 

 

 

 

सूखे खेत में बुवाई करने के निम्न लाभ –

  • फसल  का उठाव अच्छा होता है।
  • नींदा (घास-पात) की समस्या कम होती है।
  • एक सिंचाई व 10-15 दिन समय की बचत होती है।
  • बार-बार की जाने वाली अनावश्यक जुताई की बचत होती है।
  • बिजली की बचत होती है।
  • सूखे खेत में बुवाई कर ऊपर से दिया गया पानी गेहूँ फसल में अधिक समय तक काम आता है।

संतुलित पोषक तत्व प्रबन्धन – जहां तक संभव हो मृदा जाँच के आधार पर ही पोषक तत्वों को देना चाहियेद्यलेकिन मृदा जाँच संभव न हो तो अनुमोदित उर्वरक निर्धारित मात्रा मेंएउचित गहराई (ढाई से तीन इन्च) में, तथा सही समय पर डालना चाहिये। इसके लिए यथासंभव मिट्टी की जांच कराना उपयुक्त रहता है। गेहूँ के लिए सामान्यतया नत्रजन, स्फुर व पोटाश- 4:2:1 के अनुपात में देना चाहिये। पूर्ण सिंचित खेती में नत्रजऩ की आधी मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की पूर्ण मात्रा बुवाई से पहले मिट्टी में ओरना (3 इंच गहरा) चाहिये। शेष नत्रजन पहली सिंचाई के साथ देना चाहिये। वर्षा आधारित तथा सीमित सिंचाई की खेती में सभी उर्वरक बुवाई से पहले मिट्टी में एक साथ देने चाहिये। उर्वरक और बीज मिलाकर न बोयें। हाल ही में भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल द्वारा किये गये अध्ययन में प्रदेश के अधिकांश जिलों में जिंक तथा सल्फर तत्वों की भारी कमी पाई गई है। इसके लिये 25 किलो प्रति हैक्टेयर जिंक सल्फेट, प्रत्येक तीसरे वर्ष, बोनी से पहले भुरक कर मिटृटी में मिला देना चाहिये। मृदा की उर्वरता तथा जल-षोषण क्षमता को बनाये रखने के लिए गोबर की खाद 10 टन या मुर्गी की खाद 2.5 टन या हरी खाद (जैसे सनई या ढेंचा) का प्रत्येक तीन वर्षो में कम से कम एक बार अवश्य उपयोग करना चाहिये।

सिंचाई निर्धारित मात्रा में एवं उचित अवस्था पर ही करनी चाहिये – जल उपयोगिता बढ़ाने के  लिये गेहूँ की खेती में अनावश्यक पलेवा न करें तथा क्यारियाँ बनाकर सिंचाई करें। इस क्यारी पद्धति में बुवाई के बाद हर 15 से 20 मीटर की दूरी पर आड़ी व खड़ी तथा दोनों दिशाओं से सीधी नालियां बनायीं जाती है। अंत में खेत के चारों ओर भी नालियां बना देते हैं। इस विधि से क्यारियाँ बनाकर सिंचाई करने से पानी की कम मात्रा में ही अधिक क्षेत्रफल की सिंचाई की जा सकती है। एक या दो सिंचाई उपलब्ध होने पर 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर के बीच बुवाई करें। तीन या अधिक सिंचाई उपलब्ध होने पर 5 से 25 नवम्बर के बीच का समय सबसे उपयुक्त होता है।

विभिन्न प्रजातियों के लिये सिंचाई अन्तराल

  • एक सिंचाई वाली प्रजातियों में अंकुरण हेतु दिये गये पानी के बाद एक मात्र सिंचाई 35 से 40 दिन की अवस्था पर करना चाहिये।
  • दो सिंचाई वाली प्रजातियों में अंकुरण हेतु दिये गये पानी के बाद प्रथम सिंचाई 35 से 40 दिन पर तथा दूसरी सिंचाई 75 से 80 दिन पर करना चाहिये।
  • पूर्ण सिंचाई वाली प्रजातियों में अंकुरण हेतु दिये गये पानी के बाद 4 सिंचाईयां उपलब्ध होने पर 20 से 25 दिन के अन्तराल पर 4 सिंचाईयां करनी चाहिये। यदि 3 सिंचाईयां उपलब्ध होने पर 20 से 25 दिन के अन्तराल पर 3  सिंचाईयां करनी चाहिये।
  • देर से बुवाई वाली प्रजातियों में अंकुरण हेतु दिये गये पानी के बाद 17 से 18 दिन  के अन्तराल से 3 से 4 सिंचाईयां करेें।बालियाँ निकलते समय फव्वारा विधि से सिंचाई न करें अन्यथा फूल खिल जाते हैं, दानों का मुँह काला पड़ जाता है व करनाल बंट तथा कंडुवा व्याधि के प्रकोप का डर रहता है। सभी जल्दी पकने वाली किस्मों की फसल में पीले रंग की झलक  का आभास होते ही आगे की सिंचाई  बंद कर दें। आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने पर दाने में दूधिया धब्बे आ जाते हैं तथा उपज कम हो जाती है। अनावश्यक सिंचाई न करें।
  •  डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा
  • डॉ. अनिल कुमार सिंह
  • नंदन सिंह राजपूत, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र, इंदौर एवं पूसा एम कृषि-

email : rajpootns85@gmail.com, पूसा एम कृषि-  मोबाइल           एपलिंक https://www.tcsmkrishi.com/ app/scca

टोल फ्री नम्बर : 18002099987

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