जामुन की उन्नत खेती

भूमि
जामुन के पेड़ के लिए किसी खास प्रकार की भूमि की आवश्यकता नहीं होती। इसे सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी पैदावार के लिए दोमट मिट्टी, जिसमें पानी का निकास अच्छा हो उपयोगी है। जामुन को लावणता वाली तथा जहां पानी खड़ा रहता हो, उस भूमि में भी उगाया जा सकता है। इसे चिकनी या रेतीली जमीन में लगाने से बचाना चाहिए।
किस्में/संकर
राजा जामुन

जामुन मूल रुप से भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया का पौधा है जिसको विभिन्न नाम जैसे जावा प्लम व काला प्लम व जमबोलन तथा जमबुल आदि से जाना जाता है। यह वृक्ष मायर्टेऐसी कुल और मायर्टलेस आर्डर में आता है। जामुल का वृक्ष एक विशाल और अधिक शाखाओं वाला वृक्ष है इसकी छाल भूरे रंग की अधिक चिकनी और लगभग 2.5 सेंटीमीटर मोटी होती है। हालांकि इसके फलों को सभी के द्वारा पसंद किया जाता है और उच्च दामों में बेचा जाता है तो भी यह वृक्ष एक बगीचे के पेड़ के रुप में अभी तक नहीं उगाया जाता है। लवणीय, क्षारीय, आद्र्र व जलभराव वाले क्षेत्र में इसे उगाया जा सकता है। नहरों और नदियों के किनारे की मृदा संरक्षण के लिए भी यह वृक्ष उपयुक्त होता है।

विशेषताएं – इस किस्म में उफल आकार में बड़े, आयाताकार और गहरे बैंगनी रंग के होते हैं। फल का गुच्छा मीठा और रसदार होता है। गुठली का आकार बहुत छोटा होता है। यह उत्तरी भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख किस्म हैं।
प्रवर्धन विधि
जामुन के पौधे बीज व कलम दोनों से तैयार किए जा सकते हैं।
बीज से लगाने की विधि
इस तरीके से अच्छे फलों की गुठली निकालकर उन्हें 4-10 से. मी. गहरा और कतार से कतार की 25&10 से. मी. दूरी पर मानसून में लगाया जाता है। एक वर्ष बाद पौधे लगाने योग्य हो जाते हैं।
चश्मा विधि
अच्छी पैदावार देने वाले पौधे से बीज इकट्ठे करके उन्हें नर्सरी में जुलाई- अगस्त में बोया जाता है और एक साल में पौधे चश्मा चढ़ाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
बुवाई विधि

  • अंकुरित पौधों के लिए 10 मी. की दूरी पर 1&1&1 मी. आकार के गड्ढें खोदे जाते हैं।
  • गड्ढों को मानसून से पहले या बसंत ऋतु में ही खोद लेना चाहिए।
  • गड्ढों की मिट्टी और अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद को 3:1 के अनुपात में मिलाकर भरना चाहिए।
  • 1 हेक्टेयर भूमि में लगभग 100-150 पौधों की आवश्यकता होती है।

फसल पद्वति विवरण

  • ताजे बीजों को 25&15 से. मी. की दूरी पर और 4-5 से. मी. की गहराई में बोया जा सकता है।
  • बीजों की बाविस्टीन से उपचारित किया जा सकता है।
  • बीजों का अंकुरण बुवाई से 10-15 दिनों के बाद प्रांरभ हो जाता है।
  • अंकुरित पौधे अगले मानसून में प्रतिरोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

खाद
प्रारंभिक स्थिति में 20-25 कि. ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को प्रति वर्ष मिला कर देना चाहिए। परिपक्व वृक्षों के लिए खुराक बढ़ाते हुये 50-60 कि. ग्राम/पौधे/वर्ष दी जानी चाहिए। जैविक खाद देने का सही समय फूल आने से पहले का होता है। बढ़ते हुए वृक्षों को 500 ग्राम नत्रजन, 600 ग्राम फास्फोरस और 300 ग्राम पोटाश प्रति वर्ष देना चाहिए।
सिंचाई
जामुन एक बहुत सख्त पौधा है और वर्ष में केवल 8-10 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। जब पौधे फल देने के लायक हो जायें तो अच्छी पैदावार के लिए 4-6 सिंचाई करनी चाहिए। अधिक ठंड के समय पौधों की सिंचाई करके पाले से बचाव करना चाहिए।
पौधों के बीच की फसल
जब तक पौधे छोटे हों, उनमें दाल वाली फसलें जैसे मटर, चना, मूंग इत्यादि ली जा सकती है।
तुड़ाई, फसल कटाई का समय
जामुन के फलों की प्रतिदिन तुड़ाई की जाती है फलों के पकने के बाद तुरंत तुड़ाई करनी चाहिए क्योंकि परिपक अवस्था में फल वृक्ष पर नही रह सकता। पके फलों की मुख्य पहचान है कि वे गहरे बैंगनी या काले रंग के हो जाते हैं। तुड़ाई के लिए कंधे पर कपास के थैले लेकर पेड़ पर चढ़ते हैं।

उपयोग

  • जामुन का अर्क मधुमेह, रक्त शर्करा को कम करने में बहुत उपयोगी होता है।
  • फूल उत्तर भारत में शहद के प्रमुख स्त्रोत के रुप में उपयोग किए जाते हैं।
  • फल के प्रतिरोधी गुण पाये जाते हैं और बहुत से रोगों के इलाज में दवा तैयार करने में उपयोग किए जाते हैं।
  • फल का उपयोग जेली, मुरब्बा, संरक्षित खाद्य पदार्थ, शरबत और शराब बनाने में किया जाता है।
  • बीजों का उपयोग मधुमेह में एक प्रभावी दवा के लिए किया जाता है।
    रसायनिक घटक
    जामुन के फल में ग्लुकोज़, फ्रक्टोस, खनिज, प्रोटीन और कैलोरी पाई जाती है। फलों के बीज में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेटस पाया जाता है।
  • हेमन्त सैनी
  • विकास श्योराण
  • पूनम सैनी
    email : sainihemant721@gmail.com

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